Tuesday, 31 March 2009

सम्पत्ति-विभाजन के संदर्भ मेें याज्ञवल्क्य स्मृति का योगदान


श्रीमती रेखा खरे
शोध छात्रा, प्राचीन इतिहास,
उ0प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविविद्यालय, इलाहाबाद |

              भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही आर्थिक विकास के क्रम में सम्पत्ति का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है, जिसका महत्व अद्यावधि विद्यमान है। सम्पत्ति ऐश्वर्य का पर्याय रहा है। सम्पत्ति की अवधारणा के सम्बन्ध में बुच का दृष्टिकोण यह कहता है, कि जब-तक वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में रहती है और निसर्ग पर उनका अस्तित्व निर्भर करता है, तब तक स्वामित्व का प्रश्न नहीं खड़ा होता है। प्रत्येक व्यक्ति नैसर्गिक वस्तुओं का उपभोग अपनी स्वेच्छानुसार करता है, परन्तु जिस क्षण मानव-श्रम, मानव-शिल्प और मानव-पराक्रम वस्तु की स्थिति को प्रभावित करता है, वहीं सम्पत्ति की धारणा अस्तित्व में आ जाती हैै।1 ऐश्वर्यशाली बनने के लिए अनेक प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता वैदिक-काल से ही अनुभूत की जाती रही है। वेदों में धन को ’रयी’ कहा गया है। रयी शब्द सुकर्णादि एवम् धन का वाचक है। वेदों ने धन की प्राप्ति में लोभ वृत्ति के त्याग की अनुशंसा की है।2
समस्त स्मृतियाँ आद्यतन दो प्रकार की सम्पत्तियों की चर्चा करती है, प्रथम स्थावर सम्पत्ति द्वितीय जंगम सम्पत्ति। स्थावर से भूमि खण्ड एवम् जंगम् से चल सम्पत्ति द्योतित है, परन्तु याज्ञवल्क्य तीन प्रकार की सम्पत्तियों की विवेचना करते हैं, भूमि, निबन्ध एवं द्रव्य, स्वर्ण रजत तथा अन्य चल-सम्पत्ति। ‘निबन्ध’ शब्द के अर्थ में डाॅ0 काणे का अभिमत है, कि रुपये-पैसे अन्न या अन्य वस्तुओं के रूप में वह आवाधिक शुल्क या चुकती या दान जो राजा द्वारा या संघ द्वारा यह किसी जाति द्वारा किसी व्यक्ति, कुल मठ या मन्दिर को जो स्थायी रूप से मिलता है, निबन्ध कहलाता है।
जंगम-सम्पत्ति से दायभाग का बोध होता है, जो माता-पिता के द्वारा कुल परम्परा से आयी हुई होती है, और कुल-परम्परा से आने वाली इस सम्पत्ति का पुत्रों में बँटवारा दाय भाग कहलाता है।3 स्मृतियों में दाय की बहुत विस्तृत चर्चा हुई है, जिसके कारण ही मध्य-युग में इसके दो सम्प्रदायों का उदय हुआ, प्रथम मिताक्षरा-सम्प्रदाय, द्वितीय दायभाग सम्प्रदाय। मिताक्षरा  सम्प्रदाय याज्ञवल्क्य-स्मृति के ऊपर विज्ञानेश्वर की टीका मिताक्षरा पर आधृत था। यह जन्मना स्वत्व के सिद्धान्त को मानता था, जिसके अनुसार पिता के जीवन-काल में ही पुत्रों को दायभाग मिल सकता था। इसका प्रचार बंगाल को छोड़कर समस्त भारत में है।
दायभाग-सम्प्रदाय जीमूत वाहन के निबन्ध ग्रंथ दायभाग के ऊपर आधृत था, जो ’उपरम्स्वत्व’ सिद्धान्त को मानता था, जिसके अनुसार पिता की मृत्यु के पश्चात् ही पुत्रों को दाय मिल सकता था। इसकी विशेषता यह है, कि इसका प्रचार मात्र बंगाल में ही है, और आधुनिक काल में बंगाल के कुछ कुलों में मिताक्षरा के कानून प्रतिनिष्ठित है।
याज्ञवल्क्य ने ’दाय’ शब्द को वह धन कहा है, जो धन स्वामी के सम्बन्ध मंे निमित्त से ही अन्य का ’स्व’ (धन) हो जाय। दाय दो प्रकार  के कहलाते हंै, प्रथम अप्रतिबंधक अर्थात जिसको कोई रोक न सके, द्वितीय सप्रतिबंधक, जिसका कोई प्रतिबंधक हो। अप्रतिबंधक दाय उसे कहते हैं, जिनमें पुत्रों और पौत्रों का पुत्र और पौत्र रूप से पिता और पितामह के धन में स्वत्व है, वह अप्रतिबंधक दाय होता है, क्योंकि उसको कोई नहीं हटा सकता है। पिता और भ्राता रूप से जिनमें स्वत्व हो, वह सप्रतिबन्धक दाय होता है।
दाय के सम्बन्ध में मिताक्षरा और दायभाग  दो विचाराधारा के रूप में प्रचलित रहे हैं। संयुक्त सम्पत्ति के सम्बन्ध में मिताक्षरा में वर्णित है, कि पुत्र का जन्म से ही सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो जाता है। पुत्र पैतृक सम्पत्ति में पिता का सह-स्वामी होता है। पिता सम्पत्ति के बँटवारे का सीमित अधिकारी है, और पुत्र बँटवारें का दावा पिता के जीवन-काल में कर सकता है, तथा संयुक्त परिवार के सदस्यों का परिवार के प्रधान की मृत्यु के पश्चात्  स्वतः अधिकार प्राप्त हो जाता है। उक्त कथनों के विपरीत दायभाग में वर्णित है, कि पुत्र को पिता की मृत्यु के बाद ही सम्पत्ति मेें अधिकार प्राप्त हो सकता है। पिता के जीवन काल में पैतृक सम्पत्ति पर पुत्र का कोई अधिकार नहीं होता है। पिता को सम्पत्ति के बँटवारे का निरपेक्ष अधिकार होता है, तथा पुत्र बँटवारा व परवरिश का दावा नहीं कर सकता। पिता की मृत्यु के पश्चात् ही उत्तराधिकारियों, विधवा तथा पुत्रियों का अधिकार प्राप्त होता है। बँटवारे के सम्बन्ध में मिताक्षरा का कथन है, कि संयुक्त परिवार के सदस्य अविभाजित सम्पत्ति का निष्पादन नहीं कर सकते, जबकि दायभाग में संयुक्त परिवार का कोई सदस्य अपना हिस्सा अविभाजित होनें पर भी निष्पादित कर सकता है। उत्तराधिकार  के सम्बन्ध में मिताक्षरा का मानना है, कि रक्त सम्बन्धों के आधार पर उत्तराधिकार निर्धारित होता है, तथा उत्तराधिकार में मातृबंधु को निरस्त कर पितृबंधु को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि दायभाग का मानना है, कि उत्तराधिकार का सिद्धांत आध्यात्मिक पिण्डदान पर आधारित है, इसमें मातृबंधु अर्थात् बहन-पुत्र को उनके पितृबंधु की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।
सम्पत्ति विभाजन के संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति का प्रावधान है, कि यदि पिता चाहे तो अपने जीवित रहते ही अपना धन पुत्रों को बाँट कर दे सकता है।4 मनु ने भी अपनी स्मृति मंे सविस्तार सम्पत्ति के अधिकार विभाजन के सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है। मनु का मानना है, कि माता-पिता के मरने पर भाई एकत्र होकर पैतृक सम्पत्ति को बराबर-बराबर बाँट लें, क्योंकि वे पुत्र माता-पिता के जीवित रहते उनकी सम्पत्ति लेने में असमर्थ रहते हैं।5 मनु के कथन का सारगर्भित तात्पर्य यह है कि पिता की मृत्यु के पश्चात् पितृ सम्बन्धी तथा माता की मृत्यु के पश्चात् मातृ सम्बन्धी द्रव्य सब भाइयों को बराबर-बराबर बाँट लेना चाहिए। पितामह की सम्पत्ति में स्मृतिकार विष्णु का अभिमत है, कि दादा से उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति में पिता और पुत्र  का स्वामित्व बराबर होता है।6 इसी संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति में उद्घृत है, कि संचय की गयी सम्पत्ति में पिता और पुत्र का स्वामित्व बराबर होता है।7
महान स्मृतिकार याज्ञवल्क्य ने किचिंत विस्तार में पैतृक सम्पत्ति के विभाजन के संदर्भ मेें अपनी स्मृति में वर्णित करते हैं कि पिता यदि अपने अर्जित धन का विभाजन करें तो वह अपनी इच्छा से न्यूनाधिक भाग भी बाँट सकता हैं। वह पिता की इच्छा पर निर्भर हैं। वह ज्येष्ठ पुत्र को श्रेष्ठ भाग दे सकता हैं या सबको समान भाग विभाजित कर सकता हैं। पिता की इच्छा से किया जाने वाला विभाजन दो प्रकार का होता हैं, यदि पिता सभी पुत्रों को समान रूप से समविभाजन करता है, तो पत्नी को भी सामांश रूप से भाग देने की अनुशंसा याज्ञवल्क्य ने की है, परन्तु वह यह भी कहतें हैं कि इस सम-अंाश की उत्तराधिकारिणी वही पत्नी होती है, जिसे स्वामी या श्वसुर से स्त्री-धन न प्राप्त हुआ हो। विषम-भाग उसी धन का होता है, जिसको पिता स्वमेव अर्जित करता हैं। यदि कोई पुत्र स्वयं द्रव्यावर्जन करने में समर्थ हो और पिता के धन की इच्छा न रखे, तो उसे कुछ भी देकर विभाजन करना पिता का कार्य है। न्यूनाधिक विभाजन पिता के द्वारा ही धर्म होता है।8
इस प्रकार सम्पत्ति विभाजन के संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति का महनीय योगदान है। समयानुसार समाज हर युग में उससे उत्प्रेरित होता रहा है। वर्तमान समय मंे ही समाज इन्ही विचार धाराओं से अभिसिंचित हैं। यद्यपि सम्पत्ति के अधिकार को लेकर विवाद होते रहें हैं, परन्तु प्राचीन काल से ही सम्पत्ति और उसका अधिकार भारतवर्ष में विचारणीय विषय रहा है। इस संबंध में स्मृतिकार याज्ञवल्क्य ने अपनी अनमोल स्मृति द्वारा समाज में शान्ति-व्यवस्था और सौहार्द बनाये रखने के लिए अग्रणीय तथा अनुकरणीय प्रयास किया है।
संदर्भ सूची-
1. एम0ए0बुच, ए सर्वे आॅफ एकनाॅमिक्स एण्ड एकनाॅमिक लाइफ इन एनाशियेन्ट इण्डिया, भाग-1, पृ0-1 ।
2. यजुर्वेद, 40/1 ।
3. मनुस्मृति, 9/103 ।
4. याज्ञवल्क्य-स्मृति, 2/114 ।
5. मनुस्मृति, 9/104 ।
6. विष्णु-स्मृति, 17/2, 3 ।
7. याज्ञवल्क्य-स्मृति, 2/121,    8.    वही 2/114-115

भविष्य के तीर्थंकर


अन्जू गुप्ता
शोध छात्रा, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग,
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।

                ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन सभी धर्मों में भविष्य के संदर्भ में कोई न कोई अवधारणा प्राप्त होती है। वैष्णव धर्म अवतारवाद की प्रतिष्ठापना करता है, जिसमें ‘कल्कि’ को भविष्य का अवतार बताया गया है। बौद्ध धर्म मैत्रेय सहित कुल 10 भावी बुद्धों का उल्लेख करता है और वहीं जैन धर्म में भविष्य में होने वाले तीर्थंकरों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
जैन धर्म में काल के दो विभाग हैं- अवसर्पिणी काल तथा उत्सर्पिणी काल। इसमें अवसर्पिणी काल अनुलोम अर्थात् ह्रासोन्मुख और उत्सर्पिणी काल प्रतिलोम अर्थात् उत्कर्षोन्मुख कहा गया है। जिस प्रकार अवसर्पिणी काल में तीर्थंकर आदि हुए हैं उसी प्रकार आगे आने वाले उत्सर्पिणी काल में भी तीर्थंकर होते रहेंगे। जैन धर्म में यह भी बताया गया है कि जम्बूद्वीप सात क्षेत्रों में विभाजित है- भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत।1 भरत क्षेत्र में अवसर्पिणी काल के 6 विभाग होते हैं जिनके नाम और विभाग इस प्रकार हैं-
1. सुषमा-सुषमा, 2. सुषमा, 3. सुषमा-दुषमा, 4. दुषमा-सुषमा, 5. दुषमा, 6. दुषमा-दुषमा (अति दुषमा)।
यही 6 काल विभाग उत्सर्पिणी काल में भी होते हैं। लेकिन ये अवसर्पिणी काल के 6 विभागों के उल्टे अनुक्रम से होते हैं।
जैन ग्रन्थों में यह वर्णन मिलता है कि जिस प्रकार अवसर्पिणी काल में 63 शलाका पुरुषों2 (24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलदेव, 9 वासुदेव और 9 प्रति-वासुदेव) का अस्तित्व था उसी प्रकार उत्सर्पिणी काल में भी 63 शलाका पुरुष होंगे, जिसमें भविष्य के 24 तीर्थंकरों की सूची कुछ परिवर्तन के साथ अनेक जैन ग्रन्थों यथा- समवायांग, तित्थोगाली-पइण्णय, तिलोय-पण्णत्ती, हरिवंश पुराण, उत्तर पुराण, त्रिलोकसार, अभिधान चिन्तामणि आदि से प्राप्त होती है। लगभग इन सभी ग्रन्थों में भावी तीर्थंकरों की संख्या 24 बतायी गयी है यद्यपि कि उनके क्रम तथा नामों में कुछ-कुछ भिन्नता अवश्य ही है। उपरोक्त सभी ग्रन्थों में जो 24 भावी तीर्थंकरों के नाम दिये गये हैं उनका वर्णन आगे सूची द्वारा किया गया है-





