Friday, 1 January 2010

पंचायती राजः आवश्यकता एवं उपादेयता


डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद यादव एवं कु0 प्रवीणा सिन्हा
वरिष्ठ प्रवक्ता, समाजशास्त्र विभाग, राजकीय महिला महाविद्यालय, पट्टी, प्रतापगढ।
शोध छात्रा , राजनीति शास्त्र, डाॅ0 राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद


भारत के लोगों के लिए पंच, पंचायत, ग्राम स्वराज जैसे शब्द नए नहीं हैं। ग्रामीण अंचलों में जहाॅं मीडिया की पहुॅच आज भी नहीं है वहाॅं के कबाइलीनुमा समाज के निरक्षर लोग भी इन शब्दों से भलीभाॅति परिचित है। ये लोग पंच को परमेश्वर मानते हैं और उसी के आदेशों, निर्णयों से प्रशासित होते हैं। देश के राजनेताओं और नीति नियामकों को यह बात भलीभाॅति मालूम होते हुए भी आजादी के 45 वर्षों बाद 1992 में देश के संविधान में तिहत्तरवें - चैहत्तरवें संशोधन द्वारा इस व्यवस्था को संवैधानिक रूप दिया गया। इस एक तथ्य से ही पता चलता है कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण और गाॅवों में रामराज लाने की रट लगाने वाले हमारे नेता तथा नौकरशाह प्रशासन में ग्रामीण जनता को सहभागी बनाने के प्रति कितने उदासीन हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमारे देश में प्राचीन काल से ही स्वशासित गाॅवों की परम्परा रही है। सुदूर गावों में ग्रामीण जन सहभागिता के आधार पर प्रशासन का कार्य करते हैं। आधुनिक भारत के सन्दर्भ में देखें तो स्थानीय निकाय का 1787 में मद्रास कस्बे में पहली बार विधिवत गठन किया गया। इस निकाय में भारतीय प्रतिनिधियों के अलावा कुछ विदेशी प्रतिनिधि भी थे। 19वीं शताब्दी के अन्त में अंग्रेजी हुक्मरानों ने ग्राम पंचायतों का भी गठन किया था लेकिन शहरी निकायों की तुलना में इन पंचायतों को काफी सीमित वित्तीय अधिकार प्राप्त थे। ग्राम पंचायतें वास्तव में जमींदारों का हित संरक्षण करती थीं और जमींदार अंग्रेजों के हित साधक बने हुए थे।1
ग्राम पंचायतों और नगर निकायों को अधिकार सम्पन्न बनाने की पहली आवाज तब उठी जब कांग्रेस ने 1909 के लाहौर अधिवेशन में इस आशय का प्रस्ताव पारित किया। इस बात को लेकर अंग्रेजी सरकार की काफी आलोचना हुई कि वह स्थानीय निकायों को आगे बढ़ने नहीं दे रही है। 1915 के बाद भारतीय राजनीति के क्षितिज पर महात्मा गाॅंधी के उदय के बाद ग्राम स्वराज का नया नारा निकला जो बाद में स्वाधीनता आन्दोलन का पर्याय बन गया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार में स्थानीय निकायों को कतिपय अधिकार दिये गये। 1935 में भारत सरकार अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार प्रान्तीय सरकारों का गठन हुआ। इससे स्थानीय निकायों के लिए एक अनुकूल वातावरण मिला।
संविधान निर्माण के समय स्थानीय निकायों तथा गाॅंधी के ग्राम स्वराज पर संविधान निर्माताओं के बीच काफी चर्चा हुई। अधिकांश नेतागण इससे सहमत भी थे कि डाॅ0 भीमराव अम्बेडकर अपनी कुछ शंकाओं के कारण इस व्यवस्था के पक्षधर नहीं थे। दरअसल डाॅ0 अम्बेडकर को लगता था कि ग्राम स्वराज व्यवस्था को लागू करने से कुल मिलाकर वर्ण व्यवस्था को ही बढ़ावा मिलेगा। अम्बेडकर की यह शंका काफी हद तक उचित थी क्योंकि उन दिनों भारत के गाॅवों में वर्ण व्यवस्था का बोलबाला था और प्रायः सभी स्थानों पर उच्च जाति के लोगों का दबदबा था। अन्ततः गाॅंधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को नीति निर्देशक तत्वों वाले खण्ड में स्थान दिया गया।2
स्वतंत्रता के बाद देश की नीति निर्धारकों ने महात्मा गाॅंधी के विचारों से प्रेरणा लेकर देश में पंचायती राजव्यवस्था का शुभारम्भ किया। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू ने पंचायती राज व्यवस्था की उपादेयता को समझते हुए सामुदायिक विकास मंत्रालय का गठन किया और एस0के0 डे, को इस विभाग का मंत्री बनाया। 2 अक्टूबर 1952 को पंचायती राज व्यवस्था का सूत्रपात वास्तविक धरातल पर तब हुआ जब भारत सरकार के द्वारा ग्राम्य विकास हेतु सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। इस कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्राम्य समूह को एक इकाई मानकर इसके विकास हेतु सरकारी कर्मचारी के साथ सामान्य ग्राम्यजन को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया गया। 1957 में बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। समिति ने भारत में त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था की स्थापना की संस्तुति की। ग्राम या नगर पंचायत, तहसील पंचायत तथा जिला पंचायत नाम की तीन संस्थाओं के साथ समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की मूल इकाई प्रखण्ड या समिति के स्तर पर होनी चाहिए। मेहता समिति ने गाॅवों के समूहों के लिए प्रत्यक्षतः निर्वाचित पंचायतों, खण्ड स्तर पर निर्वाचित तथा नामित सदस्यों वाली पंचायत तथा जिला स्तर पर जिला परिषद गठित करने का सुझाव दिया था।3
मेहता समिति को 1 अप्रैल 1958 को सम्पूर्ण देश में लागू किया गया। राजस्थान राज्य ने सर्वप्रथम इस समिति की सिफारिशों को अपनाते हुए 2 सितम्बर, 1959 को पंचायती राज अधिनियम पारित किया और 2 अक्टूबर, 1959 को राजस्थान के नागौर नामक स्थान में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर इस व्यवस्था का उद्घाटन किया गया। इसके पश्चात् 1959 में आन्ध्र प्रदेश ने, 1960 में तमिलनाडु ने, 1963 में महाराष्ट्र ने, 1964 में पश्चिम बंगाल ने, इस व्यवस्था को अपनाने के लिए अधिनियमों का प्रणयन किया।
