Sunday, 1 January 2012

सन्त काव्य में नारी विषयक दृष्टिकोण


ललित वत्स रायजादा

भक्तिकालीन साहित्य में भारतीय नारी का जो स्वरूप प्राप्त होता है, वह इतिहास की दीर्घावधि का फल है। इस कालावधि में सामाजिक जीवन का स्वरूप अनेक बार परिवर्तित हुआ। सन्तों ने नारी के दो रूपों की अवधारणा की है- एक तो उसका कामिनी रूप है जिसे सन्तों ने गर्हित और त्याज्य बताया है, दूसरा उसका सती रूप है जो सन्तों के लिए बड़ा मान्य और ग्राह्य है। सन्त काव्य में नारी विषयक इसी दृष्टिकोण का अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।

संतों द्वारा नारी का उल्लेख मुख्यतः नारी निन्दा तथा आत्मा-परमात्मा के प्रेम-मिलन एवं विरह के प्रतीक के रूप में किया गया है। आत्मा तथा परमात्मा के मध्य संबंध को दाम्पत्य-रति के रूप में प्रतिबिम्बित किया है। नारी-निन्दा विषयक प्रसंग में, उसे माया तथा वासना का प्रतीक मानते हुए उससे सर्वथा मुक्त रहने का परामर्श दिया गया है। उनके द्वारा जब किसी विरहिणी अथवा सौभाग्यशालिनी नारी का वर्णन प्रस्तुत किया जाता है या वे किसी पारिवारिक परिवेश का चित्रांकन करते है तो ऐसे स्थलों पर नारी शब्द का प्रयोग उनके द्वारा प्रतीकात्मक रूप में किया गया है। नारी के संयोग तथा वियोग का वर्णन संत कवियों ने आत्मा-सम्बन्ध के संदर्भ में किया है। आत्मा की वियोगावस्था का ज्ञान कराने के लिए ही संतों ने नारी का विरहिणी रूप वर्णित किया है। उनकी दृष्टि में परमात्मा रूपी प्रियतम से आत्मा रूपी प्रियतमा विलग हो गई है और इस प्रकार की वियुक्तावस्था में वह प्रिय के साथ सम्मिलन स्थापित करने हेतु व्याकुल हो उठती है। संत कबीर कहते है-
‘‘दुलहिनी गावहु मंगलचार। हम घरि आये हो राजा राम भरतार।।’’
कबीर ने नारी को नरक का कुण्ड बताया है तथा परनारी को पैनी छुरी माना है। उनकी धारणा है कि परनारी के ही कारण रावण जैसे महाप्रतापी राजा का विनाश हुआ। संत कबीर ने स्पष्ट शब्दों में नारी के कनक और कामिनी रूप की निन्दा की है। कबीर ने जहाँ नारी के निन्दित रूप को व्यक्त किया है, वहाँ उनका प्रयोजन नारी के कामिनी रूप से ही है। ‘नारी कुंड नरक का, बिरला थंभै बाग। कोई साधू जन ऊबरै, सब जग मूवा लाग’।। नारी के एक और रूप का वर्णन करते हुए कबीर कहते है-
‘नारी की झांई परत, अंधा होत भुजंग। कहे कबीर तिन कौन गति, जो नित नारी संग’।।
कबीर ने नारी को अवगुणों का मूल कहा है, नारी से बचने की चेतावनी देते है-
‘नारि नसावै तीनि गुन, जेहि नर पासै होई। भगति मुकति निज ग्यान मैं, पैसि नसकई कोई’।।