उपरोक्त सभी ग्रन्थों में (अभिधान चिन्तामणि को छोड़कर) भविष्य के प्रथम तीर्थंकर का नाम महापद्म दिया गया है जिनके विषय में विस्तृत जानकारी तित्थोगाली-पइण्णय से मिलती है। ‘‘तित्थोगाली-पइण्णय’’ में वर्णित प्रथम भावी तीर्थंकर ‘महापद्म’-
ऐसी मान्यता है कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का परम भक्त राजा श्रेणिक था। वह राजा अपनी 84,000 वर्ष की आयु पूर्ण कर भगवान महापद्म के रूप में सुमति नामक राजा की रानी भद्रा के गर्भ से उत्पन्न होंगे। इनका जन्म आगामी उत्सर्पिणी काल के दुषम-सुषम नामक तृतीय आरक के तीन वर्ष और साढ़े 8 मास व्यतीत होने पर अर्थात् चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को चन्द्र का हस्तोत्तरा के साथ योग होने पर होगा।
जब प्रथम भावी तीर्थंकर का जन्म होगा तो विविध रत्नों की कलकल करती हुयी वसुधारा की वर्षा होगी और गगनमण्डल में देवताओं द्वारा प्रताडि़त दुन्दुभियों का मधुर गम्भीर घोष गुंजरित हो उठेगा।11 उसके बाद दिशा कुमारियां यान-विमानों पर आरूढ़ होकर वहां आएंगी। यान-विमानों के दिव्य प्रकाश के कारण समस्त शतद्वारा नगरी प्रकाश से जगमगा उठेगी। देवियां बड़ी प्रसन्न होंगी तथा देवों के समूह आनन्दित होकर पद्ममणियों, रत्नों एवं स्वर्ण मुद्राओं की बड़ी सुन्दर वर्षा करेंगे। उस समय के ग्राम नगरों के समान, नगर देवलोक के समान, कुटुम्बी राजा के समान और राजा वैश्रवण के समान होंगे और उस समय लोग पारस्परिक द्वेष से रहित, भय, दण्ड, महामारी तथा चोर-लुटेरों के भय से विहीन तथा कर भार से उन्मुक्त होंगे।
तत्पश्चात् तित्थोगाली-पइण्णय में भावी तीर्थंकर महापद्म के रूप-सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जब ये पैदा होंगे तो- ‘‘इनके बाल भौंरे के समान काले-काले होंगे, आँखें अति विशाल, होंठ बिम्ब फल के समान लाल-लाल, दाँत स्वच्छ, सफेद पंक्तिबद्ध और वर्ण गौर होगा तथा ये प्रफुल्लित नील कमल के फूल की गन्ध के समान सुगन्धित श्वास- निःश्वास वाले होंगे। यथा-
असित सिरतो सुनयणो बिंबट्ठो धवलदंती पंतीओ।
वरपउमगब्भगोरो, फुल्लुप्पल गंधनीसासो।।12
इनका नामकरण करते समय महाराज सुमति अपने परिजनों के समक्ष कहेंगे- ‘‘जिस समय हमारे नगर में इस पुत्र का जन्म हुआ उस समय पद्म-मणियों की वर्षा हुयी अतः इसका नाम महापद्म रखा जाएगा।’’ यथा-
जम्हा अम्हं नगरे, जायं जंमे इमस्स पुत्तस्स।
पउमेहिं महावासं, नामं से तो महा पउमो।।13
ये प्रभु महापद्म कभी क्षीण न होने वाले मति (इन्द्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान) श्रुति (सुनकर प्राप्त किया गया ज्ञान), अवधि (कहीं रखी हुयी किसी भी वस्तु का दिव्य अथवा अलौकिक ज्ञान), इन तीन ज्ञान से युक्त तथा उस समय के सभी मनुष्यों की अपेक्षा अत्यधिक कान्ति एवं पुष्टि वाले होंगे। तदनन्तर इनके माता-पिता इनको 8 वर्ष से अधिक वय के जानकार कौतुकालंकारों से अलंकृत कर लेखाचार्य के पास ले जायेंगे। देवराज शक्र लेखाचार्य के समक्ष ही भगवान महापद्म को उच्च आसन पर आसीन कर उनसे शब्द का स्वरूप पूछेंगे। तीन ज्ञान को धारण करने वाला यह बालक महापद्म इन्द्र को शब्द के लक्षण, अवयव आदि की विस्तारपूर्वक व्याख्या कर व्याकरण के गूढ़ रहस्य को बताएगा।14
इसके पश्चात् इनके माता-पिता इनका राज्याभिषेक करेंगे और इसके बाद इनके माता-पिता शुभ तिथि और शुभ करण में बड़े सामन्त कुल में उत्पन्न हुयी यशोदा नामक एक सुन्दर राजकुमारी के साथ इनका विवाह करेंगे यहाँ पर एक उल्लेखनीय बात यह है कि 24वें तीर्थंकर महावीर का विवाह भी यशोदा नाम की कन्या से हुआ था।
तित्थोगाली में इसके पश्चात् महापद्म के विषय में ऐसा कहा गया है कि महापद्म आगामी उत्सर्पिणी काल में भरत क्षेत्र के प्रथम राजा होंगे तथा मणिभद्र और पूर्णभद्र देव उन राजा महापद्म के लिए अश्व-गज एवं रथारोही योद्धाओं की एक अति विशाल सेना संगठित करेंगे।15 पूर्व-जन्म के मित्र देवों द्वारा सेना के संगठित किये जाने के कारण महापद्म का दूसरा नाम देवासुर पूजित देवसेन भी प्रसिद्ध होगा। यथा-
जम्हा देवा सेणं पडियग्गंति उ पुव्व संगइया।
तम्हा उ देवसेणो, देवासुर पूजितो नाम।।16
विमल यश के भागी राजा महापद्म सर्वांग सुन्दर चतुर्दन्त नामक एक महान एवं श्वेत रंग के हाथी पर आरोहण करेंगे इसलिए उनका तीसरा नाम विमलवाहन भी प्रसिद्ध होगा। यथा-
धवलं गयं महंतं, सत्तंग पइट्ठितं चउद्दंतं।
वाहेति विमल जसो, नामं तो विमलवाहणोत्ति।।17
इस प्रकार प्रथम भावी तीर्थंकर महापद्म के 2 और नाम- देवसेन तथा विमलवाहन भी होंगे।
इसके पश्चात् ऐसा बताया गया है कि महावीर स्वामी के समान महापद्म भी 30 वर्ष तक गृहवास करेंगे और उसके बाद जब इनके माता-पिता स्वर्गस्थ हो जाएंगे तब ये प्रव्रजित होंगे। प्रव्रजित होने से पहले एक वर्ष तक प्रतिदिन सूर्योदय पश्चात् एक प्रहर तक स्वर्ण-मुद्राओं का वर्षीदान देंगे और इस प्रकार लोकान्तिक देवों द्वारा किये गये निवेदन से एक वर्ष पश्चात् भगवान महापद्म का अभिनिष्क्रमण होगा।18 एक वर्ष तक प्रतिदिन तीर्थंकर भगवान द्वारा जो दान दिया जाता है उसमें कुल मिलाकर (वर्ष भर में) तीन अरब अट्ठासी करोड़ और अस्सी लाख स्वर्ण मुद्राओं का दान दिया  जाता है।
तित्थोगाली में इसके पश्चात् यह बताया गया है कि ‘सारस्वत, आदित्य, वह्नि, वरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध, अग्राह्य और अरिष्ट ये 9 देवनिकाय अर्थात् लोकान्तिक देव समस्त संसार के प्राणियों का हित करने वाले भगवान महापद्म से कहेंगे- ‘‘भगवन्! तीर्थ का प्रवत्र्तन कीजिए।’’19 और इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति किये जाने पर भगवान महापद्म को तीर्थ-प्रवचन का ध्यान आएगा और उसी क्षण भवनपति, ज्योतिष्क और वैमानिक देव पृथ्वीतल और आकाश में बिजली का प्रकाशन करेंगे। तथा महापद्म के विषय में ऐसा कहा गया है कि वे अपना राज्य अपने ज्येष्ठ पुत्र नलिनी कुमार को सौंपेंगे जबकि यह बात महावीर स्वामी के साथ नहीं थी।
इसके बाद उन भगवान महापद्म के लिए चन्द्रप्रभा नामक की एक पालकी लायी जाएगी जो कि सर्वतः सुसज्जित होगी। वह चन्द्रप्रभा नाम की जो पालकी होगी वह 50 धनुष लम्बी, मध्य में 25 और शेष आगे-पीछे के भागों में 20 धनुष चैड़ी तथा 36 धनुष ऊँची बतायी गयी है। उस चन्द्रप्रभा शिविका के बीचोबीच उन भगवान महापद्म तीर्थंकर के लिए पादपीठ सहित दिव्य मणियों, रत्नों एवं स्वर्ण से निर्मित एक मूल्यवान सिंहासन होगा। और सुविशाल भाल पर अति ललित मुकुट धारण किये हुए प्रकाशमान देह छवि वाले अजानु विशाल वनमालाओं से विभूषित एवं लाख स्वर्ण मुद्राओं के मूल्य वाले श्वेत वस्त्र को धारण किये हुए अति विशुद्ध अध्यवसायों (परिणामों) एवं लेश्याओं से युक्त भगवान महापद्म उस चन्द्रप्रभा पालकी पर आरूढ़ होंगे। पालकी के मध्य भाग में स्थित सिंहासन पर प्रभु महापद्म आसीन होंगे। भगवान महापद्म की उस पालकी को आगे की ओर से मनुष्य तथा पीछे की ओर से असुरेन्द्र, सुरेन्द्र तथा नागेन्द्र वहन करेंगे।20
और तब उस समय वहाँ का वातावरण अत्यन्त ही रमणीय हो उठेगा जिस प्रकार प्रफुल्लित सुविशाल पुष्प वन अथवा शरद ऋतु में पद्म-सरोवर यत्र-तत्र सर्वत्र खिले फूलों से सुशोभित होता है, उसी प्रकार सुरों एवं सुरबालाओं के समूहों से व्याप्त वहां का गगन मण्डल इस प्रकार शोभायमान होने लगेगा मानो सिद्धार्थ वन, सरण वन, अशोक वन और आम्रवन एक साथ ही वहाँ कुसुमित हो उठे हों।21
इस प्रकार ये भगवान महापद्म चन्द्रप्रभा नामक पालकी में बैठकर देवों, मनुष्यों एवं असुरों की परिषदों द्वारा घिरे हुए एवं स्तूयमान भगवान महापद्म शतद्वार नगर के मध्यवर्ती मुख्य मार्गों में निरन्तर दान देते हुए तथा नलिन कुमार से सेवित वीरवर पद्मिनी खण्ड नामक उद्यान में पधारेंगे। तब प्रभु महापद्म पद्मिनी खण्ड नामक उस उद्यान में ईशान दिशा में पहुँचने पर पालकी से नीचे उतर कर स्वयमेव ‘पंचमुष्टि-लुंचन’ करेंगे।
इसके पश्चात् भगवान महापद्म सिद्धों को नमस्कार कर यह प्रतिज्ञा करेंगे-
‘‘मेरे लिए सब प्रकार के पाप अकरणीय हैं और इस प्रकार की प्रतिज्ञा द्वारा वे चारित्र (पंचमहाव्रत) ग्रहण करेंगे।’’
यथा-
काऊण नमोक्कारं, सिद्धाणमभिग्गहं तु सो गिण्हे।
सव्वं मे अकरणिज्जं, पावंति चरित्तमारूढो।।22
तित्थोगाली में इसके पश्चात् महापद्म के ज्ञान प्राप्त करने के सन्दर्भ में ऐसा कहा गया है कि तपश्चरण और श्रमण-गुणों में अनुरक्त भगवान महापद्म अनुक्रमशः अप्रतिहत विहार करते हुए वैशाख शुक्ल दशमी के दिन जृम्भिका नामक ग्राम के बाहर शालवृक्ष के नीचे उकङू (गोदोहिका) आसन से बैठे हुए बैले की तपस्या से केवल ज्ञान प्राप्त करेंगे। यहाँ पर एक बात उल्लेखनीय है कि महावीर स्वामी को भी जृम्भिक नामक ग्राम के समीप एक शाल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। और तब अनन्त ज्ञान, दर्शन और अनन्त चारित्र के उत्पन्न होने पर जम्बू द्वीपस्थ भरत क्षेत्र के आगामी प्रथम तीर्थंकर भगवान महापद्म रात्रि के समय में ही विहार कर महासेन वन नामक उद्यान में समवसृत होंगे।
तत्पश्चात् सुरेन्द्रों तथा नरेन्द्रों द्वारा पूजित प्रभु महापद्म मध्यम पावा नगरी में हुए दूसरे समवसरण में धर्मचक्रवर्ती प्रवर के पद से विभूषित होंगे।23 भगवान महावीर के समान प्रथम भावी तीर्थंकर महापद्म के भी 11 गणधर होंगे, जो कि मध्यम पावा में अनुष्ठित होने वाले यज्ञ की यज्ञशाला में एकत्र होंगे। उन 11 गणधरों में प्रमुख एवं प्रथम गणधर ‘काम कुम्भसेन’ होगा, जो महासत्त्वशाली और महान धीर वीर होगा।
और इसके बाद वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन प्रथम प्रहर में हस्तोत्तरा नक्षत्र के योग में भगवान महापद्म गणिपिटक (द्वादशांगी) के अर्थ का उपदेश करेंगे।24 और तब उस समय माता-पिता देव दम्पती तुल्य, सास माता के समान ममतामयी और श्वसुर पिता तुल्य स्नेह मूर्ति होंगे। उस समय के मानव धर्म तथा अधर्म के भेद को भली-भाँति जानने वाले, विनय, सत्य एवं शौच सम्पन्न, गुरू और साधु जनों की पूजा में तत्पर और संतोषी होंगे। उस समय के लोग विज्ञान सम्पन्न और धर्म के प्रति आदर भाव रखने वाले होंगे। उस समय विद्या सम्पन्न पुरुषों का पूजा-सत्कार किया जाएगा और कुल तथा शील को सर्वाधिक महत्व दिया जाएगा। इस प्रकार फूलों से लहलहाते हुए जनपदों में भगवान महापद्म विचरण करेंगे।
और इस प्रकार तित्थोगाली में यह बताया गया है कि अन्त में जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र के आगामी उत्सर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर महापद्म कार्तिक की मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम रात्रि में शेष अघाती चार कर्मों के जाल को भी पूर्णतः समाप्त कर अपर अपापा नगरी में सिद्ध, बुद्ध एवं मुक्त होंगे। यथा-
निट्ठविय कम्मजालो, कत्तियबहुलस्स चरम रातीए।
सिज्झिहिति नाम पउमो, अण्णाए पावा नगरीए।।25
इस प्रकार कहा जा सकता है कि तित्थोगाली-पइण्णय में भविष्य के प्रथम तीर्थंकर महापद्म की पूरी जीवन कहानी ही वर्णित कर दी गयी है। तित्थोगाली में इनके अतिरिक्त 23 और तीर्थंकर बताये गये हैं जिनके नाम सूची में वर्णित हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं हिन्दू धर्म में जो स्थान ईश्वर के अवतारों का है वही स्थान बौद्ध धर्म में बुद्धों का तथा जैन धर्म में तीर्थंकरों का। जहाँ तक हिन्दू परम्परा की बात है यहाँ पर अवतार का उद्देश्य साधुजनों के उद्धार, लोगों के कल्याण के साथ ही साथ दुष्टजनों का संहार भी है जबकि जैन परम्परा में तीर्थंकरों का उद्देश्य लोगों का कल्याण तो है लेकिन मात्र उपदेश के द्वारा न कि संहार के द्वारा। ऐसा इसलिए क्योंकि जैन धर्म में अहिंसा पर बल दिया गया है। यद्यपि कि जितनी लोकप्रियता भावी अवतार कल्कि को तथा भावी बुद्ध मैत्रेय को मिली है, उतनी लोकप्रियता भावी तीर्थंकरों को नहीं मिली है। इस बात की पुष्टि इसी से हो जाती है कि जहाँ ब्राह्मण और बौद्ध ग्रन्थों में भविष्य के अवतार कल्कि तथा भावी बुद्ध मैत्रेय के संदर्भ में पर्याप्त सूचना उपलब्ध होती है साथ ही पुरातात्विक साक्ष्यों जिसमें मुख्यता मूर्तियों से भी इन दोनों अवतारों के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध होता है वहीं जैन ग्रन्थों के विवरण में भविष्य के तीर्थंकरों के संदर्भ में निश्चित एवं प्रामाणिक सूचना का अभाव दिखायी देता है तथा पुरातात्विक साक्ष्यों में भी इस प्रकार की सूचना की नितान्त अनुपलब्धता है। इससे ऐसा लगता है कि जैन धर्म ने भावी अवतार तथा भावी बुद्ध की अवधारणा से प्रेरणा लेने का प्रयत्न किया है। 24 भावी तीर्थंकरों के नाम कुछ जैन ग्रंथों यथा- समवायांग तित्थोगाली, तिलोय-पण्णत्ती, हरिवंश पुराण, उत्तर पुराण, त्रिलोकसार, अभिधान चिन्तामणि इत्यादि से मिलती है। उपरोक्त ग्रंथों (तित्थोगाली को छोड़कर) में केवल इनके नाम ही मिलते हैं। तित्थोगाली से प्रथम तीर्थंकर महापद्म के जीवन के विषय में कुछ जानकारी मिलती है जिसे देखकर लगता है कि महावीर स्वामी तथा प्रथम भावी तीर्थंकर महापद्म के जीवन में काफी समानताएं थीं जैसे- दोनों ही तीर्थंकरों (महावीर तथा महापद्म) की पत्नी का नाम यशोदा, गृहस्थ जीवन का समय 30 वर्ष, शालवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति तथा साथ ही दोनों ही तीर्थंकरों के गणधरों की संख्या 11 बतायी गयी है। इससे ऐसा लगता है कि प्रथम भावी तीर्थंकर महापद्म का जीवन महावीर स्वामी के जीवन से प्रेरित होगा।
संदर्भ ग्रन्थ

1. भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का योगदान, हीरा लाल जैन, भोपाल, 1975, पृ0 94
2. वही, पृ0 10
3. महापउमे सूरदेवे सूपासे य सयंपभे। सव्वाणभूई अरहा देवस्सुए य होक्खइ।।
उदए पेढालपुत्ते य पोट्टिले सत्तकित्ति य मुणिसुव्वए य अरहा सव्वभावविऊ जिणे।।
अममे णिक्कसाए य निप्पुलाए य निम्ममे। चित्तउत्ते समाही य आगमिस्सेण होक्खइ।।
संवरे अणियट्टी य विजए विमले ति य। देवोववाए अरहा अणंतविजए इ य।।
एए वुत्ता चउव्वीसं भरहे वासम्मि केवली। आगामिस्सेण होक्खंति धम्मतित्थस्स देसगा।।
समवायांग सूत्र, भगवत्सु धर्म स्वामि प्रणीत, पं0 हीरालाल जी शास्त्री (अनु0) राजस्थान, 1982, 667/74-78
4. सुमंगले य सिद्धत्थे णिव्वाणे य महाजसे। धम्मज्झए य अरहा आगामिस्साण होक्खई।।
सिरिचंदे पुप्फकेऊ महाचंदे य केवली। सुयसागरे य अरहा आगामिस्साण होक्खई।।
सिद्धत्थे पुण्णघोसे य महाघोसे य केवली। सच्चसेणे य अरहा आगमिस्साण होक्खई।।
सूरसेणे य अरहा महासेणे य केवली। सव्वाणंदे य अरहा देवउत्ते य होक्खई।।
सुपासे सुव्वए अरहा अरहे य सुकोसले। अरहा अणंतविजए आगमिस्साण होक्खई।।
विमले उतरे अरहा अरहा य महाबले। देवाणंदे य अरहा आगमिस्साण होक्खई।।
एए वुत्ता चउव्वीणं एरवयम्मि केवली आगमिस्साण होक्खंति धम्मतित्थस्स देसगा।।
समवायांग सूत्र, भगवत्सु धर्म स्वामी प्रणीत, पं0 हीरा लाल जी शास्त्री (अनु0) राजस्थान, 1982, 674/89-95
5. महा पउमे हिय सुरदेवे सुपासे य सयंपभे। सुव्वाणुभूति अरहा, देवगुत्तो य होहिहि।।
उदग पेढाल पुत्तेय पोट्टिले सत्त गीत्तिय। मुणिसुव्वते य अरहा सत्वभाव विउजिणे।।
अममे णिक्कसाए य, निप्पुलाए य निम्ममे। चित्तगुत्ते समाही य आगमिस्साए ते होहिति।।
संवरे अणियवट्ठी य विवागे विमलित्ति य। देवोववायए अरहा समाहिं पढिदिसंतु मे।।
अणंतविजए तियए, एतेवुत्ता चउव्वीसं। भरहे वासंमि केवली आगमेस्साए होहिंति।।
तित्थोगाली-पइण्णय, पन्यास कल्याण विजय गणिवर (सं0) जालोर, 1975, गाथा सं0 1116-1120
6. महापउमो सुरदेओ सुपासणामो सयंपहो तहय। सव्वपहो देवसुदो कुलसुदउदकाय पोट्ठिलओ।।
जयकित्ती मुणिसुव्वयअरयअपापा यणिक्कसायाओ। विउलोणिम्मलणामा अ चित्तगुत्तो समाहिगुत्तो य।।
उणवीसमो सयंभू अणिअट्टी जयो य विमलणामो य।तह देवपालणामा अणंतविरिओ अ होदि चउवीसा।। तिलोय-पण्णत्ती, श्री-यति-वृषभाचार्य विरचित, पं0 बालचन्द सिद्धान्त शास्त्री (अनु0) शोलापुर, 1943, गाथा सं0 1579-1581
7. तीर्थकृच्च महापद्मः सुरदेवो जिनाधिपः। सुपाश्र्वनामधेयोऽन्यो यथार्भश्च स्वयंप्रभः।।
सर्वात्मभूत इत्यन्तो देवदेवः प्रभोदयः। उदङ्कः प्रश्नकीर्तिश्च जयकीर्तिश्च सुव्रतः।।
अरश्च पुण्यमूर्तिश्च निष्कषायो जिनेश्वरः। विपुलो निर्मलाभिख्यश्चित्तगुप्तोपरः स्मृतः।।
समाधिगुप्तनामान्यः स्वयम्भूरनिवर्तकः। जयो विमलसंज्ञश्च दिव्यपाद इतीरितः।।
चरमोऽनन्तवीर्योऽमी वीर्यधैर्यादिसद्गुणाः। चतुर्विंशतिसंख्याना भविष्यत्तीर्थकारिणः।।
हरिवंश पुराण, जिनसेन प्रणीत, पं0 पन्ना लाल जैन साहित्याचार्य (सं0) भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1962, 60/558-562
8. उत्तर पुराण, आचार्य गुणभद्रकृत, डा0 पन्ना लाल जैन (अनु0),       नई दिल्ली, 1993, षटसप्ततितम पर्व, 477-481
9. महापउमो सुरदेवो सुपासणामो सयंपहो तुरियो। सव्वप्पभूद देवादीपुत्तो होहि कुलपुत्तो।।
तित्थयरूदंक पोट्ठिल जयकित्ती मुणिपदादि सुव्वदओ। अरणिप्पावकसाया विउलो किण्हचरणिम्मलओ।।
चित्तसमाहीगुत्तो सयंभु अणिवट्टओ य जय विमलो। तो देवपाल सच्चइपुत्तचरोऽणंतविरीयंतो।।
त्रिलोकसार, नेमिचन्द्र विरचित, बिदुषी आर्यिका (हिन्दी टीकाकत्री), राजस्थान, वीर निर्वाण संवत 2501 गाथा सं0 873-875
10. भाविन्यां तु पद्मनाभः शूरदेवः सुपाश्र्वकः स्वयम्प्रभश्च सर्वानुभूति र्देव श्रुतोदयौ।
पेढालः पोट्टिलश्चापि शतकीर्तिश्च सुव्रतः अममो निष्कषायश्च निष्पुलाकोऽथ निर्ममः।
चित्रगुप्तः समाधिश्च संवरश्च यशोधरः विजयो मल्लदेवौ चानन्तवीर्यश्च भद्रकृत।।
अभिधानचिन्तामणि, श्री हेमचन्द्राचार्य विरचित, पं0 हरगोविन्दशास्त्री (व्याख्याकार), वाराणसी, 1964 1/53-55
11. तित्थोगाली-पइण्णय, पन्यास कल्याण विजय गणिवर (सं0) जालोर, 1975, गाथा सं0 1034
12. वही, गाथा सं0 1047
13. वही, गाथा सं0 1042
14. वही, गाथा सं0 1048-1050
15. वही, गाथा सं0 1053
16. वही, गाथा सं0 1054
17. वही, गाथा सं0 1055
18. वही, गाथा सं0 1056-1057
19. वही, गाथा सं0 1064-65
20. वही, गाथा सं0 1073-1079
21. वही, गाथा सं0 1081-1082
22. वही, गाथा सं0 1090
23. वही, गाथा सं0 1098
24. वही, गाथा सं0 1101
25. वही, गाथा सं0 1111

सात्र्रीय नीतिशास्त्र में ईश्वर का स्थान


अमित यादव
शोध छात्रा, दर्शन एवं धर्म विभाग,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।