1977 में केन्द्र में सत्तासीन जनता पार्टी की सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था को प्रभावी बनाने तथा स्थापित व्यवस्था के दोषों को दूर करने के लिए अशोक मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। अशोक मेहता समिति ने पंचायती राज व्यवस्था की समीक्षा के साथ-साथ इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कुल 132 सिफारिशों के साथ अपनी रिपोर्ट  केन्द्र सरकार को सौंपी। अशोक मेहता समिति त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के स्थान पर द्विस्तरीय व्यवस्था की सिफारिश की। रिपोर्ट में जिला स्तर के नीचे मण्डल पंचायत का गठन किये जाने की संस्तुति की गयी थी जिसमें लगभग 10 से 15 गाॅवों जिनकी कुल जनसंख्या 15,000 से 20,000 हो। ग्राम पंचायत समितियों को अनावश्यक बताते हुए मण्डल अध्यक्ष का चुनाव प्रत्यक्ष एवं जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से कराने की संस्तुति समिति ने की थी। मण्डल अध्यक्ष तथा जिला परिषद अध्यक्ष का कार्यकाल 4 वर्ष हो तथा विकास योजनाएँ जिलापरिषद द्वारा तैयार किये जाने की संस्तुति रिपोर्ट में की गयी थी।
इस समिति की सिफारिशों के आधार पर पश्चिम बंगाल ने 1978में राज्य मंें पंचायत चुनाव सम्पन्न कराया तथा नवगठित पंचायती राज संस्थाओं को अधिकार प्रदान कर ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की सहभागिता को सुनिश्चित किया। पश्चिम बंगाल राज्य प्रत्येक 5वर्ष पर संस्थाओं का चुनाव आयोजित करता रहा है। इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था को सही ढंग से लागू करवाने में पश्चिम बंगाल का स्थान प्रथम है। 1985में कर्नाटक सरकार ने भी पंचायती राज संस्थाओं को अधिकतम अधिकार देकर तथा समय पर चुनाव कराकर अन्य राज्यों के लिए माॅडल का काम किया। पंचायत राज व्यवस्था को एक ओर जहाँ असफल और अस्वीकार योग्य बताया जा रहा था वहीं इन दो राज्यों ने इस व्यवस्था को न केवल बखूबी संचालन किया बल्कि क्षेत्रीय विकास में आम ग्राम्य जन की भागीदारी को सुनिश्चित किया।4
ग्राम्य विकास में जनसहभागिता, गरीबी उन्मूलन, प्रशासनिक व्यवस्था मे जनसहभागिता इत्यादि विषयों को ध्यान में रखते हुए 1985 में केन्द्र सरकार द्वारा जी0वी0के0 राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला परिषद, मण्डल स्तर का मण्डल पंचायत तथा गाॅंव स्तर पर ग्रामसभा के गठन की सिफारिश की। समिति ने विभिन्न स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षण की भी सिफारिश की थी। किन्तु समिति के सुझावों को सरकार ने अमान्य कर दिया। 1986 में पंचायती राज व्यवस्था की समीक्षा तथा सुझाव हेतु डाॅ0 लक्ष्मी सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा किया गया। सिंघवी समिति ने पंचायती राज व्यवस्था को और प्रभावशाली बनाने के लिए गाॅवों के पुनर्गठन की संस्तुति करते हुए कहा कि गाॅवों में पंचायतों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए पंचायतों को वित्तीय अधिकार दिए जायॅ तथा इन्हें और अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ ताकि ग्रामीण विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जा सके। 1987में गठित सरकारिया आयोग ने पंचायतराज संस्थाओं को और सशक्त बनाने का विचार करते हुए कहा था कि ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जिससे इन संस्थाओं को भंग ही न किया जा सके। 1989में पी0के0 थुंगन समिति का गठन केन्द्र सरकार द्वारा किया गया। इस समिति ने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने, निर्धारित समय पर चुनाव कराने तथा जिला परिषदों को योजना एवं विकास अभिकरण बनाने का सुझाव दिया।5
थुंगन समिति की संस्तुतियों को ध्यान में रखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाॅधी की प्रेरणा से संसद में 64वाॅ एवं 65वाॅ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया गया था किन्तु विपक्षी दलों का समर्थन न मिल पाने के कारण यह पारित न हो सका। बाद में दिसम्बर, 1992 को 73वाॅ एवं 74वाॅ संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा पारित किया गया। 17 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किये जाने के पश्चात् 20 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किया गया। 24 अप्रैल, 1993 को अधिसूचित होने के साथ-साथ देश की सभी पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक आधार प्राप्त हो गया। 73वाॅ संविधान संशोधन ग्राम पंचायतों से सम्बन्धित है जबकि 74वाॅ संविधान संशोधन नगर पालिकाओं से सम्बन्धित है। इन दोनों संशोधनों को संविधान में स्थान देने के लिए भाग-9 की अंतस्थापना की गयी। संविधान का यह भाग मिजोरम, मेघालय एवं नागालैण्ड को छोड़कर सभी स्थानों पर लागू है।6
संविधान के भाग 9 में अनुच्छेद 243 के अन्तर्गत अनुच्छेद 243(क) से 243(ण) तथा अनुसूची 11 में पंचायतीराज व्यवस्था  से सम्बन्धित प्रावधान दिए गये हैं। कुछ प्रमुख प्रावधान इस प्रकार है-
