Tuesday, 1 July 2014

अशिक्षित गढ़वाली महिलाओं की सामान्य हिन्दी विषयक दक्षता उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के रिखणीखाल प्रखण्ड का एक अध्ययन


कपिल देव थपलियाल

राष्ट्रगीत, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रभाषा किसी भी देश के गौरव के प्रतीक हैं। राष्ट्रभाषा वह भाषा है जिसमें पूरा देश भावों और विचारों का परस्पर आदान-प्रदान करता है। इक्कीसवीं सदी में यदि कोई भारतवासी अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी के बोल-व्यवहार में अक्षम हो तो उसकी निरक्षरता और अशिक्षा सहित तमाम परिस्थितियों के लिए राष्ट्र और उसके नियामक उत्तरदायी हैं। हिन्दी भाषी क्षेत्र गढ़वाल की महिलाओं की इस समस्या को शिक्षाविदों के सम्मुख रखना और इसके निदान के विषय में एक सूक्ष्म अध्ययन इस शोध-पत्र का उद्देश्य है।

किसी देश के विकास के निर्धारण में महिलाओं की स्थिति उसके सामाजिक-आर्थिक विकास की द्योतक है। किसी भी समाज की लगभग आधी जनसंख्या अर्थात् महिलाओं का विकास किए बिना सम्पन्न और सुखी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। क्योंकि जब तक महिलाएँ जागरूक और विकास के पथ पर अग्रसर नहीं होगी तब तक समाज का विकास अपूर्ण है।
उत्तराखण्ड जो कि एक दशक पूर्व उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, उस समय भी यह पिछड़े हिस्से में परिगणित होता था। आज जबकि उत्तराखण्ड स्वयं राज्य बन चुका है, यह अभी भी उस पिछड़ेपन से स्वयं को पूर्णरूपेण मुक्त नहीं कर पाया है। यदि भाषा की बात की जाय तो राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया के संदर्भ में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका की बात को समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक समान रूप से स्वीकार करते हैं। इसके साथ ही भाषा विषयक दक्षता को क्षेत्र के विकास से जोड़कर देखने की आवश्यकता है। एक ओर जहाँ महिला सशक्तीकरण की बात हो रही है वहीं उत्तराखण्ड में महिलाएँ इस स्थिति में हैं कि उनकी सामान्य हिन्दी विषयक क्षमताओं पर तमाम प्रश्न चिह्न हैं। जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा को ठीक से समझ बोल नहीं पाता, स्वयं और राष्ट्र के विकास में वह किस प्रकार योगदान सुनिश्चित कर सकता है। सर्वप्रथम समस्या अशिक्षा की है, किन्तु उससे पूर्व भाषा विषयक अक्षमताएँ हमारे समाज को मुँह चिढ़ाती खड़ी हैं।
अशिक्षित का तात्पर्य जनसंख्या के उस वर्ग से है जिसने औपचारिक रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की अथवा कोई परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की है। साथ ही साक्षर से तात्पर्य उस वर्ग से है जो एक अथवा एक से अधिक भाषा में अपने विचार लिखकर व्यक्त कर सके तथा लिखे हुए को पढ़कर समझ सके। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कमीशन ने किसी भाषा में साधारण संदेश को समझने के साथ पढ़ने और लिखने की योग्यता को साक्षरता माना है। भारतीय जनगणना निर्देशिका में किसी भाषा में पत्र लिखने और उसके उत्तर पढ़ने की योग्यता को साक्षरता का मापदण्ड माना गया है। वर्तमान समय में भारत में विश्व के अन्य कुछ राष्ट्रों की भाँति संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निर्धारित साक्षरता के आधार पर मान्यता प्रदान की है। वह व्यक्ति जो केवल पढ़ता है लेकिन लिख नहीं सकता, साक्षर नहीं माना जाता है।
डॉ0 बच्चन लाल के शोध-पत्र में प्रस्तुत तालिका में उत्तराखण्ड की साक्षरता का प्रतिशत इस प्रकार दिया गया है।-
वर्ग वर्ष 1981 वर्ष 1991 वर्ष 2001
कुल जनसंख्या 46.06 : 57.75 : 72.28 :
पुरुष 62.35 : 72.79 : 84.01 :
महिला 25.00 : 41.63 : 60.26 :
(सांख्यिकी पत्रिका गढ़वाल मण्डल 2001 द्वारा संकलित)1