             अस्तित्ववादी विचारक जाॅन पाल सात्र्र ने मनुष्य को अस्तित्ववादी चेतन सत के रूप में स्वीकार कर उसके जीवन के प्रत्येक पक्ष और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार कर अपना मत प्रस्तुत किया। सात्र्र के अस्तित्ववादी विचार का दर्शन सबसे पहले उनकी साहित्यिक रचनाओं में होता है किंतु एक अस्तित्ववादी दार्शनिक कृति के रूप में उनका ग्रंथ ‘बीइंग एण्ड नथिंगनेस’ 1943 में प्रकाशित हुआ जिसमें इन्होंने मानव जीवन से जुड़ी समस्याओं पर अस्तित्ववादी समाधान प्रस्तुत किया है।
मनुष्य सात्र्र के लिए क्या है? यह जानने के उपरांत ही यह निर्णय किया जा सकता है कि सात्र्र के नीतिशास्त्रीय अथवा नैतिकता के संदर्भ में क्या मत है और किसी मानववाह्य आध्यात्मिक सत्ता के साथ उसका क्या सम्बन्ध है। इस संदर्भ में सात्र्र का सत्ता सम्बंधी मत अत्यंत प्रासंगिक है जिसमें इन्होंने मनुष्य को ‘पोर-सोई’ की संज्ञा दी है, इसे अंग्रेजी में ‘बीइंग फार इटसेल्फ’ कहते हैं जिसका तात्पर्य है स्वनिमित्त सत होना। इसके अतिरिक्त अन्य सांसारिक भौतिक वस्तुओं को सात्र्र ‘एन-सोई’ की संज्ञा देता है जिसे अंग्रेजी में ‘बीइंग-इन-इटसेल्फ’ कहा जाता है जिसका तात्पर्य है- अपने आप में सत। एन-सोई का एकमात्र गुण इसका अस्तित्व है। सात्र्र के लिए अचेतन सत बेतुका, अर्थहीन है। मनुष्य अपने प्रयोजनानुसार इनको सार्थक बनाता है।
सात्र्र ने पोर-सोई या बीइंग फार इटसेल्फ को और स्पष्ट करते हुआ कहा है कि ‘‘अपने लिए सत्ता एक ऐसा सत् है, जिसके होने में उसका सत् एक प्रश्न है, वह सत् एक प्रकार से सत् नहीं है। सत् तो उससे भिन्न है, जिसे चेतना निर्दिष्ट करती है।’’1 अर्थात् चेतना द्वारा निर्धारित सत ही मानव अस्तित्व का परिचायक है। चेतना के संदर्भ में सात्र्र का कहना है कि चेतना पूर्णतया अस्तित्वमय है और अपने द्वारा ही अपना निर्धारण उसकी मूल प्रवृत्ति है।2 इस प्रकार सात्र्र का पोर-सोई अथवा बीइंग फार इटसेल्फ चेतनायुक्त अस्तित्ववान मनुष्य है। सात्र्र ने मनुष्य को स्वनिमित्त-सत ;ठमपदह वित पजेमसद्धि एवं अपने में सत ;ठमपदह पद पजेमसद्धि का समुच्चय कहा है। ‘अपने में सत’ उसका भौतिक पक्ष है और ‘अपने लिए सत’ अथवा स्वनिमित्त सत मनुष्य की चेतना है। इसी क्रम में वह निरंतर अपना निर्माण करता रहता है। सात्र्र ने मनुष्य के जीवन को एक योजना, सतत अभियान और चयन की प्रक्रिया माना है। इनके अनुसार यही मनुष्य के अस्तित्व का परिचायक है जो इसे स्वीकार नहीं करता, वह पलायनवादी है। सात्र्र का कहना है कि चेतनायुक्त अस्तित्ववान मानव का स्वरूप है- स्वतंत्रता। स्वतंत्रता का तात्पर्य है संकल्प स्वातंत्र्य अर्थात् विभिन्न कार्य मार्गों में से किसी एक का चयन एवं तद्नुसार आचरण। सात्र्र का मानना है कि मनुष्य द्वारा निर्णयों अथवा कार्यों के चयन में किसी प्रकार की बाधा को पार करने का सामथ्र्य उसकी स्वतंत्रता में निहित है। इस प्रकार सात्र्र का मानना है कि मनुष्य चेतनायुक्त अस्तित्ववान ऐसा जीव है जिसका स्वरूप स्वतंत्रता है। अपनी इस स्वतंत्रता के द्वारा ही वह अपने भविष्य को गढ़ता है। जन्म से ही मनुष्य का सार निर्धारित नहीं होता अपितु स्वयं उसके द्वारा ही रचा जाता है। सात्र्र की प्रसिद्ध उक्ति है ‘‘अस्तित्व सारतत्व के पूर्ववर्ती है।’’3 अपने कथन के समर्थन में सात्र्र में डेकार्ट के कथन का खण्डन किया है। सात्र्र का कहना है कि ‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ’ ऐसा न कहकर ‘मैं हूँ’ इसलिए ‘मैं सोचता हूँ’ कहना अधिक तर्कसंगत है। डेकार्ट ‘मैं सोचता हूँ’ कहकर प्रत्यय को प्राथमिकता देता है और ‘मैं हूँ’ को द्वितीय स्थान प्रदान करता है। सात्र्र के अनुसार ‘मैं हूँ’ (अस्तित्व) सोचने (सारतत्व) के पहले हैं। आत्मा या अपने विषय में यह प्रश्न करना तो उचित है कि ‘मैं क्या हूँ’? किन्तु इसके विपरीत यह प्रश्न करना कि ‘क्या मैं हूँ?’ उचित नहीं है, हास्यास्पद है। अपने अस्तित्व को स्वीकार किये बिना व्यक्ति अपने बारे में  प्रश्न कर ही नहीं सकता। अतः सात्र्र कहते हैं कि अस्तित्व पहले है सारतत्व बाद में। सात्र्र कहते हैं कि ‘‘विषय जगत की संज्ञाएं अपने सारतत्व के माध्यम से जानी जाती हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व को उनका सारतत्व निर्धारित करता है, परंतु मानव जगत या मूर्तमान व्यक्तित्व का अस्तित्व उसके सारतत्व के पहले है।4
इस प्रकार सात्र्र का ‘बीईंग फार इटसेल्फ’ अर्थात चेतन, सत्तावान, स्वरूप-स्वतंत्र प्राणी अपने सारतत्व का निर्माता है। सात्र्र का मनुष्य स्वतंत्र है अपने कार्यों, निर्णयों एवं मूल्यों के चयन में, कोई भी पूर्व निर्धारित मूल्य या नैतिकता नहीं है जो उसे नियमित या सीमित करे अपितु वह स्वयं अपने मूल्यों का निर्माता है। सात्र्र इसका खण्डन करता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है अपितु वह मनुष्य को इसका नियंता व निर्देशक कहता है। वह जो बनना चाहता है वही बनता है। सात्र्र कहता है कि परिस्थिति वह है जिसमें स्वतंत्रता जन्म लेती है। सात्र्र के अनुसार, ‘‘मेरी स्वतंत्रता ही मूल्यों का एकमात्र आधार है मेरे द्वारा किसी भी मूल्य के औचित्य को अन्यत्र ढूँढना सर्वथा बेमानी है। स्वयं का ऐसी सत्ता के रूप में बोध जो स्वयं तो मूल्यों का एकमात्र आधार है, पर जिसके स्वयं के अस्तित्व और प्रक्रियाओं का कोई आधार नहीं है, दुश्चिंता उत्पन्न करता है।’’5 इस प्रकार सात्र्र यह बताते हैं कि किस प्रकार मनुष्य अपनी स्वतंत्रता और उससे उत्पन्न एकाकीपन में कष्ट का अनुभव करता है जिसे सात्र्र ने दुश्चिंता कहा है। इस दुश्चिंता से बचने के लिए हम अपनी वास्तविकता एवं जगत की वास्तविकता को स्वीकार करने से डरते हैं और अपनी स्वतंत्रता से भागने का प्रयास करते हैं ऐसा आचरण करते हैं जैसे कि हम दूसरों से निर्धारित नियंत्रित हो रहे हैं इस प्रक्रम में मनुष्य स्वयं से झूठ बोलता है जिसे सात्र्र ने दुरास्था ;ठंकंिपजीद्ध कहा है। सात्र्र के अनुसार मानव जीवन दुरास्थाओं से भरा पड़ा है.....अपने ही एकाकीपन से भयभीत एवं उत्तरदायित्व को वहन करने में सक्षम मनुष्य ईश्वर का सहारा लेता है। ईश्वर की स्वीकृति मानव अस्तित्व की वास्तविकता से पलायन की एक विधि है। मनुष्य स्वयं को ईश्वरकृत स्वीकार मान उसके हस्तक्षेप को स्वीकार करता है ताकि वह अपने उत्तरदायित्व से बच सके। इस प्रकार सात्र्र ने मनुष्य को मूलतः स्वतंत्र घोषित कर उसे मूल्यों का निर्माता माना है और धर्माधारित नैतिकता, नियतिवाद, पूर्व निर्धारित मूल्यों को अस्वीकृत किया।
सात्र्र मानव जीवन की मौलिकता से इतना प्रभावित था कि वह मानता था कि मनुष्य के अस्तित्व, जीवन और जीवन की सारी योजनाओं की मानवीय ढंग से व्याख्या हो सकती है। इस व्याख्या के लिए ईश्वर के प्रत्यय की आवश्यकता नहीं अपितु इसे स्वीकार करने पर मनुष्य की स्वतंत्रता का हनन होता। अतः सात्र्र ईश्वर के प्रत्यय की आवश्यकता को अस्वीकृत करता है।
सात्र्र कहते हैं कि ईश्वर में विश्वास का आधार जीवन की निस्सारता और निष्फलता है। मनुष्य का जीवन अनिश्चित है। उसे पग-पग पर निराशा मिलती है और संघर्ष करना पड़ता है फलस्वरूप उसे सब कुछ तथ्यहीन और बेकार मालूम पड़ता है। उसे एक सहारे की आवश्यकता होती है और वह ईश्वर में विश्वास जगा लेता है तो उस विश्वास से अधिक मौलिक चिंता, क्लेष और जीवन की सारहीनता की चेतना प्रकट होती है। यदि अपने वैयक्तिक अस्तित्व में अपने आंतरिक जीवन में व्यक्ति को सबकुछ तथ्यहीन प्रतीत होता है तो ईश्वर में विश्वास भी तथ्यहीन है।
सात्र्र द्वारा वर्णित ‘मानव स्वतंत्रता’ एवं ‘ईश्वर’ में मौलिक विरोध है। यदि विश्व की सृष्टि ईश्वर द्वारा हुई है तो इसका अर्थ है कि सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को एक पूर्वनिर्मित भाव के अनुरूप बनाया है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक शिल्पी अपनी कलाकृति का सृजन करता है, किंतु उस दशा में मानव स्वतंत्रता का अपहरण हो जाता है और सात्र्र को यह कदापि स्वीकार नहीं है क्योंकि मानवीय स्वतंत्रता सात्र्र के अस्तित्ववाद की मूल्य मान्यता है।
सात्र्र ने एक अन्य ढंग से भी ईश्वर की आवश्यकता को अस्वीकृत करते हुए कहते हैं कि ईश्वर का भाव मानव मन में उसी ढंग से बनता है जिस ढंग से व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों का आभास होता है। सात्र्र के दर्शन में ‘अन्य व्यक्तियों की दृष्टि’ की चेतना होती है। यह चेतना होती है कि उसे देखा जा रहा है। शायद उसी ढंग से जिस ढंग से वस्तु या पदार्थ को देखा जा रहा है। यदि अन्य व्यक्ति मेरे वातावरण के अंग हैं। यदि मेरे लिए है तो मैं भी उनके वातावरण का अंग हूँ, उनके लिए हूँ, यह चेतना तो अनुभव की है किंतु कभी-कभी जब मनुष्य का मस्तिष्क भाव और प्रत्यय में उलझ जाता है तो वह इन वास्तविक और मानवीय सम्बंधों से अलग हो एक प्रकार से शून्य में ही इन व्यक्तियों की उपस्थिति के पीछे जाने की चेष्टा करता है वह विचार करता है कि शायद कोई ऐसा भी है जो किसी व्यक्ति की दृष्टि का विषय नहीं है, जो अन्य व्यक्तियों के पीछे है और सभी व्यक्ति उसी के लिए हैं। साधारणतः तो हर व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि का विषय है ही केवल वही एक ऐसा व्यक्ति है जो स्वयं किसी की दृष्टि का विषय नहीं किंतु उसकी दृष्टि का विषय सभी है।7 सात्र्र के अनुसार यह ईश्वर के भाव तक पहुँचने का एक ढंग है किंतु इस उद्धरण से पता चलता है कि यह ईश्वर की वास्तविकता या उसके अस्तित्व को स्थापित नहीं करता। इस प्रकार सात्र्र ने ईश्वर को मानव अस्तित्व और उसके जीवन के विविध पक्षों की व्याख्या के लिए अप्रासंगिक, अनावश्यक माना है और इसी अर्थ में सात्र्र नास्तिक है।
सात्र्र यद्यपि कि ईश्वर के स्थान पर मानवीय दुश्चिंता को अधिक मौलिक मानते हैं तथापि वह यह भी स्वीकार करते हैं कि मानव जीवन में कुछ बातें होती है जो उसकी स्वतंत्रता को परिसीमित करती हैं, सात्र्र ने इन्हें ‘तथ्यता’ की संज्ञा दी है जैसे- मेरा स्थान, मेरा अतीत, सहयोगी, मृत्यु इत्यादि। सात्र्र ने कहा है कि स्वतंत्रता के बाधक यह तत्व मनुष्य की स्वतंत्रता के प्रमाण हैं। सात्र्र के अनुसार ‘‘हम सदा किसी न किसी स्थिति में होते हैं और हमारा चुनाव उस स्थिति के द्वारा परिसीमित होता है परंतु उसके भीतर हम अपने चुनाव के लिए स्वतंत्र होते हैं। पर्वत के रूप में बाधा हमारे लिए यह निर्णय लेने का अवसर उपस्थित करती है कि हम आगे बढ़ने से रूक जाएंगे अथवा नये मार्ग की खोज करेंगे। इस प्रकार मनुष्य की स्वतंत्रता ही बाधाओं का भी चुनाव करती है।’’8
पुनः प्रश्न उठता है कि यदि कोई ईश्वर नहीं है, कोई पूर्व निर्धारित मूल्य नहीं है, मनुष्य ही मूल्यों का सृष्टिकर्ता है उसका औचित्य प्रस्तुतकर्ता है तो इस तरह के दर्शन की अनिवार्य परिणति नैतिक अराजकतावाद में होगी। ऐसे में वस्तुनिष्ठ नैतिकता का कोई अर्थ नहीं रह जाता, व्यक्ति जैसा चाहे वैसा आचरण करे, स्वेच्छाचारिता ही शेष रह जाती है।9 इस प्रकार आलोचकों ने सात्र्र के अस्तित्ववाद पर नैतिक-सापेक्षतावाद का आक्षेप किया है।
वस्तुतः सात्र्र के सामने दोहरी समस्या है एक तरफ वह जहाँ ईश्वर या धर्म पर आधारित नैतिकता को स्वीकार करना नहीं चाहते वहीं, दूसरी ओर किसी तरह के नैतिक सापेक्षतावाद से बचना चाहते हैं। अपनी समस्या के समाधानार्थ सात्र्र ने ‘स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व’ पर आधारित नीतिशास्त्र के मध्यम मार्ग को अपनाया है। सात्र्र के अनुसार स्वतंत्रता सदैव ‘अन्य’ के संदर्भ को लिए हुए होती है। हम किसी यूनियन, दल सामाजिक संस्था या किसी धर्म का जो चुनाव करते हैं वह देखने में भले गे कि ये वैयक्तिक रूप से स्वयं मात्र हमसे सरोकार रखता है पर देखा जाय तो हम अपने चयन के द्वारा अन्य के लिए भी उसी तरह के आचरण की अनुशंसा कर रहे होते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो हमारे सारे आचरण सिफारिश या अनुशंसा होते हैं। मैं अपने कतृत्व द्वारा अन्यों के लिए जो उसी परिस्थिति में है दृष्टांत उपस्थित कर रहा होता हूँ वस्तुतः मैं मानवमात्र के प्रतिनिधि के तौर पर आचरण कर रहा होता हूँ।10 इस प्रकार सात्र्र ने नैतिक सापेक्षतावाद के आक्षेप से बचने के लिए स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व का प्रत्यय संलग्न किया और कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने लिए चयन कर रहा होता है तो वह चयन मात्र उसके लिए न होकर सम्पूर्ण मानव जगत के लिए होता है। इस महती उत्तरदायित्व का वहन भी चयनकर्ता द्वारा चयन की प्रक्रिया के दौरान होता है।
वस्तुतः संसार में प्रचलित धर्मों एवं उन पर आधारित नैतिकता और धर्माधारित द्वेषों व संघर्षों का लम्बा इतिहास रहा है जिसने इस प्रश्न को भी जन्म दिया कि क्या ईश्वरविहीन नैतिकता संभव नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर हमें सात्र्र के निरीश्वरवादी नैतिक विचारों में खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ
1-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, translated by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 174
2-             Ibid, p. 5
3-             Satre : Existentialism and Humanism, Mathew & Co., London, 1960, p. 28
4-             Ibid, p. 28
5-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, tr. by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 76
6-             J.P. Sartre : No Exit and Three Other Plays, tr. by Stauart Gilbert, New York, Vintage Books, 1971, pp. 120-121
7-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, translated by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 281