‘एक कनक अरू कामिनी, दोइ अगिन की झाल। देखे ही तैं परजरै, परसां ह्वै पैमाल’।।
कबीर पतिव्रता नारी को बड़ा गौरव देते है। इसी भावना के कारण वे सती को
साधु, शूर, संत आदि की श्रेणी में रखते हैं-
‘साथ सती और सूरमा, ज्ञानी और गजदन्त। एते निकसि न बाहुरे, जो जुग जायँ अनन्त’।।
सूर ने भी नारी के कामिनी रूप की निन्दा की है-
‘सुकदेव कहयौ, सुनौ हो राव। नारी नागिनि एक सुभाव।
नागिनि के काटैं विप्र होई। नारी चितवन नर रहै भोई।
सन्त रैदास ने भी परनारी-प्रणय की निन्दा की है, लेकिन सौभाग्यवती नारी की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उसे संसार में सर्वाधिक सुखी बताया है।
गुरुनानक की मान्यता है कि जो नारी अपने प्रिय को पहचानती है, वह सौभाग्यवती है और जिसने अपने प्रिय को नहीं पहचाना, वही कुरूप, कुटिल, कुलक्षिणी और कुनारी है। गुरुनानक की चेतना निन्दा और प्रशंसा के जंजाल में नहीं फँसी है। वे निन्दा के स्थान पर निन्दित कर्म को त्यागने का परामर्श देते है तथा कुमारी और सती सुहागिन नारियों की सजल मन से प्रशंसा करते है।
सन्त कवि दादू ने नारी के कई रूप बताये हैं। उन्होंने नारी को कहीं कामिनी कहा है तो कहीं भामिनी, मोहिनी रूप की निन्दा की है, जबकि उन्होंने विरहिणी, आज्ञाकारिणी, सती, पतिव्रता आदि नारी रूपों के प्रति अत्यन्त आदर-भावना व्यंजित की है। दादू ने भी कबीर की तरह कटु होकर भामिनी की बड़ी भत्र्सना की है।
‘दादू नारी पुरिष कौ, जाणै जे बसि होई। पिव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ’।।
इसके विपरीत पति के प्रति निष्ठावान नारी को दादू अद्वितीय मानते है-
‘दादू भावै पीव कौं, ता सम और न कोई’।।
सन्तों में सुन्दरदास ने नारी की व्यापकता के साथ निन्दा की है। ‘नारी-निन्दक संतों के शिरोमणि संत सुन्दरदास है’। सुन्दरदास के सन्दर्भ में कहा गया यह कथन
निराधार नहीं है। जिन अंगों की सुन्दर व्यंजना करते-करते कविगण न तो कभी ऊबते है और न कभी थकते है, उन्हीं अंगों का जब सुन्दरदास वर्णन करते है तब उस वर्णन को देखकर तथा उसे भावित कर मन में बड़ी वितृष्णा पैदा होती है। संत सुन्दर दास ने नारी के प्रत्येक अंग को नरक के समान कहने में भी तनिक संकोच नहीं किया है-
‘उदर में नरक, नरक अध द्वारन में, कुचन में नरक, नरक भरी छाती है।
कंठ में नरक, गाल, चिबुक नरक किंब, मुख में नरक जीभ, लालहु चुचाती है
नाक के नरक, आँख, कान में नरक बहै, हाथ पाऊँ नख-सिख, नरक दिखाती है।
सुन्दर कहत नारी, नरक को कुंड मह, नरक में जाइ परै, सो नरक पाती है’।