अपने शोध-पत्र में डॉ0 बच्चन लाल ने वर्ष 2001 में जिला उत्तरकाशा में महिला साक्षरता 46.69ः दिखाई है। इसके साथ ही श्रीमती राखी पंचोला ने अपने ‘महिला सशक्तीकरण : दशा और दिशा’ नामक शोध-पत्र में महिलाओं की साक्षरता पर तालिका प्रस्तुत करते हुए इसे बढ़ाने हेतु किए जाने वाले प्रयासों को दृष्टिगत किया है।2 इनका उद्देश्य राष्ट्र के विकास में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने हेतु किए जाने वाले प्रयासों की तीव्र करने हेतु प्रेरित किया जाना है। किन्तु इससे पहले यह तथ्य जानने की आवश्यकता है कि ये महिलाएँ अपनी मातृभाषा हिन्दी में कितनी दक्ष हैं, क्योंकि इसके पश्चात् ही अन्य बातों पर विचार, तथ्य तथा तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
हमारा अध्ययन क्षेत्र रिखणीखाल प्रखण्ड पौड़ी गढ़वाल का सीमान्त विकास खण्ड है। यहाँ का अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी है तथा वनों से आच्छादित है, जिस कारण जनसंख्या घनत्व काफी कम है। विकासखण्ड मुख्यालय रिखणीखाल कस्बे में हालांकि सन् 1928 ई0 में माध्यमिक विद्यालय (जो वर्तमान में इण्टरमीडिएट कॉलेज बन चुका है) की स्थापना हो चुकी थी, किन्तु जागरूकता के अभाव में यहाँ की महिलाओं की जनसंख्या का 70ः आज भी अशिक्षित है। यहाँ का समाज आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहा है। महिलाओं का मुख्य कार्य घरेलू काम-काज, कृषि, पशु और जंगल तक ही सीमित है। इस क्षेत्र में महिला साक्षरता का प्रतिशत बहुत कम है। इसके कारणों की पड़ताल तथा शिक्षा और साक्षरता बढ़ाने के लिए संभव प्रयासों पर एक दृष्टि इस अध्ययन का उद्देश्य है। ये कुछ प्रश्न विचारणीय हैंः-
1. महिलाओं की यह स्थिति विकासशील भारत का कौन सा चेहरा प्रस्तुत कर रही है?
2. क्या किसी क्षेत्र विशेष की महिलाओं की हिन्दी विषयक अक्षमता समाज के विकास में बाधक नहीं है?
3. भूमण्डलीकरण के इस दौर में ये महिलाएँ कहाँ खड़ी हैं?
अध्ययन हेतु रिखणीखाल प्रखण्ड के 10 गाँवों का चयन किया गया। अशिक्षित ग्रामीण महिलाओं को तीन आयु-वर्गों में विभाजित कर स्वयं निर्मित एक सामान्य प्रश्नावली प्रपत्र के माध्यम से वार्ता की गयी। साक्षर महिलाओं ने प्रपत्र पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिख और पढ़कर दिए। किन्तु निरक्षर महिलाओं की पढ़ने विषयक अक्षमता के चलते हिन्दी तथा गढ़वाली भाषा में वार्तालाप किया गया। अध्ययन के पश्चात् कुछ आंकड़े हमें प्राप्त हुए जो इन महिलाओं की सामान्य हिन्दी विषयक क्षमता को प्रस्तुत करते हैं, सारणी के माध्यम से निम्नवत् हैः-
आयु वर्ग म्हिलाओं की संख्या हिन्दी समझना हिन्दी बोलना हिन्दी पढ़ना हिन्दी लिखना
 20-40वर्ष 58 58(100ः) 53(90ः) 15(25ः) 12 (20ः)
 40-60वर्ष 50 50(100ः) 34(68ः) 8(16ः) 5 (10ः)
 60-80वर्ष 55 55(100ः) 17(27ः) 7(12ः) 4(10ःसे कम
आंकड़ों से स्पष्ट है कि शत-प्रतिशत महिलाएँ हिन्दी समझने में सक्षम हैं। यदि विचारों को हिन्दी में बोलकर व्यक्त करने की बात की जाए तो 20-40 वर्ष की 90ः, 40-60 वर्ष आयु वर्ग की 68ः एवं 60-80 वर्ष आयु वर्ग की मात्र 27ः महिलाएँ ही इसमें सक्षम हैं। इसके साथ ही इन वर्गां में क्रमशः 25, 16 एवं 17ः महिलाएँ हिन्दी पढ़ने में सक्षम हैं। अब यदि साक्षर महिलाओं की बात की जाए जो हिन्दी पढ़ने और लिखने में सक्षम हैं उनका प्रतिशत भारी निराशा ही उत्पन्न करता है। 20-40 आयु वर्ग में 12ः, 40-60 वर्ष आयु वर्ग में 10ः तथा 60-80 वर्ष आयु वर्ग में 10ः से कम महिलाएँ ही साक्षर हैं।
प्रस्तुत अध्ययन में साक्षर और निरक्षर दो श्रेणियाँ बनाकर सामान्य हिन्दी विषयक समताओं का अध्ययन-अनुशीलन किया जा सकता था, किन्तु इस क्षेत्र की साक्षर महिलाओं (जिनका : अत्यन्त न्यून है) की हिन्दी विषयक दक्षता भी बहुत सीमित है; जिस कारण उन्हें पूर्ण साक्षर की श्रेणी में परिगणित नहीं किया जा सकता। तीनों वर्गों की साक्षर महिलाओं की विशिष्ट भाषा विषयक दक्षता की जानकारी प्राप्त करने हेतु एक परीक्षण किया गया-