(1) पंचायत व्यवस्था का प्रथम स्तर गाॅव सभा होगी जो एक या अधिक ग्रामों से मिलकर बनेगी। ग्राम सभा की शक्तियों के सम्बन्ध में राज्यविधान मण्डल कानून बनायेगा।
(2) 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों को दो स्तरीय ग्राम स्तर एवं जिला स्तर तथा 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायत ग्राम स्तर, खण्ड स्तर एवं जिला स्तर की पंचायतों का गठन किया जायेगा।
(3) पंचायत सदस्यों का तथा ग्राम पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव वयस्क मतदाताओं द्वारा प्रत्येक पाॅच वर्ष पर किया जायेगा। खण्ड स्तर एवं जिला स्तर के पंचायत के अध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष  मतदान द्वारा किया जायेगा।
(4) पंचायत के सभी स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा जनजाति के सदस्यों के लिए उनकी संख्या के अनुपात में आरक्षण प्रदान किया जायेगा तथा महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण होगा।
(5) पंचायतों का कार्यकाल 5वर्ष होगा किन्तु इनका विघटन 5वर्ष के पूर्व भी किया जा सकेगा। विघटन की दशा में 6 माह के अन्दर चुनाव कराना आवश्यक होगा।
(6) संविधान के अनुच्छेद 243(छ) में पंचायतों के अधिकार और शक्तियों का उल्लेख मिलता है। इसके अनुसार राज्य विधानमण्डल संविधान में विनिर्दिष्ट शक्तियों एवं शर्तों के अधीन रहते हुए निम्नलिखित विषयों के सम्बन्ध में शक्तियाँ और दायित्व निर्वहन के लिए उपबन्ध कर सकेंगी-
(क)आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय के लिए योजनाएँ तैयार करना।
(ख) आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाओं को कार्यान्वित करना जो उन्हें सौंपी जाय। इसके अन्तर्गत वे योजनाएँ और स्कीमें आती हैं जो 11वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों के सम्बन्ध में है।
(7) राज्य विधानमण्डल पंचायतों को कर लगाने, उन्हें वसूल करने तथा प्राप्त धन को व्यय करने का अधिकार प्रदान कर सकती है।
(8) पंचायतों की वित्तीय स्थितियों के सम्बन्ध मंें जाॅच करने के लिए प्रत्येक 5वर्ष पर वित्तीय आयोग का गठन किया जायेगा जो अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपेगा।
जुलाई 1994 में भारत सरकार के ग्रामीण मंत्रालय द्वारा संविधान के भाग-9 को अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू करने के लिए संस्तुति करने हेतु दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट दिसम्बर 1994 में केन्द्र सरकार को सौंपी गयी। समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि किसी ग्राम पंचायत मे एक से अधिक ग्राम हैे तो सभी गाॅवों में ग्राम सभा होनी चाहिए साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में गाॅवों की परम्परागत संरचना, सांस्कृतिक रीति रिवाज तथा परम्परागत ग्राम परिषद को बनाए रखना चाहिए। रिपोर्ट  में यह भी कहा गया है कि पुलिस, आबकारी, वानिकी तथा राजस्व इत्यादि विभागों के निचले स्तर के कर्मचारियों की भूमिका आदिवासी क्षेत्रों में कम होनी चाहिए तथा इन्हें ग्राम पंचायतों के अधीन कार्य करना चाहिए साथ ही ग्राम सभाओं को ऐसे अधिकार देने चाहिए जिससे ग्राम वासी ग्रामीण संसाधनों का भरपूर तथा सार्थक उपयोग कर सकें।7
उल्लेखनीय है कि भूरिया समिति की कई सिफारिशों को संसद द्वारा स्वीकार कर कानून का रूप देते हुए अधिनियम पारित किया जा चुका है। इसके अन्तर्गत पाॅचवीं अनुसूची के आदिवासी क्षेत्रों की पंचायती संस्थाओं तथा ग्राम सभाओं को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं।
उपरोक्त अध्ययन हमें देश में पंचायती राजव्यवस्था के क्रमशः विकास एवं इसके लिए किए गये सरकारी प्रयास को दर्शाता है। केन्द्रीय स्तर पर पंचायती राजव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए निश्चय ही प्रयास किया गया है किन्तु इन प्रयासों का वास्तविक लाभ ग्रामीण जनता को नहीं मिल पा रहा है। यह व्यवस्था सैद्धान्तिक रूप से जितना उपयोगी दिखायी देती है व्यावहारक स्तर में उसमें उतनी ही विसंगतियाँ दिखायी पड़ती हैं। वास्तव में पंचायतीराज लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला है। लोकतंत्र मूलतः शक्तियों के विकेन्द्रीकरण पर आधारित शासन प्रणाली है। शासन के ऊपरी सतह लोकतंत्र सैद्धान्तिक रूप से भले ही दिखायी देता हो किन्तु इसकी सच्ची तस्वीर तो गाॅव में दिखायी देती है। जनता में साक्षरता का अभाव, अपने अधिकारों से अनभिज्ञता, संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति उदासीनता आज भी गाॅवों में दिखायी देती है। ग्रामीण जनता की इस स्थिति का लाभ पूॅजीपतियों, राजनेताओं तथा क्षेत्र उन धूर्तबाज लोगों को मिलता है जो पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर अपनी झोली भरते हैं। वास्तव में पंचायतीराज की उपादेयता तब ही है जब ग्रामीण जनता शिक्षित और जागरूक हो। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली भोली-भाली जनता पंचायती राजव्यवस्था और इसके अन्तर्गत उनकी बेहतरी के लिए किये गये प्रावधानों को न तो जानती है और न ही जानने का प्रयास करती है। यही कारण है कि ग्राम प्रधान और ग्राम पंचायत स्तर के अधिकारी ग्राम के विकास के लिए जारी किये गये धन का अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।8