नारी रूप के निन्दक सुन्दरदास की चेतना जब पतिव्रता नारी की ओर उन्मुख होती है, तब वे उसके प्रति अत्यन्त विनीत दिखायी पड़ने लगते हैं। उन्होंने अपनी वाणी में सती और पतिव्रता नारी की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। सुन्दरदास ने पतिव्रता के लिए पति का ही सर्वस्व माना है -
पति ही सू प्रेमहोई, पति ही सू नेम होई। पति ही संू छेम होइ, पति ही संू रत है
पति बिनु पति नाहिं, पति बिनु गति नाहिं। सुन्दर सकल विधि, एक पतिव्रत है।।’’
संतों ने जहाँ पर माता का उल्लेख किया है, वहाँ वह सम्मान-भावना का बोधक है। कबीर ने माता की क्षमाशीलता को उद्दिष्ट करके हरि को जननी के रूप में भावित किया है- हरि जननी मैं बालिक तेरा, काहे न औगुण बकसहु मेरा
मलूकदास की दृष्टि में नारी मिसरी की छुरी है, जो संसार को भ्रमित करती है-‘‘एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटपार। मिसरी की छुरी गर लायके, इन मारा संसार।।
संतों ने ईश्वर भक्ति के ही संदर्भ में नारी की अवतारणा की है। चँूकि नारी बड़ी आकर्षणमयी होती है, उसका कामाकर्षी रूप साधारण साधक को साधना से विचलित कर देता है, इसीलिए निर्गुण संतों ने नारी के कामिनी रूप की बड़ी भत्र्सना और अवमानना की है परन्तु ये नारी के पतिव्रत और सती रूप की उपेक्षा नहीं कर सके हैं। समस्त संत नारी के पतिव्रत और सती रूप के प्रति अत्यन्त विनीत हैं, क्योंकि ऐसी नारियाँ मंगलविधायिनी शक्ति से सम्पृक्त होती हैं। इसीलिए नारी के कटु निन्दक कबीर पतिव्रता कुरूप नारी पर भी करोड़ों रूपसियों को न्यौछावर करने में जरा सा भी नहीं हिचकिचाते हैं।
पतिव्रता मैली भली काली कुचिल कुरुप, पतिव्रता के रूप पर बारौ कोटि सरूप।।
संदर्भ सूची
1. कबीर ग्रन्थावली: साखी- 20/15
2. संत बानी संग्रहः भाग- एक, पृ.‘54
3. कबीर साखी संग्रह- पृ 155
4. सं. सिंह जयदेव /डाॅ. सिंह वासुदेव, साखी, कामी नर कौ अंग, पृ.-173
5. -----वही----पृ, 174
6. कबीर साखी संग्रह, पृ. 23
7. सूरसागर (ना.प्र.स.), नवमस्कंध, पद सं.--446
8. दादू दयाल की बानीः भाग एक, 8/54
9. -------वही--------पृ 8/33
10. डाॅ. गोस्वामी कृष्णा, संतकाव्य में नारी, पृ.-116
11. सुन्दर विलास, पृ-47
12. सुन्दर विलास- सुन्दरदास, पृ 72
13. कबीर ग्रन्थावली, परिशिष्ट, पद 111
14. मलूकदास जी की बानी, शब्द-2, पृ. 12

डाॅ. ललित वत्स रायजादा
डी.ई.आई., प्रेम विद्यालय,
दयालबाग, आगरा, उ0प्र0

पातंजल-योग-परम्परा में चित्त का स्वरूप