आयु वर्ग महिलाओं की संख्या सामान्य फॉर्म भरने विषयक दक्षता
20-40 वर्ष 12 08 (66 :)
40-60 वर्ष 05 02 (40 :)
60-80 वर्ष 04 01 (25 :)
20-40 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएँ, जिन्हें युवाशक्ति कहा जाता है, इस वर्ग की साक्षर महिलाओं में 12 में से 08 महिलाएँ ही हिन्दी का सामान्य फॉर्म सर्वशुद्ध भरने मे सक्षम हैं। 40-60 वर्ष आयु वर्ग में 05 में से 02 तथा 60-80 वर्ष आयु वर्ग में 04 में से 01 महिला ही इस कार्य में सक्षम हैं। इसके साथ ही निरक्षर महिलाओं का एक परीक्षण किया गयाः-
आयु वर्ग महिलाओं की संख्या हस्ताक्षर करने की क्षमता
20-40 वर्ष 46 40 (86 :)
40-60 वर्ष 45 30 (66 :)
60-80 वर्ष 51 20 (39 :)
हस्ताक्षर करने विषयक दक्षता से तात्पर्य मात्र अपने नाम के वर्णों को लिखने से है। शेष समस्त महिलाएँ अंगूठे का प्रयोग करती हैं।
प्रस्तुत आंकड़े 21वीं सदी में भारत के एक हिस्से के हैं। एक ओर जहाँ भारत विकसित राष्ट्रों में अपना स्थान बनाने को अग्रसर है वहीं गढ़वाल में महिलाओं की यह स्थिति है कि उन्हें मातृभाषा बोलने और लिखने में भी समस्या है। प्रौद्योगिकी और तकनीक के चलते आज शिक्षा, वाणिज्य, व्यापार, मनोरंजन लगभग समस्त भारतवासियों की पहुँच में है। आज की इन परिस्थितियों में रिखणीखाल सहित भारत के अन्य कई हिस्सों में महिलाएँ पोस्ट ऑफिस तथा बैंक जैसे संस्थानों में फॉर्म भरवाने के लिए दूसरों का मुख देखने को बाध्य हैं। हस्ताक्षर के स्थान पर अंगूठे का प्रयोग उन्हें मानसिक रूप से भी दूसरों की तुलना में दुर्बल सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। यह वही भारत है जहाँ शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार जैसे हथियार जनता को दिए गये हैं। वास्तविक धरातल पर ये हथियार तभी कारगर हो सकते हैं जब देश का अंतिम व्यक्ति इनका प्रयोग करने योग्य बन सकेगा।
वस्तुतः रिखणीखाल प्रखण्ड में महिलाओं की सामान्य हिन्दी विषयक दक्षता नही के बराबर है। इसका अपना कारण भी है। यहाँ बोल-व्यवहार में मात्र गढ़वाली भाषा का प्रयोग किया जाता है। साथ ही पहाड़ी जीवन की कठिनाइयाँ इन्हें शिक्षा और साक्षरता जैसे विषयों पर मनन करने का अवकाश नहीं देती। शायद ही ऐसा कोई दिवस हो जब ये महिलाएँ अपने दैनिक कार्यों से पूर्णतः निवृत्त हो पाती हों। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि साक्षरता और शिक्षा की आवश्यकता इन्हें कभी महसूस नहीं होती।
गणतंत्र भारत में नारी शिक्षा और जागरूकता की इस दुःखद अवस्था को सुधारने तथा उन्हें शिक्षित करने के लिए जनता और सरकार दोनों को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। हमारे देश में पुरुषों के समान ही स्त्रियों को मत का अधिकार प्राप्त है। ऐसी स्थिति में स्त्रियों को अशिक्षित छोड़कर आगे बढ़ने की कल्पना नहीं की जा सकती। इस प्रकार क्षेत्रों में नागरिकों को यह बताए जाने की आवश्यकता है कि साक्षरता और शिक्षा के अभाव में वे कितने पिछड़ चुके हैं। जागरूकता के अभाव में वे अपने कितने हितों से वंचित हैं। उन्हें वर्तमान परिदृश्य सहित देश और दुनिया के विषय में जानकारी दिए जाने की आवश्यकता है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे अपने भीतर इस कमी को महसूस करें और इसे दूर करने हेतु दृढ़-प्रतिज्ञ हों।