लोकतान्त्रिक राजनीतिक व्यवस्था में पंचायती राज ही एक मात्र वह साधन है जो शासन को जन सामान्य के दरवाजे तक पहुॅचाता है। पंचायती राज व्यवस्था में स्थानीय लोगों में स्थानीय कार्यों के प्रति रुचि बनी रहती है। स्थानीय समस्याओं का स्थानीय तरीके से समाधान पंचायती राज व्यवस्था में ही सम्भव है किन्तु यह तभी सम्भव होगा जब स्थानीय स्तर की जनता शिक्षित और जागरूक होगी। स्थानीय स्तर पर शिक्षा का इधर कुछ वर्षों में प्रचार प्रसार तो हुआ है किन्तु इसी के साथ स्थानीय स्तर पर बाहुबलियों की संख्या में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। सत्ताधारी दल के  लोग भी बाहुबलियों को ही बढ़ावा देते हैं इसका परिणाम यह होता है कि स्थानीय स्तर पर जागरूक जनता भी अपने अधिकारों के प्रति उदासीन बने रहने में ही अपनी भलाई समझती है। किसी भी राष्ट्र में लोकतंत्र की उन्नति तभी संम्भव है जब स्थानीय स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के शासन में सामान्य जन की सक्रिय भागीदारी हो। यह भागीदारी ही लोकतंत्र का मानदण्ड निर्धारित करती है। यह सब तभी सम्भव है जब पंचायतीराज का सफल क्रियान्वयन हो।
भारत जैसे देश में जहाॅं 70 प्रतिशत जनता ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हो वहाॅं पंचायतीराज नामक स्थानीय स्वशासन का महत्व स्वतः सिद्ध और सर्वथा असंदिग्ध है। राष्ट्रपिता महात्मा गाॅंधी आधुनिक भारत में ग्राम स्वराज के लिए ग्राम पंचायत की सबसे बड़े पक्षधर थे। उन्होंने कहा था, ‘स्वतंत्रता स्थानीय स्तर से शुरू होनी चाहिए। प्रत्येक गाॅव में एक गणराज्य अथवा पंचायतराज होना चाहिए। प्रत्येक पंचायत राज के पास पूर्ण सत्ता और शक्ति होनी चाहिए। प्रत्येक गाॅव को आत्मनिर्भर होना चाहिए और अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूर्ण करना चाहिए ताकि सम्पूर्ण प्रबन्ध वह स्वयं चला सके। वास्तव में सच्चे लोकतंत्र के लिए स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ अनिवार्य हैं। हेराल्ड लाॅस्की के अनुसार, ‘हम लोकतंत्रीय शासन से पूरा लाभ तब तक नहीं पा सकते जब तक कि हम यह न मान लें कि सभी समस्याएँ केन्द्रीय समस्यायें नहीं हैं। साथ ही उन समस्याओं को उन्हीं स्थानों पर उन्हीं लोगों द्वारा हल किया जाना चाहिए जो उन समस्याओं से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं।
वर्तमान में सम्पूर्ण भारत में 227697 ग्राम पंचायतें, 5913 पंचायत समितियाँ तथा 475 जिला परिषदें कार्यरत हैं जिसमें जन प्रतिनिधियों की संख्या कुल लगभग 34 लाख है। किन्तु गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर शेष में पंचायत चुनाव नहीं कराये गये हैं। बिहार में तो 22 वर्ष के अन्तराल पर पंचायत चुनाव होने का रिकार्ड है। राज्य स्तर पर इस प्रकार की लापरवाही न केवल पंचायत राजव्यवस्था को हानि पहुॅचा रही है बल्कि भारत की लोकतान्त्रिक प्रणाली को भी आघात पहुॅचा रही है।
पंचायतों को कितने ही कार्य सौप दिए जायॅ और कितने ही अधिकार दे दिये जायें वे सब अर्थहीन हैं, यदि उन्हें सम्पन्न करने के लिए उन्हें वित्तीय साधन न उपलब्ध कराये जायें। कुछ राज्यों को छोड़कर वित्तीय संसाधन के मामलों में यह स्थिति अधिकांश राज्यों की है। सभी राज्यों में पंचायतों के तीनों स्तरों पर राज्य से अनुदान देने का प्रावधान है किन्तु कर्नाटक तथा महाराष्ट्र को छोड़कर अन्य राज्यों में इस व्यवस्था को लागू नहीं किया गया है। पंचायत स्तर पर लगाये गये करों पर भी पंचायतों का पूर्ण अधिकार कुछ ही राज्यों में है। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की ओर से जो धन पंचायतों को दिया जाता है वह किसी योजना या कार्यक्रम हेतु होता है। इस प्रकार पंचायतें स्वशासी तंत्र न होकर राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार की कार्यान्वयन एजेन्सी मात्र बन कर रह गयी है। इन सब स्थितियों का अध्ययन करने के बाद पंचायती राज की उपादेयता तो समझ में आती है किन्तु इसकी सार्थकता संदिग्ध है। वास्तव में यदि पंचायती राज को सशक्त बनाना है तो उसे स्थानीय स्तर पर सशक्त बनाना होगा। पंचायती राज संस्थायें सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय, राष्ट्र निर्माण, राजनीतिक विकास इत्यादि का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। किन्तु यह तभी सम्भव होगा जब पंचायती राज संस्थाओं को राज्य सरकारों का सकारात्मक सहयोग मिले। इसके अतिरिक्त राजनीतिक दलों तथा अन्य सामाजिक शक्तियों में पंचायतीराज संस्थाओं के प्रति एक प्रतिबद्धता आवश्यक है। गाॅधी के सपनों का भारत बनाने के लिए यह प्रतिबद्धता पहली और आवश्यक शर्त है।
सन्दर्भ सूचीः
1. आचार्य रमेश चन्द्र शास्त्रीः भारत में पंचायती राज, अजमेर,1961,पृ0 113
2. अर्जुन वाई, दर्शनांकरः लीडरशिप इन पंचायती
3. राज, पंयशील प्रकाशक जयपुर, 1979, पृ0 23
4. डी0वी0, राघव,ः पंचायती राज -रूरल डेवलपमेंट, आशीष पब्लि हाउस, दिल्ली,1980, पृ0 78
5. फडि़या, मंजुः भारतीय प्रशासनिकसेवा, हिमांशु पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2004, पृ0 148
6. शमता सेठः पंचायती राज, हिमाशु पब्लिकेशन, उदयपुर, 2002, पृ0. 123