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[k.Mu % rc rks os Kkuizokgka'k:ih lHkh fpÙk] pkgs leku izdkj ds Kku ds :i esa izokfgr gks jgs gksa vFkok fHkUu izdkj ds Kku ds :i esa] mudk izR;sd va'k ,d&,d vFkZ ds fy;s fu;r gksus ds dkj.k ^,dkxz* gh gqvkA bl izdkj bl fodYi dks Lohdkj djus esa rks fof{kIrfpÙkrk vFkkZr~ fpÙk esa fof{kIr gksus dh lEHkkouk gh ugha jg tkrhA23 blfy;s fl) gqvk fd fpÙk ,d gS] LFkk;h gS vkSj vusd inkFkks± ds Kku ds fy;s gksrk gSA24
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          ik;la xkse;e~   &               [khj ¼Hkh½ xkscj gS]
          xO;Rokr~A                      xO; ¼xks fodkj½ gksus ds dkj.kA
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          ik;lefi xO;e~]                [khj Hkh xO; gSA
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[k.Mu % ;ksxn'kZu esa fpÙk dks Loizdk'kd ugha ekuk x;k gSA lw=dkj ds vuqlkj n`'; gksus ds dkj.k fpÙk viuk izdk'kd ugha gks ldrk gSA36 Hkk";dkj ds vuqlkj fpÙk Loizdk'kd ugha gS] tSls vU; bfUnz;k¡ vkSj 'kCnkfn fo"k; ^n`';* gksus ds dkj.k Loizdk'kd ugha gSA37 bl fo"k; esa iwoZi{k dh vksj ls vfXu dk n`"VkUr fn;k tkrk gS fd&ftl izdkj vfXu ^ijizdk'kd* gksus ds lkFk&lkFk Loizdk'kd Hkh gksrh gS] oSls gh fpÙk Hkh gSA rks bldk [k.Mu Hkk";dkj djrs gSa fd fpÙk ds izlax esa ^vfXu* n`"VkUr ugha gSA38 Hkko ;g gS fd vfXu Hkh Loizdk'kd ;k LokHkkl ugha gS] blfy;s og Hkh vuqnkgj.k gh gSA D;ksafd vfXu Hkh vius vizdkf'kr :i dks izdkf'kr ugha djrkA39 tUekU/k O;fDr ds fy;s vfXu dk :i Hkh ?kV :i ds leku vizdkf'kr jgrk gSA blfy;s ^Loizdk'krk* vfXu esa loZFkk vuqiiUu gSA40
          bl izdkj Hkk";dkj&O;kl us fpÙk dk vR;Ur lw{e fo'ys"k.k fd;k gSA ;ksx&n'kZu esa fpÙk 'kCn ds LFkku ij eu 'kCn dk Hkh iz;ksx fd;k x;k gSA ;|fi fpÙk eu ls fHkUu vU; vUrfjfUnz; gSA ;ksxlw=dkj }kjk iz;qDr fpÙk 'kCn ls vfHkizsr eu gS] blesa lUnsg fdlh dks Hkh ugha gksuk pkfg;s] D;ksafd dbZ ckj os ,d gh izdj.k esa fpÙk vkSj eu nksuksa 'kCnksa dk iz;ksx djrs gSaA mnkgj.kkFkZ& eS=h] d#.kk vkfn o`fÙk;ksa dks os fpÙk&izlknu vFkok fpÙk dh ,dkxzrk dk mik; Lohdkj djds izPNnZufo/kj.kkH;ka ok izk.kL; ,oa fo"k;orh ok izo`fÙk#RiUukeul% fLFkfrfucfU/kuh bR;kfn41 dgrs gq, os izk.kk;ke ,oa fo"k;orh izo`fÙk dks eu dh fLFkjrk dk mik; crkrs