8-             Ibid, p. 465
9. आनन्द मिश्र: अस्तित्ववादी नीतिशास्त्र: सात्र्र के विशेष संदर्भ में, दार्शनिक त्रैमासिक, अखिल भारतीय दर्शन परिषद, अंक-4, 2006, पृ. 142
10. वही, पृ. 144

Economic Thought Of Mahatma Gandhi


Manoj Kumar Singh
 


(U.G.C./J.R.F.) Research Scholar, Deptt. of Philosophy and Religion, B.H.U., Varanasi



            The economic thought of Mahatma Gandhi is based on ethics. He said that the Economics without ethics is rootless. Gandhian concept highlights that the poorest among the poor should be the centre of all economic thinking. Dharma (duty) and morality should be adopted as the pillars of economic growth and social progress. He asserted that in a model economy, each and every person must have a right to equal opportunity. In his words “The real implication of equal distribution is that each man shall have the share with all to meet  all his natural needs and no more.” Thus, he stressed upon removal of poverty and inequality. He never said that all are equal but all should be treated without discrimination. In Gandhiji’s words, “equality is of soul and not bodies, behave to realize equality in the midst of this apparent external inequality.”
            Clearly, the root of Gandhian economic thought is the ideal of Sarvodaya. ‘Sarvodaya’ depicts welfare as it accepts the dignity and value of labour. According to Gandhiji the value of a barber and a lawyer is same, so all should have the same right to earn their livelihood by the sweat of their brow.
            For economic equality Gandhiji suggested equal distribution. He stressed upon the concept of ‘simple living and high thinking’. He said “cut down your wants, all your economic problems will be solved”. Basic needs of all are same and should be satisfied. If the superfluous consumption at higher levels be curtailed, the quality of life for poor can be improved. Here, Gandhiji emphasized on the ideas of ‘non-possession’ and ‘non-attachment.”
            In this context, Gandhiji gave the ‘theory of trusteeship’. It aims at transforming a capitalistic society into a welfare society, and the foundation of this change will be love and self sacrifice. While the rich man would be left in possession of his wealth, he could use only part of it which he requires for his personal needs and will act as a trustee for the rest to be used by the society at Large.1 In Gandhiji’s words, “If however, in spite of the at most effort, the rich do not become guardians of the poor in the true sense of the term and the latter are more and more crushed and die of hunger, what is to be done? In trying to find out the solution of this riddle I have considered non-violence, non- cooperation and civil disobedience as the right and infallible means. The rich cannot accumulate wealth without the co-operation of the poor in society. If this knowledge were to penetrate and spread amongst the poor, they would become strong and would learn how to free themselves by means of nonviolence from the crushing inequalities which have brought them to the verge of starvation.2
            Gandhiji’s philosophy of trusteeship was based on the faith that ‘Man is a divine spark’. So, any man can not be wholly wicked. And because God dwells in the hearts of all beings, a change of heart is possible. In Gandhiji’s words “I believe in absolute oneness of God, and therefore also of humanity… Though we have many bodies, we have but one soul. The rays of the sun are many through refraction, but they have the same source.”3 He also said that, “I refuse to suspect human nature, it will, is bound to, respond to any noble and friendly action”.4
Gandhiji fervently believed that India’s future lay on development of its villages. An environment of self-help and mutual aid must be created in the villages. They  should be self-reliant units and production centers. He spoke- “In this structure composed of innumerable villages. Life will not be a pyramid with the appex sustained by the bottom. But it will be an oceanic circle whose centre will be the individual always ready to perish for the village, the latter ready to perish for the circle of villages, outermost circumference will not wield power to crush the inner circle, but will give strength to all within and derive its own strength from it.”5 
            He was strongly against heavy industries and machines. According to him “our goal is not mass production but production by the masses.” He advocates the promotion of small scale and household industries that will solve problem of unemployment. “Khadi’ is what Gandhiji spoke about so powerfully.
            To conclude, it can be said that Gandhiji wasn’t a day dreamer. To some extent, we have adopted his concept of decentralized economy. Gandhian concept of ‘self reliant villages’, could be a practical solution to the problems like, unemployment among rural youth and migration from villages. A part from this the ideal of ‘simple living and high thinking’ have the potential to lead, our society towards equality, justice and harmony.


Reference


1.              Philosophical Import of Gandhism, M. Kirti Singh, p.172
2.              Harijan, on 25th August, 1940
3.              Young India, 25-9-1924
4.              Young India, 4-8-1920.
5.              Gandhi as a political thinker, B.S. Sharma, p.92.
6.              Hiren Mukherjee, Gandhi a study, New Delhi, 1979.
7.              D.M. Dutta, the Philosophy of Mahatma Gandhi, University of Calcutta, 1968.

8.              Sarvodaya, Navajiwan Publishing House, Ahmedabad, 1958.

Man-Woman Relationship In The Novels Of Anita Desai


Seema Chauhan
Research Scholar (English), 
Uttar Pradesh Rajarshi Tondan Open University, Allahabad.