यद्यपि सरकार द्वारा इस ओर अनेक कदम उठाये जा रहे हैं तथापि और प्रयासों की आवश्यकता है। ग्रामीणों को जागरूक करने हेतु प्रत्येक ग्रामसभा में सामुदायिक केन्द्र खोले जाने की जरूरत है, जहाँ ग्राम प्रधान व अन्य जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सप्ताह में कम से कम एक दिन ग्रामीणों को एकत्र कर उन्हें देश, दुनिया, समाज, शिक्षा आदि विषयों पर जानकारी दी जाए। इसके लिए उस क्षेत्र के पढ़े-लिखे नागरिकों, उस क्षेत्र में कार्यरत राजकीय कर्मचारियों तथा अध्यापकों की सहायता ली जा सकती है। इन्हें स्वयं सहायता समूह भी अपना प्रमुख योगदान दे सकते हैं। इसके साथ ही प्रौढ़ शिक्षा अभियान को और तीव्र तथा प्रभावी बनाने की जरूरत है। ग्रामीणों को नवीन तकनीकों के माध्यम से रोचकता के साथ यदि जानकारी दी जाय तो यह उपयोगी हो सकता है। जो महिलाएँ स्वयं पढ़ नहीं पायीं उन्हें स्वयं सहित अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानन्द का कथन है तुम मुझे सौ अच्छी माताएँ दो, मैं तुम्हें एक श्रेष्ठ राष्ट्र दूँगा। वस्तुतः समाज में महिलाओं का शिक्षित और जागरूक होना समूचे राष्ट्र के गौरव और विकास की निशानी है।
धन्यवाद ज्ञापन : मैं डॉ0 ज्ञानेन्द्र कुमार राउत जी को धन्यवाद ज्ञापित करना अपना कर्तव्य समझता हूॅँ, जिनके दिशा-निर्देशों में मैं यह शोध-पत्र पूर्ण कर सका।
संदर्भ-
1.डॉ0 लाल, बच्चन, शोध-पत्र जनपद उत्तरकाशी में विकास खण्डवार साक्षरता का क्षेत्रीय विश्लेषण, अनुसंधान वाटिका, अंक -01, 2011, पृ0 -29
2.पंचोली, राखी, शोध-पत्र, महिला सशक्तीकरण : दशा और दिशा, अनुसंधान वाटिका, अंक-01 2011, पृ0- 69
डॉ0 कपिल देव थपलियाल
प्रवक्ता, हिन्दी विभाग,
राजकीय महाविद्यालय रिखणीखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

हिन्दी उपन्यास और गाँधीवाद


अर्चना पाठ्या

      किसी भी विचारधारा एवं व्यक्तित्व का साहित्य पर प्रभाव परोक्ष और अपरोक्ष रूप में पड़ता है और उसको निश्चित रूप में संकेतित करना मुश्किल कार्य होता है। महात्मा गाँधी इतने व्यक्तित्ववान नेता थे कि ऐसा कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि गौतम बुद्ध के बाद भारत में गाँधीजी ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनका प्रभाव भारतीय जीवन-दृष्टि, विचारधारा, संवेदना, जीवन-रीतियाँ, समाज-मानस, व्यक्ति इत्यादि पर पड़ा और यह भी कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि आज फिर से गाँधी जीवन-दर्शन महत्त्वपूर्ण होने लगा है।

       सन् 1915 में गाँधीजी भारत लौटे और उन्होंने राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर तुjaत अपना प्रभाव डालना प्रारंभ किया था। भारतीय साहित्य भी इससे अलग नहीं रहा। हिंदी कविता पर और हिंदी उपन्यास पर गाँधीजी का प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव अनेक तरह से पड़ा। गाँधीजी के विचारों एवं जीवन-दृष्टि के आधार पर औपन्यासिक चरित्रों का प्रतिरूप बनाया गया, गाँधीजी के जीवन की घटनाओं का प्रतिबिंब प्रस्तुत किया गया, गाँधीजी द्वारा प्रवर्तित राष्ट्रीय आन्दोलनों का चित्ररूप दर्शन कराया गया, गाँधीजी के कुछ सिद्धांतों की मीमांसा करने के लिए कथाओं की संरचना की गयी। (उदाहरणस्वरुप हृदय-परिवर्तन, अहिंसक प्रतिरोध, सत्य का स्वरूप-विवेचन, ट्रस्टीशिप की परिकल्पना, औद्योगिक विकास के दौरान बढ़ने वाली अनैतिकता, दलित, पीड़ित, पतित, शोषित समाज के प्रति सहानुभूति आदि) संदेह नहीं कि गाँधीजी ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से, विचारों और शील से साहित्यकारों को पर्याप्त fo"k; प्रदान किया। यहाँ हिंदी उपन्यास पर गाँधीवादी प्रभाव के सकारात्मक पक्ष को देखना अभीष्ट है।