gq, fpÙk ds LFkku ij eu 'kCn dk iz;ksx djrs gSaA Hkk";dkj O;kl Hkh iwoksZDr izPNnZufo/kj.kkH;ka ok izk.kL; dh O;k[;k ds le; ^ok* in }kjk fufnZ"V fpÙk izlknu ds gh brj mik; dks Li"V djrs gq, rkH;ka ok eul% fLFkfra lEikn;sr~A42 'kCnksa }kjk fpÙk&izlknu ,oa eu dh fLFkjrk dks vfHkUu Lohdkj dj fy;k gSA ftlls Li"V gksrk gS fd Hkk";dkj us eu ,oa fpÙk dks i;kZ;okph gh Lohdkj fd;k gSA O;kl dh ;g ekU;rk vuqfpr ugha gSA D;ksafd Lo;a lw=dkj us Hkh vfxze lw= fo"k;orh ok izo`fÙkeZul% fLFkfrfucfU/uh esa fpÙk&izlknu ,oa eu ds fLFkfr& fucU/ku dks vfHkUu gh ekuk gSA bl izdkj izk.kk;ke ds Qy dk funsZ'k djrs gq, iqu% lk/kuikn ds vUr esa lw=dkj eu esa ^/kkj.kk gsrq ;ksX;rk* dks Qy ekurs gSaA43 rFkk mUgha ds vuqlkj /kkj.kk fpÙk dk ns'k fo'ks"k esa cU/k gSA44 vr% ;g Lohdkj fd;k tk ldrk gS fd ;ksxlw=dkj o Hkk";dkj dh n`f"V ls eu vkSj fpÙk vfHkUu gS vFkok mUgksaus eu ds fy;s Hkh fpÙk in dk iz;ksx fd;k gSA
       milagkj&fu"d"kZr% ikraty ;ksxn'kZu ds lexz vè;;u ls ;gh fu.khZr gksrk gS fd lw=dkj] Hkk";dkj] o`fÙkdkj ,oa Vhdkdkj fpÙk dks izfr 'kjhj fu;r] ,dns'kh] la[;k esa cgqr rFkk leLrczãk.Mxr fdlh Hkh inkFkZ dks la;e ds iz;ksx ls lk{kkr~ dj ysus dh ;ksX;rk ds dkj.k foHkq ekurs gSaA45 ,slk u ekuus ij 'kkL= esa tks dSoY;koLFkk esa fpÙk dk Lodkj.k esa izfoy; ekuk gS og Hkh ugha cu ldsxkA46 D;ksafd ml voLFkk esa ,d fpÙk ds gh leLr 'kjhjksa ls lEc) gksus ds dkj.k ;fn fpÙk dk izfoy; gksxk] rks lkjs gh iq#"kksa dks dSoY; dh flf) gks tk,xh rFkk lalkj dk mPNsn gks tk,xk] vkSj ;fn fpÙk dk izfoy; ugha gksxk rks lalkj dq'ky&vdq'ky] fl)&vfl) lcds fy, cuk gh jgsxk] Qyr% bl ;ksx'kkL= esa tks dSoY; dk mins'k izfrikfnr d;k x;k gS] og fdlh Hkh iq#"k dk dSoY; laHko u gks ldus ls vfl) vkSj O;FkZ gks tk,xkA vr% fpÙkksa dks izfr 'kjhj fu;r] ,dns'kh] vla[; rFkk l`f"V dk ije lkfÙod vkSj lw{ere rÙo gksus ds dkj.k vf[ky fo'o ds fdlh Hkh inkFkZ dks izdkf'kr djus dh lkeF;Z okyk gksus ls gh foHkq ekuk x;k gS] tks ;qfDrlaxr gSA

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1 (i)      rnHkkokn.kq eu%A oS- lw- 7@1@23
(ii)     ;FkksDrgsrqRokPpk.kqA U;k- lw- 3@2@63
2      nsgizns'kofrZdk;Zn'kZukn~ nsgkn~cfg% ln~Hkkos fpÙkL; u izek.kefLrA r- oS- 4@10