                The theme of man-woman relationship in Anita Desai’s novels reveals her consummate craftsmanship. Mrs. Desai sincerely broods over the fate and future of modern woman particularly in male-chauvinistic society and her annihilation at the altar of marriage. The novelist however dose not challenge the futility of marriage as an institution but discloses the inner psyche of the characters through their relations. In Desai’s novels most marriages are proved to be unions of incompatibility. Men are considered to be rational whereas women are sensitive and emotional. They have their different attitudes and interests so they look at thing in different ways and react to same conditions differently. Mostly women have been both culturally and emotionally dependent on me, any disruption of attachment or affiliation are seen not as a loss of relationship but “a total loss of self,”1 which are then seen as neurosis. The relationship between family and insanity as suggested here is relevant to the study of Anita Desai’s characters.
            Anita Desai has explored different aspects of feminine psyche which also includes man-woman relationships. The novel Cry the peacock is a family play mainly concerned with the theme of marital discord between husband, Gautama, and wife, Maya. The play is about maya’s cry for love and relationship in her loveless wedding with Gautama; the peachock’s cry is an implication of Maya’s anguished cry for love and life of involvement. Anita Desai has dealt with a sterile woman, highly sensitive and emotional who is married to Gautama, a busy, prosperous, middle-aged lawyer. The husband is too much engrossed in his own affairs to meet the demands, partly temperamental, partly, spiritual, of his young wife. Gautama’s sensibilities are too rough and practical to suit Maya. Albeit Gautama is a faithful husband who loves and cares her in his own way yet Maya is never satisfied and happy. Usha Pathania, a noted critic, remarks: “Marital relationships are established with the explicit purpose of providing companionship is sadly missing in the relationship between Maya and Gautama.”2 The novel exposes an impression of marital inconguity and unhappy conjugal life. As Kohli points out, “No other writer is so much concerned with the life of young men and woman in Indian cities as Anita Desai is.”3
            The relationships between man and woman point out the plus point and minus point of brides and bridegrooms. Wedding is a union of two souls and two bodies. It is to be established very consciously and carefully. General situations in society are such that no apt time or notion is offered to these affairs. Its outcomes are the clashes, desperation, obsession, alienation and loneliness. “In Indian Society, if a marriage is successful then credit is seldom given to a female for her contribution to make it successful. If a marriage becomes unsuccessful then the woman is sometimes held responsible for the same.”4 But this notions are not accepted by the self-conscious and self-respecting woman in our society. P.F. Patil again suggestes it that, “All marriages in Desai’s novels are more or less business transaction. A marriageable daughter is handed over to the male-partner without considering the delicacy of her mind and feelings. She has to fulfil either the parent’s responsibilities or the relatives demands with diferent intentions.”5 Maya’s marriage with Gautama is a fine instance of her father’s friendship.
            Anita Desai not only portrays the feminine of a common woman but also the subnormal bordering on abnormal woman. The women who are under so much of psychic pressure that they cannot be known for insanity but then they are explicitly normal. The first character that comes to our mind is that of Maya who is hypersensitive and because of her alienation she is almost a mental wreck. Ann Lowry Weir, a remarkable critic, rightly assesses the character of Maya in terms of man-woman relationship through Indian ethos and culture. In this way, in his critical estimation the critic suggests:
Maya is an Indian, and her thoughts have an Indianness about them, despite their disturbed state. She reflects on Indian weather, Indian flora and fauna, Indian religious and mythical figures.6
            Anita Desai in Voices in the city has depicted feminine sensibility mainly through the delineation of man-woman relationship. Firstly, the novel presents an eccentric and inconsistent figure of a conjugal life through Nirode’s parents. The marital conflict changes Nirodes’ parents into psychic demon. The father diverts into a drunkard, adulterate and dishonourable being quite different from an easy-going, sports loving and fond father. The mother is converted from a sweet, sensitive, consummate beauty into a coldly, practical and occupied woaman having no human heat and delicacy even for her own children. Amla’s remarks about her own parents’ incongruous conjugal relationship are obvious.
            Monisha and Jiban signify the most usual and painful instance of conjugal conflict. This paradigm presents an acute complication and heart-crushing agony. Monisha’s winding journey towards her horrible ending paints her physical and psychical diversion in black, mourning colous. From a simple, silent sensitive, beautiful mildly self-centred girl, she transforms into a sterile, insame, diary-writing woman.
            Monisha lives in her husband’s house, shares his bed, serves his family, alleged of stealing juban’s money and it is Jiban who mildly covers her burnt body and begs forgiveness from her relatives. Her death in the end parted the bondages that sequestered her soul and body in the life.
            Indian male-chauvinistic families expect woman to adjust. The opposite tendency of the family members, hostile social conventions and backgrounds make these marital disharmonies as they exist in Indian male-dominated society.
            N.R.Gopal aptly points out that, “The life of a woman like in the given circumstances is never happy and the result is that she burns herself to death. Her impending death by suicide has been poetically described by Anita Desai even before her actual death which comes later in the novel”.7
            Where shall we Go This Summer? Is an extension of Cry, The Peacock – the theme, the atmosphere, the characters, though matured, producing the similar effects to a large extent. It presents another intense commentary on the incoherence of man-woman relationship that renders Sita and Raman, the wife and husband, spiritually homeless. Sita’s psychic plight too is similar to Maya and Monisha. She is also oppressed and depressed with loveless wedlock with Raman.
            In this novel Sita quakes at the views of giving birth to a fifth child. She becomes so upset that she decides to go back to the Island of Manori-that piece of land in which memory and desire, romance and reality, the beautiful and the sinister are inextricably mixed together.Against all the sane advice she goes to the magic island in advance stage of preganancy. She dwells in the world of frenzy, feeling that going to the Island and thereby to the world of childhood, she could prevent the biological process of delivery.
Sita felt to make a compromise to live with her husband and travel alone mentally and emotionally. But after witnessing that tender scene in the garden one evening of a young woman being tenderly caressed by a man, see suddenly became acutely conscious of what she was missing in her life. Later on it became improbable for her to make any compromise. Hence she escaped to the land of magic where she had spent a pleasant with her father. But she found that time had made it spoil there also-on the place and its people. She feels suffocated by the “Vegetarian complacence,” “insularity” and unimaginative way of life of her husband and his people.
This intense realization bring her back to painful reality, forcing her to retrace her steps back toward the safety and slavish security of her house in Bombay, to wait resignedly for the birth of her child. Sita takes more wise step then Maya and controls herself and she acts before a peril can take place.
The man-woman relationship between Raman and Sita is based on the class values, of principles, of confidence even, or between normal, double social standards and the iconoclastic attitude of inflexible honesty. It is an encounter between the adjustment with disappointment, as Raman puts it and the ability to say the great No if and when needed, as trusted by Sita. This is not solely a case of an emancipated woman revolting against the slavish bonds of marriage. It is much more than that, it is a question of basic truth that is better and naked and can neither be hidden, nor be halved to suit individual.
Anita Desai’s next novel Bye-By Blackbird appears to be an authentic study of man-woman relationships abused  by cultural clashes. R.S.Sharma has rightly said that, in the novel “the tension between the local and immigrant blackbird involves issues of alienation and accommodation that the immigrant has to confront in an alien and yet familiar world.”8
Sarah’s identity crisis is to be seen in a later authorial reference in the second chapter of novel. If a girl marries in a similar custom and culture it is very easy for her to adjust to her new home and family members. But inter-caste, and inter-culture wedding causes settlement problems which are not easy to overcome. For Sarah’s situation the problem becomes more intricate for she has married a man whose caste was once ruled over by her own class in spite of ‘progress’ and modernity-old prejudices die-hard.
In the novel Sarah’s problem is human. She wants to remain as a real person either in England or in India. She attempts to remain a sincere wife and hence her marriage life is not undone. Sarah’s husband had been playing riddle albeit not as consciously as she. But he also realizes falseness of his existence in England and Sarah too knows it well. As a wife Sarah does well. Of all wives of Anita Desai Sarah is the best in comprehending and helps her husband. We have all our praise for this alien wife who comprehends her husband, his family and country which she would concede, once in India.
Thus, we see in the context of man-woman relationship that Sarah’s parents avow her and her husband. But the remarkable thing about Sarah is that she is a dedicated wife and even though she endures suffering and psychic torture, she does not hesitate to leave her native country and go for a good tour to India.
Anita Desai’s fire on the mountain creates the problems of man-woman relationship as a basic component part of uninteresting family life. She initiates with Nanda Kaul who finally discharges all her unloving husband and his world. The novel depicts the agonized cry of Nanda Kaul, an old woman who has had too much of the world with her and so longs for a clam, retired life. Nanda Kaul rejoices at least at the outset of her alienated, loveless and affectionless life. Nanda Kaul’s wedding is quite based on physical passion and circumstantial convenience for the male. Nanda Kaul becomes a mother of many unwanted, uncared children. She always arranges the dinner table as a house-wife. Externally everything appears to be smooth, but internally Nanda Kaul burns with a fire of frustration.
On the contrary, Mr. Kaul keeps his beloved Miss Davidson, a teaching staff. He invites her to his separate bedroom. But Nanda shows the frozen smile on her face. She looks his family and his house with commanding confidence. The situations which she faces, upset her and she feels to remain a widow. She is always waiting with a singular, burning, soul-destroying hatred for her husband to cease living, Nanda Kaul lives like a ‘recluse’.
The reality about Nanda Kaul’s husband is that he had never loved or cherished her. He had carried on a lifelong affair with Miss David whom he had not married only because she was a Christian but whom he had loved all his life. She appeared face to face with reality when she was informed of her friend Ila Das’s rape and brutal murder. Thus, the fire on the mountain had destroyed everything for her.
Clear Light of Day is a significant novel in the sense that it does not delineate the traditional theme of Desai’s fictional world rather we get a fresh addition in the treatment of man-woman relationships at the hand of the novelist. In this novel Desai does not write about the tension and coherence between husband and wife but about that between brother and sister. Bim, the chief character of the novel, is free from physical torture of an incompatible wedding: she chooses to take no part in marriage so that she could dedicate herself to look after her mentally retarded brother baba, her old Mira Masi and her younger brother Raja. Bim and Raja are very close to each other. Other character Tara and Bakul’s wedded life is similar to the wedded life of Maya and Gautama; but it presents a lesser point of insanity and perturbation. The novel delineates a pathetic picture of a widow Mira Masi who is customarily destroyed by her relatives and society.
In this novel, we see the growth of Anita Desai’s attitude to the theme of man-woman relationships. Time has played the significant role in their relationships. Not only Anita Desai herself said it in the novel but at the end of the novel there is a quotation from T.S.Eliot’s “Four         uarter” i.e. “Time the destroyer is time the preserver”. D.H.Lawrence points out that “The great relationship for humanity will always be the relation between man and woman. The relation between man and man, woman and woman, parent and child, will always be subsidiary.”9 R.K.Srivastava, has rightly said that “the man_woman relationship becomes more important due to rapid industrialization, growing awareness among woman of their rights and individualities, and the westernization of attitudes and lives of the people.”10
In Custody, a typical novel of Anita Desai, delineates different sorts of man-woman relationships. The novel does not deal with either a sensitive and highly strong woman protagonist or any intense introspection bordering on neurosis. The novelist presents a male protagonists, Deven Sharma, “ a diffident and awkward hero” coming through the trials of life with a positive vision and self sufficiency. The novel is about an unheroic, unimpressive and unassertive lecturer of Hindi in a degree college near Delhi. He is married to an insipid wife Sarla who is miles away from her husband’s literary pursuits. Once again the novelist presents an ill-matched marriage which is the favourite theme of Anita Desai. In this novel, there are two aspects of Deven’s role as a husband and a lecturer and he is a failure in both of them.
In the novel we find Nur Shaeb who rejects his uncultured ugly wife, the more glamorous temptress, Imtiaj Begum. Here female’s physical beauty is magnified at the cost of his first wife’s feelings.
Thus, we see that the two wives Sarla and Imtiaz Begum do not revolt against their obsession and the hegemony of thir husbands. It is only because they are uneducated and having no source of income they are totally dependent on their husbands. They feel about their torment and deserted attitude of their husbands but having no means of their livelifhood they remain their submissively.
Baumgarter’s Bombay is a significant novel based on different plan and Mrs. Desai has explored different aspects of feminine psyche which also include man-woman relationships. The present novel is quite different from her preceding novels. It is about a rootless man without family in India. The family is only present, albeit not in realistic level but at the psychic level in the memory of the hero, Baumgartner.
In this novel the novelist does not delineate the insanity and tension between husband and wife. The whole incidents move round the single protagonist. He has no wife and hence no family. His unhappy childhood and lonely youth have made him and introvert. Both Baumgartner and Lotte suffer terribly from loneliness and homelessness. But their attitudes towards life in India are different. Baumgarter tries his best to be accepted by India whereas Lotte does not feel any such need. She lives in India throughout her life as an outsider and never tries to avow India or be avowed by her. She always pines for the company of her native countrymen. Thus the novel presents different sort of man-woman relationship.

References:

1-       Jean Baker Miller, Towards A New Psychology of woman, Allen lane, Penguin Books, 1978, p.87
2-       Usha pathania, Human Bonds and Bondages: The fiction of Anita Desai and Kamala Markandaya (Delhi : Kanishaka Publishing House, 1992) p.14
3-       Suresh Kohli, Indian Women Novelists in English, Times Weekly, 8 November, 1970, p.3
4-       P.F.Patil, The Theme of Marital Disharmony in the Novels of Anita Desai; Indian Women Novelists, Set 1: Vol. 2, ed. By R.K.Dhawan, Published by Prestige Books, 1991, p.128
5-       Ibid, p. 128
6-       Ann Lowry Weir, The Illusion of Maya : Feminine consciousness in Anita Desai’s Cry the Peacock : Perspective on Anita Desai, R.K.Srivastava (Ghaziabad : Vimal Prakashan, 1984) p.154
7-       N.R.Gopal, A Critical Study of the Novels of Anita Desai. New Delhi Atlantic publishers and distributors, New Delhi, 1995, p.25
8-       R.S.Sharma, Accommondation and the Locale in Anita Desai’s Bye-Bye, Blackbird, The Literary Criterion
9-       D.H.Lawrence, Morality and the novel in David Lodge, ed. 20th Century Literature Criticism (London : Longman Group Ltd., 1972) p.130.
10-    Ramesh Kr. Srivastava. Perspectives on Anita Desai. Ghaziabad Vimal Prakashan, 1984, p.XXVI