       प्रेमचन्द के कई उपन्यासों में गाँधीवाद की स्पष्ट झलक मिलती है। विशेषकर 'निर्मला', 'प्रेमाश्रम', 'ग़बन', 'कर्मभूमि' और 'रंगभूमि' में। 'गोदान' में भी गाँधीवादी चेतना मुखर है, यद्यपि बच्चन सिंह ने कहा है कि 'गोदान' में प्रेमचंद गाँधीवाद से मुक्त हैं। 'निर्मला' के एक पात्र को यों प्रस्तुत किया गया है - खद्दर के बड़े प्रेमी हैं, पीठ पर खादी लाद कर देहातों में बेचने जाया करते हैं और व्याख्यान देने में भी चतुर हैं।' 'प्रेमाश्रम' में एक पात्र से कहलवाया है- इसके लिए हमें विदेशी वस्तुओं पर कर लगाना पड़ेगा। यूरोपवाले दूसरे देशों से कच्चा माल ले जाते हैं, जहाज़ का किराया दे देते हैं, उन्हें मज़दूरों को कड़ी मज़दूरी देनी पड़ती है, उस पर हिस्सेदारों को नफ़ा भी ख़ूब चाहिए। हमारा घरेलू शिल्प इन समस्त बाधाओं से मुक्त रहेगा। प्रेमचंद के उपन्यासों पर जो राष्ट्रीय वातावरण का प्रभाव परिलक्षित होता है, उसका मूल कारण तत्कालीन राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ कही जा सकती हैं। प्रेमचंद के प्रथम कहानी-संग्रह 'सोज़े वतन' (सन 1908) की उग्रता देखकर सरकार ने उसे ज़ब्त कर लिया था। 'प्रेमाश्रम' में गाँधी की भाँति प्रेमचंद ने भी विश्वास व्यक्त किया है कि किसानों और ज़मींदारों के सम्बन्ध प्रेम और सहयोगपूर्ण हो सकते हैं। प्रेमशंकर और मायाशंकर जैसे जमींदार-वर्ग के व्यक्ति किसानों की सेवा में अपने जीवन को पूर्णतया समर्पित कर सकते हैं।1 प्रेमशंकर उसी का भूमि पर अधिकार मानता है, जो उसे जोतते हैं। मायाशंकर भी 'सबै भूमि गोपाल की' ही स्वीकार करता है तथा किसान और सरकार के बीच किसी अन्य वर्ग या श्रेणी की सत्ता एवं अधिकार को वर्तमान समाज का कलंक समझता है।2 प्रेमचंद 'प्रेमाश्रम' में लखनपुर गाँव में आदर्श राज्य की स्थापना करते हैं; जहाँ सेवा, प्रेम, सत्य, अहिंसा, त्याग, शारीरिक श्रम इत्यादि की प्रतिष्ठा दिखायी गयी है।
                'रंगभूमि' के गाँधीवादी नायक सूर का व्यक्तित्व अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। सूर का साधन-शुद्धि का आग्रह, मशीनीकरण का विरोध, पूँजीवादी संस्कृति की उपेक्षा, प्राचीनकाल से चली आयी सामन्तवादी संस्कृति के प्रति आकर्षण आदि विचार गाँधीवाद का प्रभाव सूचित करते हैं। सरकार और जन-सेवक के विरोध में सूर की लड़ाई भी अहिंसक ढंग से चलती है। 'काया कल्प' में मनुष्य ऐश्वर्य और विलास के पीछे पड़कर किस प्रकार पतित हो जाता है, इसकी चर्चा की गयी है। 'ग़बन' में भी विलासप्रियता और शारीरिक सुख के पीछे पड़ने के भीषण पर्यवसान की ओर संकेत कर सेवा और त्यागमय जीवन की महिमा गायी गयी है।
                'कर्मभूमि' में गाँधी के व्यावहारिक कार्यक्रमों का गाँवों में प्रचार दिखाया गया है। सूत-कताई, बुनाई, हरिजनोद्धार, शराबबंदी, मुर्दा जानवरों का मांस-भक्षण न करना, विभिन्न जातियों में रोटी-व्यवहार, मंदिर-प्रवेश का आन्दोलन इत्यादि को पढ़ते समय गाँधी-युग का वातावरण साकार होता जान पड़ता है। सरकारी नौकर सलीम एवं घोर धन-लोभी सेठ अमरकान्त का हृदय-परिवर्तन और उनका सम्पत्ति-दान तथा सुखदा का विलास-मार्ग को त्याग कर सेवा-मार्ग को ग्रहण करना, बूढ़ी पठानिन, नैना इत्यादि नारियों का राष्ट्र-सेवा के लिए तत्पर होना गाँधी-युगीन प्रभाव को व्यक्त करता है। मालूम होता है कि आगे चलकर यथार्थ के गहरे निरीक्षण ने इस जनवादी कलाकार की गाँधीवाद के प्रति आस्था को कुछ विचलित कर दिया और 'गोदान' में आकर वे समाजवाद की ओर क़दम बढ़ाते दिखायी पड़ते हैं। लेकिन गाँधीवादी तत्त्व प्रेमचंद के व्यक्तित्व से विलुप्त नहीं हुआ। ब्राह्मण मातादीन सिलिया चमारिन को अपनाता है, उसका हृदय-परिवर्तन होता है। मालती और मेहता के संबंधों में निर्विषय प्रेम का उद्भव होता है और दोनों जन-सेवा को समर्पित होते हैं।