3      u pSrn.kqifjek.ke~] nh?kZ'k"dqyhHk{k.kknkoi;kZ;s.k KkuipdkuqRiknizlÄõkr~A u pkuuqHkw;&ekuØedYiuk;ka izek.kefLrA u pSde.kq euks ukukns'kSfjfUnz;Sji;kZ;s.k lacU/egZfrA ogh
4      rRifj'ks";kRdk;ifjek.ka fpÙka ?kVizklknofrZiznhior~A ladkspfodklkS iqfÙkdkgfLrnsg;ks&jL;ksRiRL;srsA 'kjhjifjek.kesokdkj% ifjek.ka ;L;sR;ijs izfriUuk%A ogh
5      ?kVizklkniznhidYia laÄxkaspfodkf'k fpÙka 'kjhjifjek.kkdkjek=kfeR;ijs izfriUuk%A
       rFkk pkUrjkHkko% lalkj'p ;qDr bfrA ;ks- Hkk- 4@10
6      o`fÙkjsokL; foHkqukf'pÙkL; lÄ~dkspfodkf'kuhR;kpk;Z%A ;ks- Hkk- 4@10
7      fpÙka u fnxf/dj.ka oLrq dkyek=kO;kihfØ;k:iRokn~A u áewÙk± fpÙka gLrkfnfHk% ifjes;e~] rLekÙkL; nh?kZLoRoknhfu u dYiuh;kfuA fnxo;ojfgrRokr~ fpÙka foHkq&loZHkkoS% lg lEcU/or~A u p foHkqRoa loZs'kO;kfiRoa O;olk;:iRokPpsrl%A Hkk- 4@10
8]9     izks- foeyk d.kkZVd] ikraty;ksxn'kZue~] ckyfiz;k Vhdk] i`- 1538&39] dk0fg0fo0] okjk.klh]] 1992
10 (i) cU/kdkj.k'kSfFkY;kRizpkjlaosnukPp fpÙkL; ij'kjhjkos'k%A ;ks- lw- 3@38
(ii)    deZcU/k{k;kRLofpÙkL; izpkjlaosnukPp ;ksxh fpÙk Lo'kjhjkfUu"d`"; 'kjhjkUrjs"kq fuf{kifrA ;ks- Hkk- 3@38
11     fpÙkL; ;ks∙lkS izpkjks ân;izns'kkfnfUnz;}kjs.k fo"k;kfHkeq[;su izljLrL; laosnua Kkufe;a fpÙkogk ukMh vu;k fpÙka ogfr] b;a p jlizk.kkfnogkH;ks ukMhH;ks foy{k.ksfrA jk- ek- o`- 3@38
12 (i) fuf{kIra fpÙka psfUnz;k.;uqirfUrA ;ks- Hkk- 3@38
(ii)     bfUnz;kf.k p fpÙkkuqlkfj.kh ij'kjhjs ;Fkkf/"Bkua fufo'kUr bfrA r- oS- 3@38
13     rLekRLorU=kks∙FkZ% lOkZiq#"klk/kj.k% LorU=kf.k p fpÙkkfu izfr iq#"ka izorZUrsA ;ks- Hkk- 4@16
14     v;LdkUref.kdYik fo"k;k v;% l/keZda fpÙkefHklEcè;ksijat;fUrA ;su p fo"k;s.kksijDra fpÙka l fo"k;ks KkrLrrks∙U;% iqujKkr%A oLrquks KkrkKkrLo#iRokr~ ifj.kkfe fpÙke~A ogha 4@17
15 (i) vr ,o fpÙka ifj.kkehR;kg&oLrqr bfrA r- oS- 4@17
(ii)     vrks KkrkKkroLrqdRokU;Fkk∙uqiiÙ;k fpÙkL;ksijkxk[;ifj.kke% fl) bR;FkZ%A ;ks- ok- 4@17
(iii)    bfUnz;}kjk fpÙkkf/k"Bkuxrk fo"k;kf'pÙkekÑ"; mij×t;fUr&Lokdkjr;k ifj.ke;UrhR;FkZ%A mijkxkis{ka fpÙka fo"k;kdkja Hkofr u Hkofr okA vrks KkukU;Roa izkI;ek.ka fpÙka ifj.kkehfr vuqHkw;rsA Hkk- 4@17
(iv)    rLekr~ oLrquks KkrkKkrLo:iRokr~ ifj.kkfe fpÙke~A ;ks- fo- 4@17