7. एस0के0 सिंहः पंचायती राज, कुरुक्षेत्र मासिक पत्रिका दिल्ली, जुलाई, 2001, पृ0 28
8. सीताराम सिंहः पंचायती राज और ग्रामीण सुरक्षा, कुरुक्षेत्र मासिक पत्रिका, मार्च1989, पृ0 38


”पर्यावरण प्रबंधन में मानवाधिकार संरक्षण“


राजेश कुमार
शोध छात्र, राजनीति विज्ञान विभाग,
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी


मानवाधिकार का तात्पर्य मानव अधिकारों से है। ये ऐसे अधिकार हैं जो प्रत्येक मनुष्य को जन्मतः मिले हैं। ये मनुष्य की प्रकृति में ही निहित है और किसी रीति-रिवाज, परम्परा, रुढि़, कानून, राज्य, शासक या किसी अन्य संस्था की देन नहीं है। मानवाधिकार पहले है और राज्य या कानून जैसी चीजें बाद में है। यह बात अलग है कि समय के गुजरने के साथ-साथ राज्य या कानून इन्हें प्रवर्तित कराने वाले माध्यमों के रूप में उभरे हैं।1 इन संस्थाओं का लक्ष्य मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकना भी है ताकि प्रत्येक मनुष्य लोकतांत्रिक अधिकारों का उपभोग कर सके, गरिमामय जीवन जी सके, अपना चहुँमुखी विकास कर सके और राज्य का एक सत्यनिष्ठ नागरिक बन सके। किन्तु इन तमाम दावों-प्रतिदाओं के बावजूद वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सम्मानपूर्वक सुरक्षित जीवन यापन मानवजाति के समक्ष एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। तापमान के बढ़ते पारे ने जिस तरह से पूरे धमक के साथ पर्यावरण के बढ़ते संकट का आगाज किया है। उसमें मानव के सुरक्षित जीवन यात्रा तभी सम्पन्न हो सकती है जबकि समस्त नागरिकों को स्वच्छ पर्यावरण युक्त मानवाधिकार संरक्षण का अधिकार प्राप्त हो जिसमें मानव के साथ-साथ सम्पूर्ण जैव-जगत की स्थिति सामान्य बनी रहे।
मनुष्य के लिए मानवाधिकार संरक्षण कोई नई अवधारणा नहीं है बल्कि इसकी जड़ें अतीत की गहराइयों मंे छिपी हुई हैं। भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों परम्पराओं में मानवाधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। आज जबकि सम्पूर्ण मानवजाति शोषण, भ्रष्टाचार, उत्पीड़न एवं आतंकवाद जैसे दुष्कृत्यों से प्रभावित है ऐसे अराजकतापूर्ण वातावरण में विश्व के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती बन जाती है कि मानवाधिकारों को कैसे सुरक्षित एवं संरक्षित किया जाए?
भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा उद्देशिका ;च्तमंउइसमद्ध में एक ऐसे समाज की परिकल्पना की गयी थी जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की समता पर आधारित हो, किन्तु आज जब हम भारतीय सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में मानवाधिकारों की चर्चा करते हैं तो यहाँ की समाज व्यवस्था से सम्बद्ध लिंग तथा जातिगत भेद-भाव, छुआछूत तथा अस्पृश्यता की भावना साकार हो जाती है। इसके बावजूद पिछले कई दशकों से वर्तमान विश्व में ‘मानवाधिकार’ शब्द चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। एक विशेष नजरिये से देखा जाए तो पश्चिमी राष्ट्र-राज्यों के विकास के बाद ही यह अवधारणा आयी और व्यापक पैमानें पर सर्वत्र मानवाधिकारों की मांग बढ़ी। इंग्लैण्ड के 1215 के ‘मैग्नाकार्टा’, अमेरिका के ‘बिल आॅफ राइट्स’ और फ्रांस की ‘मानवाधिकार घोषणापत्र’ में इस संकल्पना के बीच गुंथे-बिंधे थे।2 ऐसा नहीं है कि मानवाधिकार का भारतीय  पुरा समाज में कोई मतलब नहीं था किन्तु इसकी विधिवत शुरुआत अक्टूबर 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना के साथ हुई।3
मानवाधिकारों को कभी-कभी मूल अधिकार, अंतर्निहित या जन्मजात अधिकार या नैसर्गिक अधिकार भी कहा जाता है यानि कि मानव को प्रकृति द्वारा ही कुछ अधिकार प्राप्त हैं जिनको मानवाधिकार कहा जाता है। प्रत्येक नागरिक को इन्हें सुनिश्चित करना सम्बन्धित देश की सरकार का दायित्व है। मानवाधिकार इस सार्वभौमिक तथ्य की मानव प्रकृति की नायाब कृति है, को सच कहते हुए प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण सम्मानजनक जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है। विश्व की सभी सभ्यताओं, संस्कृतियों, जीवन-मूल्यों और आदर्र्शों का आधार भी है। आज का मानव जरूर अपने इन आदर्शों से दिग्भ्रमित हुआ है तथा कष्ट इस बात का है कि उसे अपने इस भुलावे का जरा भी अहसास नहीं है। इसी की परिणति है कि मानवाधिकारों के उल्लंघन की स्थिति विश्व में सर्वत्र भयावह होती जा रही है। तीव्र आर्थिक विकास की चाहत में आज का मानव जिस तरह से भौतिक संपदा पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानकर प्रकृति का विनाश करता जा रहा है, क्या यह मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है? जिसका सर्वाधिक प्रभाव निकट भविष्य मंे निर्धन, असहाय व सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछडे़े देशों व उनके निवासियों पर पड़ने की आशंका है।4 फरवरी 2007 को जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित अन्तर्राष्ट्रीय पैनल आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में एक ऐसी ही भयावह तस्वीर पेश की है जिसके अनुसार यदि निकट भविष्य में पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं किया गया तो करोड़ों लोग गरीबी, भुखमरी व कुपोषण के कारण काल के गाल में समानें के लिए बाध्य होते चले जायेंगे। इसीलिए मानव ही मानव का भक्षक न बने पर्यावरण प्रबंधन की अवधारणा वैश्विक रूप लेती जा रही है।  