प्रतिभा-वाक्यार्थ के विरूद्ध जयन्त का तर्क: एक विवेचना



प्रो0 डी0 एन0 तिवारी
धर्म एवं दर्शन विभाग, बी0 एच0 यू0, वाराणसी *

जयंत भट्ट न्याय मंजरी1 में भर्तृहरि के प्रतिभा जैसे वाक्यार्थ का खण्डन करते हैं। उनकी प्रतिज्ञप्ति के अनुसार व्याकरण के दृष्टिकोण से प्रतिभा भाषा का विषय है और अर्थ प्रतिभा का विषय है और केवल इसी सन्दर्भ में प्रतिभा अर्थ कही जाती है। प्रतिभा के इस दृष्टिकोण को दृष्टि में रखते हुए जयन्त तर्क देते हैं कि यद्यपि आकार (रूप) नेत्र का विषय है फिर भी रूप का प्रत्यय (बुद्धि में रूप) नेत्र का विषय नहीं है। सामान्यतया प्रतिभा भाषा से उत्पन्न होती है लेकिन यह भाषा का विषय नहीं है। वाह्य वस्तुओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। यह कहना उचित नहीं है कि वाह्य वस्तुएँ वास्तव में अस्तित्ववान नहीं है। अतः यह प्रतिभा है जो भाषा का विषय है। उदाहरणार्थ ‘शेर आ गया’ ‘बहादुरों’, ‘कायरों’ जैसे शब्द अन्य-अन्य व्याक्तियों में अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न करती है। ये प्रभाव प्रतिभा के कारण नहीं है परन्तु वाह्य संसार में अस्तित्ववान शेर के पहुँचने के व्यक्ति में निर्दिष्टीकरण द्वारा उत्पन्न होते हैं। यह न केवल शेर का बोध या प्रत्यय है वरन् वाह्य शेर की पहुँच है जो व्यक्तियों मंे भय आदि उत्पन्न करता है। जयन्त कहते हैं कि यह कहना समुचित नहीं है कि उस समय शेर वहां सत्य ही नहीं है क्योंकि ‘शेर नहीं आया था’ ‘मैंने झूठ बोला’ जैसे वाक्य नहीं सुने गए और इस प्रकार यहां कोई कथन नहीं है, जो एक वाह्य शेर के उपस्थिति का खण्डन करे। प्रतिभा को प्रायः वासना के आधार पर भाषा का अर्थ स्वीाकर नहीं किया जा सकता है बोध की विभिन्नता बर्हिअस्तित्ववान वस्तुओं के भिन्न निदृष्टिकरण के फलस्वरूप है। इसलिए जयन्त कहते हैं प्रतिभा केवल ‘उद्देश्य’ (तात्पर्य) (जैसे वाक्य के अर्थ) की तरह स्वीकृति है, लेकिन यह व्यक्तकत्र्ता (वक्ता) के व्यक्त (वाक्) जैसा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब यह नहीं कहा जा सकता है कि प्रतिभा परस्परतः सम्बद्ध व्यक्त (संसृत्) जैसे वाक्यार्थ है, क्योंकि प्रतिभा जैसा कीव्याकरण मानता है एक पूर्ण अभाज्य है और सम्बद्ध पूर्ण नहीं है। जयन्त के अनुसार एक वाक्यार्थ वह है जो प्रयुक्त शब्दों में निहित उद्देश्य के बीच से जानी जाती है।
जयन्त द्वारा प्रतिभा-वाक्यार्थ पर उठाए गए प्रश्न का भर्तृहरि द्वारा समाधानः-
भर्तृहरि के मत से कहा जा सकता है कि जयन्त का यह तर्क कि प्रतिभा भाषा द्वारा उत्पन्न है और यह भाषा का अर्थ या विषय नहीं है, प्रतिभा शब्द के गलत अर्थ पर आधारित है। प्रतिभा भाषा द्वारा उत्पन्न नहीं होती परन्तु सुभिन्नतया इससे प्रकट होती है और केवल इसी सन्दर्भ में प्रतिभा को भाषा के विषय की तरह लिया जा सकता है। जयन्त की मान्यता से भिन्न अर्थ स्वयं प्रतिभा का विषय नहीं है। यह प्रत्यय की ‘अर्थ प्रतिभा का विषय है’, भर्तृहरि को एक सीमा तक स्वीकार नहीं है। यद्यपि उन्होंने ‘अर्थ प्रतिभा का विषय है; जैसे प्रत्यय का खण्डन नहीं किया तथापि यह उनके लिए स्वयं अर्थ है। यदि हम प्रतिभा को एक तात्त्विक (पराभौतिकी) मूल्य प्रदान करें और तब हम अर्थ को इसके विषय की तरह व्याख्या करें, उनका प्रतिभा जैसे अर्थ का दर्शन असम्मत होगा। इसका कारण है कि वे भाषा दार्शनिक के भाॅति सर्दव दार्शनिक प्रतिच्छाया के सीमा के प्रति सचेत रहे और यह दिखाने को बहुत इच्छुक थे कि कोई तात्त्विक पदार्थ (भाषा से अनछुआ) दार्शनिक प्रतिच्छाया का विषय नहीं है। इस प्रकार जब हम स्वयं को उनके विचार तक सीमित रखते हैं तब हम पाते हैं कि वह प्रतिभा को अर्थ की तरह भाषा द्वारा मस्तिष्क में अंकित स्फोट, सुभिन्न प्रबोधन जैसा संप्रेषित करते हैं जिसके आधार पर व्यावहार पूर्ण होता है। प्रतिभा करने या न करने के सभी प्रबोधकों का कारण है और मस्तिष्क में भाषा द्वारा प्रकट होता है और केवल इसी सन्दर्भ में यह भाषा का विषय कही जाती है, अन्यथा नहीं।
प्रतिभा स्वयं को वक्ता के वचन से संचरित होने के कारण के रूप में प्रकटित होता है। बिना विशिष्टीकृत प्रतिभा के अंकन के भाषा के द्वारा व्यवहार की आशा संभव नहीं है। इस प्रकार वक्ता के दृष्टिकोण से प्रतिभा भाषा के विषय की तरह समझी जाती है।
व्याकरणिक प्रतिभा के अर्थ जैसे सन्दर्भों में प्रतिभा को मनस या प्रज्ञा के रूप में प्रयुक्त करते हैं और दर्शित करते हैं कि प्रतिभा को प्रज्ञा जैसा बनने में कुछ नहीं कहा जा सकता। एम0एम0गोपीनाथ कविराज ने प्रतिभा के मनस या प्रज्ञा जैसे रूप को अधिक स्पष्ट रूप से विवेचित किया है। जैसे कि हमारा आयाम प्रतिभा जैसे अर्थ की प्रतिज्ञप्ति से सीमित है। हम सुझाव देते हैं कि यद्यपि मनस में विभिन्न प्रकार की प्रतिभाएं प्रकट होती हैं तथापि सभी सुभिन्न और विशिष्ट है, तथापि उनमें से सभी प्रतिभा उसी समान शब्द द्वारा अभिहित की जाती है। जब हम भर्तृहरि के प्रतिभा के अर्थ के विषय जैसे सिद्धान्त का मूल्यांकन करें उस समय प्रतिभा की यह व्याख्या मस्तिष्क में उपस्थित रहनी चाहिए और निश्चित है कि प्रतिभा यदि इस दृष्टिकोण बिन्दु से देखी गई तो मनस (प्रज्ञा) या सत्त्वात्मक सत्ता जैसी दृष्टियों में भ्रमित नहीं होंगे, जो कि अर्थ-बोध सत्ता से भिन्न है और इस प्रकार भर्तृहरि के प्रतिभा जैसे अर्थ और प्रतिभा जैसे मस्तिष्क के दृष्टिकोण में विभेदन आसान है।
अब प्रतिभा जैसे अर्थ या जैसे एक बोधात्मक अस्तित्व की समस्या पर आते हैं। यह कहा जा सकता है कि प्रतिभा अभाज्य स्फोट द्वारा प्रकट अभाज्य आभा है; वह प्रत्यय या विचार का विषय है। जिन्हें अज्ञानी या बच्चों द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि वे अभाज्य को अंश में समझते हैं या सम्पूर्ण को एक-एक करके समझते हैं जो उनसे विश्लेषण की माँग करती है। इस उद्देश्य के लिए वैयाकरणिक न्याकरणात्मक विश्लेषण (अपोधरा) की तकनीकि अपनाते हैं। यहां पर यह उल्लेखित करना उचित होगा कि वाक्यार्थ जो वैयाकरणिक के लिए अभाज्य आभा है, व्याकरणात्मक विश्लेषण (अपोधरा) की प्रक्रिया से विभिन्न शब्दार्थों (पदार्थों) में विश्लेषित है तब वाक्यार्थ उनके लिए विभिन्तया संश्लेषण, उद्देश्य, विभिन्न शब्दार्थों के साहचर्य, क्रिया, भावना आदि जैसे व्याख्यायित होता है। यह भी कहा जा सकता है कि पिछले अंक में विवेचित वाक्यार्थ के सभी सिद्धान्त अभाज्य प्रतिभा के व्याख्या के लिए उपयोगी है। परन्तु किसी भी विचार को सिद्धान्त या वाक्यार्थ की परिभाषा स्वीकार करना अनुचित है। प्रतिभा वाक्यार्थ है और अभाज्य आभा है। यह साहचर्य उद्देश्य आदि जैसे पृथकतया परिभाषित होते हैं। क्योंकि एक अभज्य किसी भी और अन्य प्रकार से परिभाषित नहीं हो सकता है। परिभाषा स्वयं अंश और पूर्ण की समझ पर आधारित है और इसलिए प्रतिभा की परिभाषा है।2
प्रतिभा वाक्यार्थ की विविध परिभाषाओं में साहचर्य का सिद्धान्त उन विचारकों द्वारा अनुमोदित है जो ‘भाव सम्बन्धों का पूर्ववर्ती है’ में विश्वास करते हैं (अभिहितान्वयवादिन)। अज्ञानी को शब्दार्थों के साहचर्य से वाक्यार्थ के अध्यापन के दृष्टि बिन्दु से उचित प्रतीत होता है। परस्पर सम्बन्ध का सिद्धान्त उन विचारकों द्वारा अनुमोदित है जो ‘सम्बन्ध भाव का पूर्ववर्ती है, में विश्वास करते हैं (अभिधान वादिन)। उच्चारित शब्द या व्यंजित अर्थों के उद्देश्य की व्याख्या के दृष्टिकोण से समर्थित प्रतीत होती है जबकि वाक्यार्थ अभाज्य जैसा विश्वास करने वाले विचारक (अखण्डवाक्यावादिन), सामान्य व्यवहार में एक इकाई अर्थ की पूर्ति के लिए आगे की अभिलाषा को हटाकर, बोध की सम्पूर्णता की दृष्टिकोण से, इसे बोधित उचित ठहराते हैं। मस्तिष्क में अंकित वाक्यार्थ एक शब्दार्थ को अन्य शब्दार्थ से जोड़ने जैसा नहीं वरन् एक अभाज्य बोध जैसे जिसकी व्याख्या के लिए वाक्यार्थ के अन्य सिद्धान्त भी महत्त्वपूर्ण हैं।3
विरोध वाक्यार्थ के खण्डन या मण्डन से नहीं है क्योंकि सभी सिद्धान्तकार इसको स्वीकार करते हैं। यह तो इसकी व्याख्या है, जो अन्तर उत्पन्न करती है। अभाज्य अर्थ जैसा प्रतिभा का सिद्धान्त न केवल वाचिक भावो, वाक्य-चिह्नों, हाव-भावों आदि से स्फोट द्वारा मस्तिष्क में अंकित या प्रकट बोधों की वरन् योगियों और अन्य सिद्ध-पुरूषों की प्रत्यक्ष बोध की व्याख्या करने में उपयुक्त है। बोध सत्वात्मक, परिमेय, अतिपरिमेय आदि जैसे सुभिन्नतः स्पष्ट रूप से ज्ञापित होती हैं। कीट और प्राणियों की सत्वात्मक बोध, उनकी अदृश्य परिमेय गतिविधियों के प्रेक्षण के आधार पर लिए गए अनुमान से जानी जाती है, परिमेय बोध जब वाचिक भावों से उद्भाषित स्फोट द्वारा प्रकटन जैसा बोध है। ये संचारणीय बोध हैं जो मनोदशा से संचारित हो तो सत्यनिष्ठ बोध उत्पन्न करती हैं। अति परिमेय बोध प्रत्यक्ष आभाएं हैं, वे सिद्ध-पुरूषों की दृष्टि है (ऋषिः मन्त्र दृष्टिारः)। और वे जिसे यह प्राप्त है के अतिपरिमेय दैवीय गतिविधियों के प्रस्तुतीकरण के प्रेक्षण से जाना जाता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ
1. न्याय मंजरी, पृ0-104-5।
2. इदम तदिति सान्येशामनाख्येया कथंचन् प्रत्यामवृत्त्सििद्ध पुष्पराज 2/44
3. पुष्पराज 2/1




* साभार-द सेन्ट्रल प्राब्लम आॅफ भर्तृहरिज फिलासफी, लेखक प्रो0 डी0एन0तिवारी, प्रकाशक- आई0सी0पी0आर0, नई दिल्ली। इस अंश के अनुवादक श्री राजेन्द्र तिवारी अधि0, उ0 न्या0, इलाहाबाद।

प्राथमिक शिक्षा में प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापक एवम् विशिष्ट बी0टी0सी0 अध्यापकों के मध्य व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन


डाॅ0 राजीव कुमार चैहान (प्रवक्ता)
(प्रवीन चैधरी), (तनु गुप्ता, शोध छात्रा)
बाबू कामता प्रसाद जैन महाविद्यालय,
बड़ौत (बागपत)