(v)    oLrqrks KkrkKkrLo:iRokr~ ifj.kkfe fpÙke~A uk- Hk- o`- 4@17
(vi)    vr ,o fpÙka rnFkksZijkxeis{; dnkfp}Lrq tkukfr dnkfpÂsfr KkrkKkrfo"k;RokRifj.kkehfr Hkko%Ae-iz- 4@17
(vii)   vusu fpÙkaifj.kkfe KkrkKkrfo"k;RokPNªks=kkfnofnfr fpÙkL; ifj.kkfeRos∙uqekueqDra HkorhR;fHklfU/k%;ks-lq- 4@17
(viii)   ,oa p fo"k;L; KkrkKkrRokU;Fkk∙uqiÙ;k fpÙkL;ksijkxk[;ifj.kke% fl)%A ;ks- iz- 4@17
(ix)    vrks Kkrk∙Kkrfo"k;r;k fpÙka ifj.kkE;ihfr Hkko%A ;ks- fl- p- 4@17
16     ;L; rq izR;FkZfu;ra izR;;ek=ka {kf.kda p fpÙka rL; loZeso fpÙkesdkxza ukLR;so fof{kIre~A ;ks- Hkk- 1@32
17     ;fn iqufjna loZr% izR;kg`R;SdfLeUuFksZ lek/kh;rs rnk HkoR;sdkxzfeR;rksA ;ks- Hkk- 1@32
18     u izR;FkZfu;re~A ogh
19     ;ks∙fi ln`'kizR;;izokgs.k fpÙkesdkxza eU;rsA ogh
20     rL;Sdkxzrk ;fn izokgfpÙkL; /eZ%A ogh
21     rnSda ukfLr izokgfpÙka {kf.kdRokr~A ogh
22     vFk izokgka'kL;So izR;;L; /eZ%A ogh
23     l loZ% ln`'kizR;;izokgh ok foln`'kizR;;izokgh ok izR;FkZfu;rRoknsdkxz ,osfr fof{kIr& fpÙkkuqiifÙk%A ogh
24     rLeknsdeusdkFkZeofLFkra fpÙkfefrA ogh
25     ;fn p fpÙksuSdsukufUork% LoHkkofHkUuk% izR;k tk;sjUuFk dFkeU;izR;;n`"VL;kU;% LerkZ Hkosr~A ;ks- Hkk- 1@32
26     vU; izR;;ksifpÙkL; p dekZ'k;L;kU;% izR;; miHkksDrk Hkosr~A ogh
27     dFkafpr~ lek/kh;ekueI;srn~ xkse;ik;lh;a U;k;ekf{kifrA ogh
28     nz"VO;] r- oS- 1@32
29     fdap LokRekuqHkokig~uof'pÙkL;kU;Ros izkIuksfrA ;ks- Hkk- 1@32
30     dFke~\ ;ngenzk{ka rr~ Li`'kkfe ;PpkLizk{ka rr~ i';kehR;gfefr izR;;% loZL; izR;;L; Hksns lfr izR;f;U;HksnsuksifLFkr%A ;ks- Hkk- 1@32
31     ,dizR;;fo"k;ks∙;eHksnkRek∙gfefr izR;;% dFkeR;UrfHkUus"kq fpÙks"kq orZekua lkekU;esda izR;f;uekJ;sr~\ ogh
32     LokuqHkoxzká'pk;eHksnkRek∙gfefr izR;;%A ogh
33     u p izR;{kL; ekgkRE;a izek.kkUrjs.kkfHkHkw;rsA izek.kkUrja p izR;{kcysuSo O;ogkja yHkrsA ogh
34     rLeknsdeusdkFkZeofLFkra p fpÙke~A ogh
35     oSukf'kdkuka fpÙkkReokfnukfefr 'ks"k%A fpÙkeso LoL; fo"k;L; p izdk'kdefXuon~Hkfo";fr] Ñreifj.kkfeuk∙U;susR;k'kadk oSukf'kdkuka L;kfnR;FkZ%A ;ks- ok- 4@19
36 (i) u rRLokHkkla n`';Rokr~A ;ks- lw- 4@19
(ii)     rfPpÙka LokHkkla Loizdk'kda u Hkofr iq#"kos|a Hkorhfr ;kor~] dqr\ n`';Rokr~ ;fRdy n`';a rn~nz"V`os|a n`"Va ;Fkk&?kVkfn] n`';a p fpÙka rLek LokHkkle~A Hkks- o`- 4@19