पर्यावरण के विषय में भी मानवाधिकारों के विषय की ही तरह अन्तर्राष्ट्रीय जगत की चिंता द्वितीय महायुद्ध के बाद ही देखने को मिलती है। महायुद्ध के विध्वंस ने इस बात को रेखांकित किया था कि आधुनिक हथियार पर्यावरण के लिए कितने खतरनाक साबित हो सकते हैं। बमबारी ने बड़े-बड़े ऐतिहासिक नगरों को तबाह कर दिया था और हरे-भरे खेत बंजर कब्रिस्तानों में बदल गये थे। एटम बम के प्रयोग ने पर्यावरण के लिए एक नई चुनौती पैदा कर दी थी। हिरोशिमा और नागासाकी के अनुभव से यह बात सामने आ चुकी थी कि एक बार एटमी हथियार का प्रयोग करने पर भी वर्षों तक वातावरण प्रदूषित रहता है और रेडियोधर्मी धूल को बादल में दूर-दूर तक फैलाते हैं। एटमी हथियारों का प्रयोग भले ही दोबारा कभी नहीं हुआ, पर दोनों महाशक्तियों के बीच वर्षों चलने वाली प्रतिस्पद्र्धा में सैकड़ों परमाणविक हथियारों के परीक्षण हुए। दक्षिण-पश्चिमी प्रशान्त महासागर में अमेरिकी तथा फ्रांसीसी परमाणविक परीक्षणों से पैदा होने वाले प्रदूषण का असर जापानियों तथा मछुआरों पर पड़ा। परमाणु वैज्ञानिकों की यह चेतावनी भी कम चैकाने वाली न थी कि रेडियो विकिरण के कुप्रभाव से सिर्फ सीधे प्रभावित लोग ही रोगग्रस्त नहीं होते बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए भी कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही पहले वायुमंडल में, फिर अन्तरिक्ष तथा सागर तल में ऐसे परीक्षणों पर रोक लगाने वाली संधियां संभव हुई।
अनेक वैज्ञानिकों ने जिम्मेदार नागरिकों का ध्यान इस ओर भी आकर्षित किया कि सिर्फ युद्ध काल में ही नहीं, शांति के युग में भी पर्यावरण जोखिम में पड़ सकता है। पश्चिमी यूरोप के देशों में 1960 के दशक के अंत तक यह बात स्वीकार कर ली थी कि उनके यहाँ औद्योगीकरण और शहरीकरण का तेजी से फैलना पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए दुष्प्रभावकारक साबित हो रहा था। जर्मनी में धुँआ उगलने वाली फैक्टरियों से जो बादल उठते उनसे जीवनदायिनी रस की धार नहीं बरसती थी बल्कि एसिड्रीन खेतों को बंजर करने के लिए धरती पर उतरती थी।
पर्यावरण से हमारा तात्पर्य हमारे चारों ओर के वातावरण से है जिसमें हमारी सारी प्राकृतिक सम्पदायें शामिल हैं। जिनकी खास गुणवत्ता प्राणी जीवन तथा देश की अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को प्रमाणित करती है। किन्तु मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सदैव हितकारी पर्यावरण का शोषण करता रहा है जिसके कारण अनेकों अनिष्टकारी समस्यायें उसका पीछा करती रही हैं। आज सम्पूर्ण मानव समाज तथा उसके सहयोगी जीव-जन्तुओं, पेड़-पौधों, वायुमंडलीय सूक्ष्म जीवों, खाद्यान्नों, फल-सब्जियों तथा इस तरह के दूसरे अन्य क्षेत्रों में जिस तरह का पर्यावरण संकट विद्यमान है, क्या उससे सम्पूर्ण मानव जाति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार सुनिश्चित हो पा रहा है?5 ”मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है किन्तु वह सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है“ दार्शनिक रुसो का यह कथन द्योतित करता है कि आज भी मनुष्य किसी न किसी रूप में अनेकों परेशानियों से घिरा हुआ है। जिनमें बढ़ता पर्यावरण संकट इस आसन्न संकट का एक बहुत बड़ा कारण बनता जा रहा है। जिसके लिए आज का प्रौद्योगिक मानव स्वयं जिम्मेदार है जिसने अपने निजी लाभ के लिए सम्पूर्ण प्रकृति का अनैतिक तरीके से विदोहन किया है। 1970 के दशक के आरंभ तक यह बात जगजाहिर हो चुकी थी कि किसी संक्रामक महामारी की तरह ही पर्यावरण के प्रदूषण का संकट भी ऐसा है जिससे व्यक्ति अपने घर में बैठा भी निरापद नहीं रहता। मारग्रेट तथा हैराल्ड स्प्राउट दंपत्तियों ने अपनी पुस्तक ‘स्पेशशिप अर्थ’ में यही रूपक बाँधा था कि जिस तरह एक छोटे से अन्तरिक्ष यान में सफर कर रहे सभी यात्री, यान के वायुमंडल को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं और सहकार के लिए बाध्य, क्योंकि इसके अभाव में कोई अकेला जिंदा नहीं रह सकता, कुछ वैसी ही स्थिति इस पृथ्वी के बाशिंदो की भी है।
इन्हीं वर्षों में कई भीमकाय तेल वाहक टैंकर दुर्घटनाग्रस्त हुए और उनसे रिसने वाले तेल ने समुद्र के पानी के साथ बह हजारों मील दूर तट को प्रदूषित किया। इसके साथ एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ कि इस तरह की दुर्घटना से उत्पन्न हुए प्रदूषण के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाय और कैसे मुआवजा देने के लिए बाध्य या दंडित किया जाय? विडंबना यह थी कि भले ही दुर्घटना किसी भी राष्ट्र-राज्य के क्षेत्र से बाहर घटी हो, प्रभावित राज्य राहत और न्याय के लिए व्याकुल रहता था।