       प्रस्तावना:प्राचीन काल में शिक्षा छात्रों को गुरुकुलों में प्रदान की जाती थी। वैदिक काल में शिक्षक का स्थान इतना ऊँचा होता था कि गुरु की तुलना ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की जाती थी। छात्र गुरुकुल में रहकर ही शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु समस्त विषयों का ज्ञाता और समाज का हितैषी होता था। शिक्षक राष्ट्र का सच्चा निर्माता होता था। विद्यार्थियों को शिक्षकों से बड़ी-बड़ी आशायें होती थी, क्योंकि विद्यार्थियों के जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान उसे ही करना होता है। बालक के व्यक्तित्व विकास में शिक्षक का महŸवपूर्ण स्थान है। इसी कारण शिक्षक को समाज में सर्वाधिक सम्मान दिया जाता है परन्तु विगत के दशक से शिक्षण प्रशिक्षण एवं शैक्षिक समस्याओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रायः अधिकांश शिक्षकों में गुणवत्ता का स्तर दिन प्रतिदिन घटता जा रहा है। सभी शिक्षकों में दक्ष शिक्षकों की कमी है। जिनकी प्राथमिक स्तर पर विशेष आवश्यकता है। इसका मुख्य कारण है कि शिक्षक कम वेतन के कारण अपने व्यवसाय के प्रति सन्तुष्ट नहीं है। अर्थात शिक्षकों की स्थिति शोचनीय है।
हमारे संविधान की धारा 45 में यह घोषणा की गई है कि संविधान लागू होने के समय से 10 वर्ष की अवधि के अन्दर 14 वर्ष तक के बच्चों की अनिवार्य एवम् निःशुल्क शिक्षा के लक्ष्य में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 लागू हैं, 10$2$3 शिक्षा संरचना लागू हैं और इसकी प्रथम 10 वर्षीय आधारभूत पाठ्यचर्या को तीन भागों में विभाजित किया गया है - कक्षा 1 से 5 तक प्राथमिक शिक्षा, कक्षा 6 से 8 तक उच्च प्राथमिक, कक्षा 9 तथा 10 माध्यमिक और $ 2 अर्थात कक्षा 11 तथा 12 को उच्च माध्यमिक शिक्षा कहा गया है। इस समय हमारे देश में 05 से 14 आयु वर्ग के बच्चों की कक्षा 1 से कक्षा 8 तक की शिक्षा प्राथमिक शिक्षा के अन्तर्गत आती हैं।
समस्या कथन:-‘‘प्राथमिक शिक्षा में प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापक एवम् विशिष्ट बी0टी0सी0 अध्यापकों के मध्य व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन‘‘
अध्ययन उद्भवः-1951 से हमारे देश में सभी विकास कार्य योजनाबद्ध तरीके से शुरू किये गये। 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) शुरू हुई। इस योजना में शिक्षा पर 153 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 85 करोड़ रुपये प्राथमिक शिक्षा के विकास पर व्यय किए गए। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956-61) में शिक्षा पर 273 करोड़ रुपये व्यय किए गये जिनमें से 95 करोड़ रुपये प्राथमिक शिक्षा पर व्यय किये गये। तीसरी पंचवर्षीय योजना (1961-66) में शिक्षा पर 589 करोड़ रूपये व्यय किये गये, जिनमें से 201 करोड़ रूपये प्राथमिक शिक्षा पर व्यय किये गए। चतुर्थ पंचवर्षीय (1969-74) में शिक्षा पर कुल 786 करोड़ रुपये व्यय किए गए जिनमें से 239 करोड़ रुपये प्राथमिक शिक्षा पर व्यय किये गये। पांचवी पंचवर्षीय योजना में 317 करोड़, छठी पंचवर्षीय योजना में 836 करोड़, सातवी पंचवर्षीय योजना में 2849 करोड़, आठवी पंचवर्षीय योजना में 9201 करोड़, नवीं में 1184.4 करोड़ रुपये व दसवीं पंचवर्षीय योजना में 28750 करोड़ रुपये रखे गये हैं। इस योजना का मुख्य लक्ष्य शिक्षा का सार्वभौमिकरण है।
प्राथमिक शिक्षा के सन्दर्भ में इसकी 45 वीं धारा में स्पष्ट निर्देश हैंः-‘‘राज्य इस संविधान के लागू होने के समय से दस वर्ष के अन्दर 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों की अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करेगा।‘‘और बस तभी से हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य एवं निःशुल्क करने की ओर ठोस कदम उठाए गए, यह बात दूसरी है कि उस लक्ष्य को हम 10 वर्षों के अन्दर तो क्या आज 56 वर्ष बाद भी प्राप्त नहीं कर सके हैं।
अध्ययन की आवश्यकता एवं महत्त्वः-आज शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों की दशा शोचनीय है। उसे विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन गिरता जा रहा है। जिसका मुख्य कारण शिक्षकों में गुणवत्ता का अभाव शिक्षण सामग्री का निम्न स्तर, शिक्षण कार्यों के प्रति उदासीनता, शिक्षकों का स्वार्थी होना, शिक्षण संस्थानों की दोषपूर्ण नीति एवं आर्थिक दशायें इत्यादि हैं।
शिक्षक शिक्षण में तथा छात्र अध्ययन में रुचि नहीं ले रहे हैं क्योंकि आज शिक्षक विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त हैं। इसका मुख्य कारण है कि शिक्षक अपने व्यवसाय के प्रति उदासीन है। विद्यालयों में उन्हें उचित दर्जा नहीं दिया जा रहा है। विद्यालयों में शिक्षण कार्य अधिक व वेतन कम दिया जा रहा है जिसके कारण अध्यापक अपने विषय के प्रति रुचि नहीं ले रहे हैं। उनकी समस्याओं की ओर ध्यान में रखकर ही शोधकर्ता ने प्राथमिक स्तर के बी0टी0सी0 व एस0बी0टी0सी0 प्रशिक्षित अध्यापकों की व्यवसायिक संतुष्टि हेतु अपना शोध एवम् उनका उपयुक्त समाधान खोजने हेतु समस्या का चयन किया है।
अध्ययन के उद्देश्यः-प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में निम्नलिखित उद्देश्य लिए गये हैंः-
1. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्राथमिक स्तर के प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापक एवं एस0बी0टी0सी0 अध्यापकों की व्यावसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करना।
2. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्राथमिक स्तर के प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापिकाओं व एस0बी0टी0सी0 अध्यापिकाओं की व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करना।
3. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्रशिक्षित एस0बी0टी0सी0 अध्यापकों व अध्यापिकाओं की व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करना।
4. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापकों एवं अध्यापिकाओं की व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन करना।
प्रस्तुत शोध की परिकल्पनायेंः-परिकल्पना का शाब्दिक अर्थ है ‘‘पूर्व चिन्तन‘‘। यह अनुसंधान की प्रक्रिया का दूसरा महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है। इसका तात्पर्य है कि किसी समस्या के विश्लेषण और परिभाषिकरण के बाद उनमें कारणों तथा कार्य-कारण के सम्बन्ध में ‘‘पूर्व चिन्तन‘‘ कर लिया है। इस निश्चय के बाद उसका परीक्षण शुरू हो जाता है। अनुसंधान कार्य इस परिकल्पना के निर्माण और उसके परीक्षण के बीच की प्रक्रिया है।
प्रस्तुत शोध के सन्दर्भ में शून्य परिकल्पनायें निर्धारित की गई हैं।
1. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्राथमिक स्तर के प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापक एवं एस0बी0टी0सी0 प्रशिक्षित अध्यापकों की व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अन्तर नहीं है।
2. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्राथमिक स्तर के प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापिकपाओं एवं एस0बी0टी0सी0 प्रशिक्षित अध्यापिकाओं की व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अन्तर नहीं है।
3. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्रशिक्षित एस0बी0टी0सी0 अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के मध्य व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अन्तर है।
4. बागपत जनपद के अन्तर्गत प्रशिक्षित बी0टी0सी0 अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के मध्य व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अन्तर नहीं है।
शोध विधि एवं प्रक्रिया:-
शैक्षिक अनुसंधान की अनेक विधियां हैं। इनमें से प्रत्येक विधि का अनुसंधान में आवश्यकतानुसार समस्या शोध की प्रकृति, स्थिति, काल, दशा एवं उद्देश्यों के आधार पर चयन किया जाता है। उचित विधियों का उपयुक्त समस्या में उपयुक्त स्थान पर सही अनुप्रयोग करने से शोध कार्यों की सार्थकता व निष्कर्षों की वैधता में सहायता मिल जाती है। प्रस्तुत शोध में सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया है। सर्वेक्षण शब्द से आशय खोज या अवलोकन से है।
न्यायदर्श एवं न्यायदर्श विधि:-
अनुसंधान चाहे किसी भी प्रकार का हो उसमें प्रदत्त संकलन की आवश्यकता होती है। यह प्रदत्त संकलन प्राथमिक और द्वितीय स्रोतों से संकलित किया जाता है। प्राथमिक स्रोतों में भौगोलिक क्षेत्र, संस्थायें तथा व्यक्ति सम्मिलित होते हैं और इन सबका समग्र रूप अर्थात सम्पूर्ण भौगोलिक संबंध, सम्पूर्ण संस्थायें संबंध सम्पूर्ण व्यक्ति, परिवार इत्यादि ‘‘समष्टि‘‘ की रचना करते हैं। इसका कोई भी अंग उसका एक ‘‘एलीमेन्ट‘‘ कहा जाता है। ‘‘समष्टि‘‘ का एक भाग जो वांछित न्यायदर्श से चुना जाता है। उस अध्ययन का न्यायदर्श कहलाता है। समष्टि से इस प्रकार के न्यायदर्श के चयन की विधि को सुनिश्चित करने की प्रक्रिया को न्यायदर्श कहते हैं।
प्रस्तुत शोध कार्य में शोधकर्ता ने स्वीकृत यादृच्छिकी न्यायदर्श विधि का प्रयोग किया है। इस विधि में न्यायदर्श का मानव विचलन या अन्य विचलन कम करने के उद्देश्य से कभी-कभी ‘‘समष्टि‘‘ को समवायी स्तरों में बाँट देते हैं। अब प्रत्येक स्तर में पड़ने वाली इकाइयों का ढांचा तैयार करते हैं और उन ढांचों में से इकाइयों की या दृच्छिकी न्यायदर्श विधि से चुन लेते हैं। शोधकर्ता ने आंकड़ों के चयन हेतु बागपत जनपद में स्थित बी0टी0सी0 व एस0बी0टी0सी0 प्रशिक्षित प्राथमिक स्तर के विद्यालयों में से 64 बी0टी0सी0 व 64 एस0बी0टी0सी0 पुरुष व महिला अध्यापकों को चयनित किया है।


अध्ययन के उपकरण:-
प्रस्तुत शोध समस्या पर मानवीकृत उपकरण ‘‘व्यवसायिक सन्तुष्टी मापनी‘‘ का प्रयोग किया गया है। यह उपकरण ‘‘डा0 मनोरमा तिवारी‘‘ व ‘‘डी0एन0 पाण्डेय‘‘ द्वारा निर्मित है।

अकंन एव विशलेषण:-
1BTC o SBTC  अध्यापकों के अंकों से प्राप्त मध्यमान एवं ैण्क्ण् से ब्ण्त्ण् ज्ञात करना:

वर्ग ैण्क्ण्
ठज्ब् डंसम 32 110.12 15.11
ैठज्ब् डंसम 32 118.75 11.21
ब्ण्त्ण्ब्ण् (क्रान्तिक निष्पŸिा)
क्ध्ैम्क्
क् ड1ड2
110ण्12.118ण्75
           8ण्63
ैम्क् त्र दो सहसंबंधित मध्यमानों के अंतर की संभावित त्रुटि

ैम्क् 12ध्छ122ध्छ2

          ;15ण्11द्ध2ध्32;11ण्21द्ध2ध्32

          228ण्3ध्32125ण्7ध्32

          7ण्13ण्9

          11
          3ण्32
ैम्क्  3ण्32
ब्त्ब्  8ण्63ध्3ण्32
ब्त्ब्  2ण्599
प्रस्तुत तालिका नं0 (1) का अवलोकन करने से ज्ञात हुआ है कि ठज्ब् व ैठज्ब् का ब्त् का मान 2ण्599 है जो .1 स्तर (2.156) एवं .5 (1.26) स्तर से अधिक है। इसलिए हम कह सकते हैं कि ठज्ब् व ैठज्ब् अध्यापकों के व्यवसायिक सन्तुष्टि में अन्तर है।
2द्ध ठज्ब् व ैठज्ब् अध्यापिकाओं के अंकों से प्राप्त मध्यमान एवं ैण्क्ण् से ब्ण्त्ण् ज्ञात करना:
वर्ग ैण्क्ण्
ठज्ब् ;थ्मउंसमद्ध 32 130.43 11.3
ैठज्ब् ;थ्मउंसमद्ध 32 120.18 17.20
ब्ण्त्ण्ब्ण् (क्रान्तिक निष्पŸिा)
क्ध्ैम्क्
क् ड1ड2
त्र          130ण्43.120ण्18
त्र          10ण्25
ैम्क् त्र दो सहसंबंधित मध्यमानों के अंतर की संभावित त्रुटि

ैम्क् 12ध्छ122ध्छ2

          ;11ण्3द्ध2ध्32;17ण्2द्ध2ध्32

          127ण्69ध्32295ण्84ध्32

          16ण्85

          4ण्1
ैम्क्  4ण्1
ब्त्ब्  10ण्25ध्4ण्1
ब्त्ब्  2ण्5
प्रस्तुतं तालिका नं0 (2) का अवलोकन करने से ज्ञात हुआ है कि ठज्ब् व ैठज्ब् का ब्त् का मान 2.5 है जो .1 स्तर एवं .5 स्तर से अधिक है। इसलिए हम कह सकते हैं कि ठज्ब् व ैठज्ब् अध्यापिकाओं के व्यवसायिक सन्तुष्टि में अन्तर है।
3द्ध ैठज्ब् अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के अंकों से प्राप्त उमंद व ैण्क्ण् से ब्ण्त् ज्ञात करना:
वर्ग  ;ैण्क्ण्द्ध
ैठज्ब् ;डंसमद्ध 32 118.75 11.21
ैठज्ब् ;मिउंसमद्ध 32 120.18 17.20
ब्ण्त्ण्ब्ण् (क्रान्तिक निष्पŸिा)
क्ध्ैम्क्
क् ड1ड2
त्र          118ण्75120ण्18
त्र          1ण्43
ैम्क् त्र दो सहसंबंधित मध्यमानों के अंतर की संभावित त्रुटि

ैम्क् 12ध्छ122ध्छ2


          ;11ण्21द्ध2ध्32;17ण्20द्ध2ध्32

          125ण्66ध्32295ण्84ध्32

          3ण्939ण्25

          13ण्18

          3ण्63
ैम्क्  3ण्63
ब्त्ब्  1ण्43ध्3ण्63
ब्त्ब्  ण्394
प्रस्तुतं तालिका नं0 (3) का अवलोकन करने से ज्ञात हुआ है कि ैठज्ब् अध्यापक व अध्यापिकाओं का मान .394 है जो .1 स्तर एवं .5 स्तर से कम है। इसलिए हम कह सकते हैं कि ैठज्ब् अध्यापक व अध्यापिकाओं के व्यवसायिक सन्तुष्टि में कोई अन्तर नहीं है।
4द्ध ठज्ब् अध्यापक एवं अध्यापिकाओं के अंकों से प्राप्त उमंद व ैण्क्ण् से ब्ण्त् ज्ञात करना:
वर्ग  ;ैण्क्ण्द्ध
ठज्ब् ;डंसमद्ध 32 110.12 15.11
ठज्ब् ;थ्मउंसमद्ध 32 130.43 11.30
ब्ण्त्ण्ब्ण् (क्रान्तिक निष्पŸिा)
क्ध्ैम्क्
क् ड1ड2
त्र          110ण्12130ण्43
त्र          20ण्31
ैम्क् त्र दो सहसंबंधित मध्यमानों के अंतर की संभावित त्रुटि

ैम्क् 12ध्छ122ध्छ2

          ;15ण्11द्ध2ध्32;11ण्30द्ध2ध्32

          7ण्133ण्99

          11ण्12
          3ण्33
ैम्क्  3ण्33
ब्त्ब्  20ण्31ध्3ण्33
ब्त्ब्  6ण्09
प्रस्तुतं तालिका नं0 (4) का अवलोकन करने से ज्ञात हुआ है कि ठज्ब् व ैठज्ब् अध्यापक व अध्यापिकाओं का मान 6.09 है जो .1 स्तर एवं .5 स्तर से अधिक है। इसलिए हम कह सकते हैं कि ठज्ब् अध्यापक व अध्यापिकाओं के व्यवसायिक सन्तुष्टि में अन्तर है।
निष्कर्ष:
1. प्रस्तुत शोध में बी0टी0सी0 अध्यापकों एवं एस0बी0टी0सी0 अध्यापकों के मूल्यांकन के पश्चात् व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अंतर पाया गया है।
2. प्रस्तुत शोध में बी0टी0सी0 एवं एस0बी0टी0सी0 अध्यापिकाओं के मूल्यांकन के पश्चात् उनकी व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अंतर पाया गया है।
3. प्रस्तुत शोध में एस0बी0टी0सी0 अध्यापक व अध्यापिकाओं के मूल्यांकन के पश्चात् उनकी व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अंतर नहीं पाया गया।
4. प्रस्तुत शोध में बी0टी0सी0 अध्यापक व अध्यापिकाओं के मूल्यांकन के पश्चात् इनकी व्यवसायिक सन्तुष्टि में सार्थक अंतर पाया गया है।

सन्दर्भ ग्रन्थ

1. भारत में शिक्षा का विकास - डाॅ0 रामशक्ल पाण्डेय
2. भारत में शिक्षा का विकास एवं समस्यायें - डाॅ0 एस0पी0 गुप्ता
3. शैक्षिक अनुसंधान व उसकी विधियां - एच0के0 कपिल
4. शैक्षिक अनुसंधान की विधियां - पारसनाथ
5. शैक्षिक सांख्यिकी - एस0पी0 गुप्ता
6. कु0 शालू द्वारा झाँसी नगर के माध्यमिक विद्यालयों के अध्यापक एवं अध्यापिकाओं की व्यवसायिक सन्तुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन वर्ष 2001-02 में से।