गाँधीवाद से प्रभावित दूसरे लेखक हैं 'जैनेन्द्र''परख' में गाँधीवाद का प्रभाव 'सत्यधन' पर दिखाया गया है, परन्तु ढुलमुल वकील सत्यधन ने इस प्रभाव को बाह्य रूप में ग्रहण किया था। अतएव नारी, धन तथा प्रतिष्ठा के मोह को वह त्याग नहीं सका। इसके विपरीत बिहारी का व्यक्तित्व गाँधीवादी आदर्श से अनुप्राणित जान पड़ता है। जैनेन्द्र सम्भवत% दिखाना चाहते थे कि गाँधीजी का आदर्श सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं है, बल्कि वह बिहारी जैसे व्यक्ति के लिए ही उपयुक्त है, जिसके व्यक्तित्व का लंगर गहराई में पड़ा हुआ है। नन्ददुलारे वाजपेयी का कथन है कि 'सुनीता' तथा बाद की रचनाओं में जैनेन्द्र ने गाँधीवाद और मनोविज्ञान का समन्वय करने का असफल प्रयास किया है3
                सुनीता', 'सुखदा', 'व्यतीत' और 'विवर्त' में जैनेन्द्र नारी के पर-पुरुष से प्रेम करने की मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान गाँधीवादी दृष्टिकोण से- हृदय-परिवर्तन के सिद्धांत से] ढूँढ़ने का प्रयत्न करते हैं। वाजपेयीजी इस सम्बन्ध में लिखते हैं, ये पात्र अपनी पत्नियों को प्रत्येक दशा में पूरी छूट देते हैं और इस प्रणाली के द्वारा इनके हृदय-परिवर्तन की प्रतीक्षा करते हैं। गाँधीजी ने हृदय-परिवर्तन का आदर्श राजनीतिक स्तर पर प्रतिष्ठित किया था। पारिवारिक व्यवहारों में गाँधीजी हृदय-परिवर्तन जैसी वस्तु को स्वीकार करते थे। कदाचित् जैनेन्द्र ने यह तथ्य गाँधी-दर्शन से ही ग्रहण किया है।4 इसी प्रकार 'त्याग-पत्र' की मृणाल भी समाज द्वारा दिया गया कष्ट मौन भाव से सहन करती है। नगेन्द्र उसके बारे में लिखते हैं, कष्ट के कारणों से घृणा न करते हुए, कष्ट की अनिवार्यता से त्रास न खाकर, उसमें आनंद की भावना करना अहिंसा है और अहिंसा यह सिखाती है कि अमुक्त वासना का वितरण करना ही उसकी सफलता है5 जैनेन्द्र के प्रमुख पात्र समस्याओं के समाधान के लिए बुद्धि पर निर्भर रहने की अपेक्षा हृदय और श्रद्धा में विश्वास करते जान पड़ते हैं। गाँधीजी बुद्धि से अधिक श्रद्धा में आस्था रखते थे।6 जैनेन्द्र ने गाँधीवाद के प्रभाव को सीमित क्षेत्र में ही प्रस्तुत किया। जहाँ तक राष्ट्रीय आन्दालनों और नारी की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का प्रश्न है, जैनेन्द्र के उपन्यासों में उसका प्रभाव विचित्र रूप में दिखायी पड़ता है। 'सुनीता' में हरिप्रसन्न और स्वयं सुनीता का देश-प्रेम तथा अन्य उपन्यासों में किया गया राष्ट्रीय समस्याओं का क्षीण उल्लेख सीधा नहीं जान पड़ता। लगता है, जैनेन्द्र का यह आंतरिक चित्रण है कि गाँधीवाद विचारों के धरातल पर अपनाया जाय तो प्रसंग-विशेष में उसकी स्थिति बड़ी दयनीय हो सकती है। गाँधीवाद को अधिक आन्तरिकता से अपने समूचे व्यक्तित्व के साथ आपन्न करना आवश्यक है। हो सकता है, स्वयं जैनेन्द्र जी के मन में भी गाँधीवाद को लेकर कुछ शंकाएँ विद्यमान हों। इसके विपरीत गाँधीवाद के प्रति पूर्णत% तादात्म्य परिलक्षित होता है
       आलोचकों ने सियारामशरण गुप्त को भी गाँधी-लेखक माना है। जैनेन्द्र और सियारामशरण गुप्त के जीवनादर्श के सम्बन्ध में नगेन्द्र सही लिखते हैं, ''दोनों व्यक्तियों का जीवनादर्श एक है- पूर्ण अहिंसा की स्थिति प्राप्त कर लेना, अर्थात् अपने अहं को पूर्णत% Hkqला देना। इस साध्य के लिए सियारामशरण गुप्त की साधना अधिक हार्दिक है, नैतिक दमन का अभ्यास उनको अधिक है और उनका अहं सचमुच काफ़ी Hkwल चुका है। अहिंसा बहुत-कुछ उनके व्यक्तित्व का अंग बन चुकी है।'7 देवराज उपाध्याय भी सियारामशरण गुप्त के कथा-साहित्य पर अहिंसा का पूर्ण प्रभाव देखते हैं।8 सियारामशरण गुप्त के उपन्यासों पर गाँधीवाद का बाह्य प्रभाव नहीं है, परन्तु उनके व्यक्तित्व में गाँधीवाद के सिद्धांत-पक्ष का पूर्णत% पालन हुआ है। सियारामशरणजी सामाजिक मान्यताओं के नीचे कुचले गये निरीह व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दर्शाते हैं। 