1972 में स्वीडेन की राजधानी स्टाकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में पहले अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण रही और उनका उस वक्त दिया गया भाषण आज भी यादगार समझा जाता है। श्रीमती गांधी ने जहाँ एक ओर पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देना बेहिचक स्वीकार किया, वहीं उन्होंने इस बात को भी जोरदार ढंग से सामने रखा कि इस मुद्दे का समाधान विकास की समस्या के साथ जोड़कर ही ढूंढा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि पर्यावरण के लिए जो संकट वर्तमान में उत्पन्न हुआ है उसके लिए कुछ औपनिवेशिक शक्तियां कम जिम्मेदार नहीं। तेल हो या खनिज, अपनी जरूरत के लिए इन संसाधनों का दोहन करते वक्त प्रकृति के स्वास्थ्य की कोई चिन्ता सम्पन्न पश्चिमी देशों ने कभी नहीं की थी। पूंजीवादी जीवन शैली में फिजूलखर्ची, स्वार्थी, उपभोक्तावादी मानसिकता प्रबल थी जबकि भारत जैसे विपन्न देशों में गांधीवादी सोच के प्रति गहरा आकर्षण था, जहाँ यह बात सहज स्वीकार की जाती थी प्रकृति का भंडार हरेक मनुष्य की जरूरत को पूरा करने के लिए तो भरा-पूरा है, पर किसी समुदाय या राष्ट्र विशेष के लालच की तृप्ति में असमर्थ ही सिद्ध होता है।
पिछले कई दशकों से तीव्र औद्योगीकरण तथा मानव की उपभोक्तावादी नीतियों के चलते वातावरण में कार्बन-डाई-आॅक्साइड ;ब्व्2द्ध जैसी कई अन्य ग्रीन हाउस गैसें पृथ्वी के तापमान को तीव्र गति से बढ़ाती जा रही है जिसके कारण विश्व में प्रत्येक जगह कई भीषण पर्यावरणीय आपदायें अपना तांडवी रूप दिखा रही हैं। जिससे न केवल मनुष्य परेशान है बल्कि इसका असर सम्पूर्ण जैव-विविधता तथा विकास प्रतिरूपों पर पड़ा है। प्रकृति की कई संवेदनशील प्रजातियाँ तो विलुप्त होने के कगार पर आ चुकी हैं। भारत में पिछले दशक की तुलना में 0.4 से 0.6 डिग्री सेल्सियस तापमान की रिकार्ड बढ़ोत्तरी हुई है। जिसके कारण जलवायु में भी तेजी से परिवर्तन हो रहा है जो अप्रत्याशित है। राजस्थान और महाराष्ट्र में बाढ़ आना, असम में सूखा पड़ना, सुनामी लहरों का आना बढ़ते पारे और बदलती जलवायु का ही परिणाम है। इसके अलावा पर्यावरण में मानवीय हस्तक्षेप से महानगरों में एयरोसोल का बढ़ना एक चेतावनी है। पृथ्वी पर रहने वाला हर संवेदनशील व्यक्ति आज वैश्विक तापमान के बढ़ते सिलसले को महसूस कर रहा है। हमारी पृथ्वी लगभग 4.5 अरब वर्ष पुरानी है। पृथ्वी पर मौजूद जीवाणुओं ने करोड़ों वर्र्षों तक कार्बन-डाई-आॅक्साइड सोखकर और आॅक्सीजन छोड़कर जीवों के साॅस लेने योग्य उपयुक्त स्थितियों का सृजन किया है। इसी क्रिया से पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ है, लेकिन अब हम उस दौर में पहुँच रहे हैं जहाँ जीवन के लिए महत्वपूर्ण यह क्रियायें असंतुलित होती जा रही है।6 स्थानिक, कालिक और वैश्विक भौगोलिक सीमाओं को चीरकर जीवन को चुनौती दे रही यह पर्यावरणीय समस्या आज के समय में समूची मानवता के समक्ष खतरे के रूप में मौजूद है।7
वैश्विक तापमान बढ़ने से न केवल ग्लेशियर पिघल रहे हैं बल्कि उसके कारण समुद्री जलस्तर भी बढ़ रहा है। जिसके चलते आने वाले समय में समुद्र के तटवर्ती द्वीप डूबने के कगार पर हो जायेेंगे। नदियों में पानी तेजी से बढ़ने से बाढ़ की समस्या और नदियों के तटबन्ध टूटने की समस्या विकराल रूप ले सकती है। दूसरी तरफ पहाड़ों की बर्फ पिघल जाने के कारण भविष्य में नदियों में जल की आपूर्ति घटेगी जिसका प्रभाव पुनः हमारे जीवन पर ही पड़ेगा। क्योंकि नदियों से प्राप्त होने वाला जल जो कृषि के लिए प्रयोग में लाया जाता हैे वह सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हो पायेगा। यह याद रखना होगा कि विश्व की कई महान नदियों में पानी का स्रोत पर्वतों के ग्लेशियर ही हैं।8 पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार इस समय दुनिया का तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड है और वर्ष 2010 तक इसमें 1.5 से 6.0 डिग्री तक की वृद्धि हो सकती है। इसका प्रभाव हमारी कृषि पर भी पड़ेगा तथा खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता। उदाहरण के लिए गेहूँ जो हमारी मुख्य फसल है, के लिए आवश्यक ठंड का मौसम नहीं हो पायेगा वहीं जल्दी गर्मी आने के कारण गेहूँ के पकने की रफ्तार भी बढ़ सकती है। जिससे गेहूँ में पौष्टिकता हेतु आवश्यक तत्वों का समावेश नहीं हो सकेगा।9 खाद्यान्न सुरक्षा का अति संवेदनशील मुद्दा पर्यावरण के नाजुक संतुलन के साथ अखिल रूप से जुड़ा है। कहीं यह संकट जलाभाव के कारण उत्पन्न होता है तो कहीं जल बाहुल्य (बाढ़) के कारण। इसी तरह ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा संकट भी अभी तक अभिन्न रूप से पर्यावरण केन्द्रित बहस ही गरमाते हैं। कोयला और पेट्रोल डीजल जैसे हाइड्रोकार्बन जनित ईंधन के उपयोग से वायुमंडल में व्याप्त होने वाली कार्बन गैसों के कारण, धरती के फटने व मौसम बदलने की समस्या का उल्लेख पहले किया जा चुका है। इनके विकल्प के रूप में जिन ऊर्जा संसाधनों का चर्चा होता है उनसे भी पर्यावरण को निरापद नहीं रखा जा सकता। मिसाल के तौर पर जल-विद्युत ऊर्जा उत्पादन के लिए बड़े-बड़े बांधों का निर्माण जरूरी है। इस गम में डूबे प्रभावित क्षेत्र का नैसर्गिक प्राकृतिक संतुलन नष्ट होने के साथ-साथ बहुत बड़ी संख्या में विस्थापित शरणार्थी भी एक विस्फोटक राजनैतिक संकट उत्पन्न करते हैं। यह बात नर्मदा सरोवर से लेकर टिहरी तक बार-बार उजागर हो चुकी है।