(iii)    rfPpÙko`fÙk:ia u LokHkkla u Loizdk'ka Loxkspjizdk'ka fouk u izdk'kO;ogkj{kee~A uk- Hk- o`- 4@19
(iv)    rfPpÙko`fÙk:ia u LokHkkla u Loizdk'ka HkofrA vkdk'ka Loizfrf"Bfefror~A Loxkspjizdk'ka fouSo izdk'kO;ogkjkTtkukehPNkehR;kfn:iSn`Z';r;kuqHkokfnR;FkZ%A Hkk- x- o`- 4@19
(v)     :ih ?kV bfror~ lq[;ga] Øq)ks∙ga] 'kkUra es eu bfr n`';RokfPpÙka LokHkkla Loizdk'k u HkorhR;FkZ%Ae-iz- 4@19
(vi)    rfPpÙka LokHkkla Loizdk'kda u Hkofr fdUrq iq#"kos|a dqrks n`';rokr~A p- 4@19
(vii)   ^?kVks∙;a :ioku~* bfror~ ^lq[;ge~* ^Øq)ks∙ge~* ^'kkUra es eu%* bfr n`';RokfPpÙka LokHkkla Loizdk'ka u HkofrA ;ks- lq- 4@19
(viii)   ;Fkk bfUnz;kf.k 'kCnkn;'p n`';RokUu LokHkklkfu rFkk rr~euksfi u LokHkkla Hkofr n`';RokfnR;FkZ%A;ks-iz- 4@19
(ix)    rfPpÙka u LokHkkla u Loizdk'ka] LoLokFkZxkspjo`Ù;Hkkodkys vkReo LoLokFkZ;ksHkkZldfefr ;kor~A;ks-fl-p- 4@19
37     ;Fksrjk.khfUnz;kf.k 'kCnkn;'p n`';RokUu LokHkklkfu rFkk euks∙fi izR;srO;e~A ;ks- Hkk- 4@19
38     u pkfXuj=k n`"VkUr%A ogh
39 (i) u áfXujkReLo#ieizdk'ka izdk'k;frA ogh
(ii)     'kwU;oknh ckS) vkpk;Z ukxktqZu us Hkh fpÙk ds }kjk vkRe&izdk'ku ds fy;s fn;s x;s vfXu ds n`"VkUr dk [k.Mu fd;k gS& fo"keksiU;klks∙;a ákRekua izdk'k;R;fXu%A u fg rL;kuqiyfC/k n`"Vk relho dqEHkL;A foxzgO;korZuh 35
(iii)    vXU;knkS p LoHkklRoeso ukLrhfr o{;fr] vrks u r=kkfi O;fHkpkj%A n`"VkUrs p loZnSo Loizdk';RokHkkoks∙LrhfrA ;ks- ok- 4@19
40      vfXuukZ=kn`"VkUr% LoHkklL;ksnkgj.ke~] 'kCnkfnonXus #i/eksZ∙fXufu"Bks ok ?kVk|kifrrks ok p{kq"kSo izdk';rsA u áfXufu"B#ia rstks/eZHkwrekReLo:iizdk'ka izdk'k;frA Hkk- i`- 4@19
41     ;ks- lw- 1@34&35
42     ;ks- Hkk- 1@34
43     /kkj.kklq p ;ksX;rk eul%A ;ks- lw- 2@53
44     ns'kcU/kf'pÙkL; /kkj.kkA ogha 3@1
45     nz"VO;] lw= Hkk"; vkSj o`fÙk 3-19-2] 4-4] 15]16]21
46 (i) rs iap Dys'kk% nX/chtdYik ;ksfxu'pfjrkf/dkjs psrfl izyhus lg rsuSokLra xPNfUrA ;ks- Hkk- 2@10
(ii)     rs lw{ek% Dys'kk ;s okluk#is.kSofLFkrk u o`fÙk#ia ifj.kkeekjHkUrs rs izfrizlosu izfrykseifj.kkesu gs;kLR;DrO;k%ALodkj.kfLer;ka d`rkFk± lokluafpÙka ;nkizfo"Va Hkofr rnk dqrLrs"kkafuewZykukalaHko%AHkks-o`- 2@10
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