'गोद' में दुर्भाग्य से प्रताड़ित निरीह किशोरी को कठोर दण्ड भुगतना पड़ा। शोभाराम की मानवता भाभी के वात्सल्यपूर्ण आत्मीय-भाव का अवलम्बन पाकर जाग ही नहीं उठती, सक्रिय भी हो जाती है। वह अपने भाई के ख़िलाफ़ विद्रोह का झण्डा उठाती है। परन्तु यह विद्रोह दयाराम के हृदय-परिवर्तन के उपरान्त पारस्परिक प्रेम की प्रगाढ़ अनुभूति में बदल जाता है। 'अंतिम आकांक्षा' का नायक एक निम्न जाति का स्वामी-भक्त और सत्यनिष्ठ व्यक्ति है, जिसके हाथ से एक डाकू की हत्या हो गयी है। लेखक रामलाल के विशाल हृदय का चित्रण करने में तल्लीन हो गया है। 'नारी' में जमुना और अजीत के निष्कलुष स्नेह-भाव को चित्रित करने में लेखक सफल हुआ है। जमुना अपने पुत्र से कहती है, ''सह ले इसे,सह ले। कमज़ोर क्यों पड़ता है? जितना ही अधिक सह सकेगा, उतना ही बड़ा होगा।...'' इस वाक्य में गाँधी के सन्देश की ध्वनि स्पष्ट सुनायी पड़ती है। सियारामशरण गुप्त के पात्रों में सामाजिक अन्याय के प्रति तीव्र विद्रोह-भाव नहीं है, आक्रोश का भाव भी नहीं दिखायी देता; परन्तु इनकी पीड़ा दुर्बल की मोटी हाय है, जो लोहे को भी भस्म कर देती है।9
       गाँधीजी का मूल मंत्र है मानव-उपासना। सियारामशरण जी जीवन-पर्यन्त इसी मानव-उपासना में लगे रहे, जिसकी अभिव्यक्ति 'मौर्य-विजय', 'अनाथ', 'आर्द्रा', 'दूर्वादल', 'आत्मोत्सर्ग' और 'बापू' में दिखायी देती है। सियारामशरण जी को सम्बोधित करते हुए 'बापू' की भूमिका में श्री महादेव देसाई ने लिखा है, "आपकी गगरी का पानी पीकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आप ठीक कहते हैं कि बापू एक बड़ा तीर्थ हैं। उस तीर्थ के विपुल सलिल से जिसकी जितनी शक्ति हो, उतना ही ले सकता है।10 महात्मा गाँधी गीता द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत के समर्थक थे कि हमारा साध्य ही नहीं, साधन भी निष्कलुष होना चाहिए। 'रश्मिरथी' का कर्ण इसी सिद्धांत का साकार रूप है।
       गाँधीजी के विरोध में मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित लेखकों ने काफ़ी लिखा। ब्रह्मचर्य, हृदय-परिवर्तन, काम-दमन या संयम, आर्थिक कृषि-केन्द्रित नीति, बड़े उद्योगों के प्रति गाँधीजी का दृष्टिकोण, अहिंसा पर बल आदि मुद्दों पर करारे आघात किये गये। लेकिन वह सब इतिहास की वस्तु बन गया है, क्योंकि गाँधीवाद का मखौल उड़ाना आसान है, उनकी मूलभूत दृष्टि, तत्त्व और आचरणगत व्यवहार पर टिकाऊ विरोध करना कठिन है। गाँधीजी की विचार-धारा को एक प्रकार से आध्यात्मिक मानववाद कहा जा सकता है, जिसके मूल आधार हैं सत्य और अहिंसा। उनकी दृष्टि में सत्य के साक्षात्कार से समबुद्धि प्राप्त होती है और समबुद्धि से सबके प्रति अहिंसा का भाव उत्पन्न होता है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि अहिंसा सत्य का ही दूसरा पहलू है। उनके अनुसार अहिंसा सत्य का भाव-पक्ष है, इसका अर्थ केवल हिंसा का अर्थात् द्वेष-बैर का अभाव नहीं, वरन् प्रेम का भाव है। गाँधीजी की इस अहिंसा में द्वेष-बैर-त्याग, चराचर-प्रेम और पूर्ण निष्काम भाव की सेवा का समन्वय है।11
       आलोचनाओं की आग में तपकर आज महात्मा गाँधी के सिद्धांत तथा उनकी नीतियाँ और प्रखर साबित हो रही हैं। महात्मा गाँधी के विषय में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन ने कहा था कि आनेवाली पीढ़ियाँ मुश्किल से यह विश्वास कर सकेंगी कि हमारे बीच हाड़-मांस का ऐसा चलता-फिरता आदमी पैदा हुआ था। आनेवाली पीढ़ियों का यह विश्वास जीवित रखने का उत्तरदायित्व हमारे देश के प्रबुद्ध कवियों और लेखकों का है, जो अपनी रचनाओं के माध्यम से यह काम बख़ूबी कर सकते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सियाराम शरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सुभद्रा कुमारी चौहान, सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत आदि की कविताओं में तथा प्रेमचन्द, जैनेन्द्र कुमार, विष्णु प्रभाकर आदि के उपन्यासों, कहानियों और नाटकों में गाँधीवाद की सर्वाधिक छाप मिलती है।'' महात्मा गाँधी ने विश्व-बंधुत्व, लोक-मंगल की विचारधारा को अपनाकर साम्य भाव को महत्त्व दिया। छायावादी रचनाओं में गाँधी जी के इस साम्य भाव और मानव-कल्याण की भावनाओं को भरपूर स्थान मिला। यदि छायावाद को गाँधीयुग की देन मान लें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।'' डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ''गाँधी की अहिंसा उस युग की चेतना की प्रतीक थी, अतएव छायावाद में वैयक्तिक चेतना के आस्तिक अधिमानसिक रूप का ही विकास हुआ। पन्त, महादेवी जैसे सुकुमार भावनाओं के कवियों ने तो उसे आत्मसात कर लिया। प्रसाद और निराला जैसे उद्दाम कवियों ने भी उन मूल्यों को ही स्वीकार किया।
       महात्मा गांधी जी का कथन था कि 'समाज के वंचित-मुंचित, दलित-शोषित, दरिद्रनारायण की सेवा करो। फलस्वरूप कई काव्य और उपन्यास अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों पर लिखे गए। सन बीस से लेकर चालीस के बीच पचासों उपन्यास इस दिशा में अग्रसर हुए। मैथिलीशरण गुप्त के 'किसान' और 'अछूत' खंडकाव्य, रवीन्द्रनाथ की 'चांडालिका', शरतचंद्र चटर्जी का 'पल्ली समाज' इसी कोf के हैं। गांधी जी ने सेवा, संयम एवं अहिंसा का जो पाठ पढाया था, उसी तथ्य पर आधारित व्यंग्य नाटक 'बकरी' सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का है। नरेंद्र कोहली का 'शंबूक की हत्या' भी इसी कोटि की है। हिन्दी साहित्यकारों के साथ-साथ, दक्षिण भारत के साहित्यकारों में भी गांधी जी के भाषण का अद्वितीय प्रभाव रहा। गांधी जी का कहना था, 'गांवों की ओर चलो।  विकेंद्रीकरण के इस नारे का ही प्रभाव था कि हिन्दी में 'देहाती दुनिया', 'गोदान' और 'मैला आंचल' तक, ग्राम और ग्रामीण जीवन, कहानियों और उपन्यासों का विषय बना। महात्मा गांधी जी के सिध्दांतों का प्रभाव केवल राष्ट्रीय आंदोलन पर ही नहीं, विश्व शांति के लिए अहिंसा का प्रेरणा देने में भी था।
       इस प्रकार कह सकते हैं कि गाँधी-युग के समग्र प्रभाव को प्रेमचंद ने अभिव्यक्ति दी, जैनेन्द्र ने पारिवारिक क्षेत्र के अन्तर्गत विशिष्ट समस्या का विश्लेषण करने में गाँधीवाद के अहिंसा, प्रेम और हृदय-परिवर्तन के सिद्धांतों का उपयोग किया और सियारामशरण गुप्त ने गाँधी के सिद्धांतों को अपने व्यक्तित्व में पूर्णत% आत्मसात् कर राजनैतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से अलग (यथा संभव) रहकर गाँधी के सैद्धांतिक पक्ष को कतिपय पात्रों के माध्यम से मूर्त करने का प्रयत्न किया। यह सत्य आज के साहित्य में व्यक्त हो रहा है- गाँधीवाद का नाम नहीं लिया जाता है, परन्तु है वह कहीं गाँधी की आत्मा की पुकार। गाँधी साहित्य के द्वार खटखटा रहा है, हम सजग नहीं होंगे तो देवता कूच कर सकता है। सवाल हमारी ही सार्थक अभिव्यक्ति का है। गाँधी जी ने दूसरों के लिए जीवन जीने की सीख भी दी थी। विश्वास है कि यदि लोग इस पर चल सकें तो बहुत-सी समस्याएँ अपने आप सुलझ जायेंगी। इससे मनुष्य बेहतर नागरिक बनेंगे।
संदर्भ संकेत :
1. 'प्रेमाश्रम', पृ. 142.
2. वही, पृ. 382.
3. वाजपेयी, नन्ददुलारे, नया साहित्य : नये प्रश्न, पृ. 194.
4. वाजपेयी, नन्ददुलारे,  नया साहित्य : नये प्रश्न, पृ. 198.
5. नगेन्द्र, विचार और अनुभूति, पृ. 139.
6. देखिए, Indian Political Thought, Page 414 : Sharma ‘Reason is poor thing in midst of temptation, Faith that transcends reason is our only Rock of Age.’
7. नगेन्द्र, विचार और अनुभूति, पृ. 141.
8. गुप्त, सियाराम शरण, बापू,  पृ. 106.
9. माचवे, प्रभाकर, सन्तुलन, पृ. 173.
10. गुप्त, सियाराम शरण, बापू, पृष्ठ 5.
11. डॉ. नगेन्द्र : आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ, पृष्ठ 40-44.
डॉ.अर्चना पाठ्या

वर्धा, महाराष्ट्रA