1984 में घटी भोपाल गैस त्रासदी जिसकी कोई मिसाल मानव इतिहास में नहीं। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय उद्यम यूनियन कार्बाइड कंपनी की एक फैक्टरी से मिथाइल आइसोसायनाइट ;डप्ब्द्ध जैसी जहरीली गैस के रिसाव के कारण हजारों निर्दोश लोगों ने दम तोड़ दिया और बचे रहे हजारों प्रभावित लोगों के लिए भी यह संकट पैदा हो गया कि वे अब कभी भी निरोग नहीं रह सकेंगे। हिरोशिमा तथा नागाशाकी के नागरिकों की तरह ही उनकी संतानें भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रदूषण से पैदा होने वाले रोगों से अभिशप्त रहेंगी। इस औद्योगिक दुर्घटना ने एक बार फिर गैर जिम्मेदार मुनाफाखोरी और प्रदूषण के कारण होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदारी ठहराने का सवाल उठा दिया।
वैश्विक उष्णता के कारण जलस्रोत सूखते जा रहे हैं ऐसी स्थिति में जिन राज्यों के पास पानी नहीं होगा वे अपने निकटवर्ती राज्यों पर आक्रमण करने को बाध्य होंगे। जलस्तर में कमी, शुद्ध पेयजल की अनुपलब्धता, जीवन और प्रकृति के लिए आवश्यक जल की कमी, बढ़ते रेगिस्तान, सूखा, कृषि पर नकारात्मक प्रभाव इत्यादि अपने साथ कई जटिल सामाजिक समस्यायें लेकर आयेंगी जो नित नये संघर्र्षों को जन्म देंगी। आईपीसीसी के अनुसार पर्यावरणीय समस्या के कारण उत्पन्न सूखे की स्थिति के कारण सम्पूर्ण विश्व में लगभग 3 अरब 20 करोड़ लोगों के समक्ष सन् 2080 ई0 तक पेयजल की समस्या उत्पन्न हो सकती है एवं फसल चक्र अनियमित होने के कारण लगभग 60 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हो सकते हैं।10 भारत का जल संसाधन तो बड़े पैमाने पर प्रकृति एवं जलवायु संतुलन से नियमित रहता है, जिसमें आंशिक बदलाव मात्र से ही जल की कमी उत्पन्न हो जाती है। भारत में ही 1950 के दशक में 5 लाख तालाब थे जिससे 36 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती थी। इन तालाबों का प्रमुख कार्य वर्षा जल का संचयन और भू-जल के स्तर में वृद्धि तो था ही, सिंचाई जीव-जंतुओं का संरक्षण और बाढ़ से बचाव में भी ये बड़ी भूमिका निभाते थे। अब इनकी जगह कस्बों, खेल के मैदानों, गगनचुम्बी इमारतों और नये-नये भवनों ने ले ली है। जल संकट की यह स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि यह समस्या अपनी प्रकृति में ही वैश्विक है क्योंकि विश्व की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के सापेक्ष जल संसाधनों में बढ़ोत्तरी नहीं हो पा रही है। खासकर तीसरी दुनिया के देशों में जनघनत्व के लिहाज से जल-संसाधन अत्यन्त सीमित है। इन देशों के गाँवों में आज भी महिलाओं को पानी लाने के लिए कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, किसानों को जल की कमी से सूखे की मार झेलनी पड़ती है। स्वच्छ और साफ जल न मिल पाने के कारण बच्चे पैदा होते ही निर्जलीकरण का शिकार होकर दम तोड़ देते हैं। आज हमारे द्वारा प्रयुक्त किये जा रहे पेयजल में प्राकृतिक प्रदूषण जैसे- फ्लोराइड, आर्सेनिक व कीटनाशकों की दर काफी ऊंची है और यह लगातार बढ़ती ही जा रही है। 1999 में केन्द्र सरकार द्वारा कराये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 7 करोड़ भारतीय प्रदूषित जल पी रहे हैं जिसमें फ्लोराइड, आयरन, नाइट्रेट, आर्सेनिक तथा खारेपन की मात्रा अधिक है। हालाँकि सरकार ने भू-जल स्तर बढ़ाने का प्रयास किया है लेकिन आम जनता को भी आने वाले कल के प्रति जागरुक होने की आवश्यकता है। आज की भौतिकतावादी लिबास में आम जनता जल के संचयन और संरक्षण से कोई वास्ता नहीं रखती, इसलिए खतरों से अंजान ऐसे व्यक्तियों को अपना तथा भावी संतति के प्रति कत्र्तव्य बोध नहीं हो पा रहा है। अपनी गतिशील प्रकृति के कारण पानी एक साझी सम्पत्ति है इसलिए भू-जल को पुनः आवेशित करने की कृत्रिम विधियों को भी प्रोत्साहित करने की प्राथमिक आवश्यकता है जिससे पानी को एक बड़े व्यवसाय के रूप में परिणित होने से रोका जा सके।11
पर्यावरण प्रबंधन जो आज हमारे सामने एक ज्वलंत समस्या बन गयी है। यह सम्पूर्ण विश्व के लिए एक समान रूप से खतरनाक होती जा रही है। अमेरिका जैसे विकसित उपभोक्तावादी देश इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है जबकि इसका असर सबसे ज्यादा विकासशील व पिछड़े राष्ट्रों पर पड़ने की आशंका है। ऐसा नहीं है कि इन पर्यावरणीय समस्याओं के निदान हेतु कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे है। बल्कि पर्यावरण संरक्षण के उपायों पर विकसित एवं विकासशील देशों के मध्य कोई अंतिम सहमति नहीं बन पा रही है। जिसका सबसे बड़ा कारण कीमत पर आकर रुकती है क्योंकि कोई भी देश अपनी अर्थव्यवस्था में से कोई भी राशि पर्यावरण एवं संरक्षण प्रयासों के नाम नहीं खर्च करना चाहता। दूसरी ओर विकसित देशों को आशंका है कि कहीं इसका प्रभाव उनके ऐशो-आराम पर न पड़े।12 इसलिए जरुरत है कि हम सभी इस बारे में कुछ ठोस कदम उठायें, कुछ सार्थक व सकारात्मक करें जो कि पर्यावरण के संरक्षण, पोषण व संवर्द्धन में सहायक हों ताकि लोगों के मानवाधिकार सुरक्षित रहंे तथा अपनी भावी पीढि़यों को विरासत में एक साफ,स्वच्छ व स्वास्थ्यवर्द्धक पर्यावरणयुक्त जीने का अधिकार दें। क्योंकि बढ़ता पर्यावरण संकट एक ऐसी समस्या है जो सब पर प्रभाव डालेगी, कोई भी देश या व्यक्ति इसके दुष्प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकता।
भारत में आजादी के बाद जिस बदलाव की उम्मीद थी उसकी दिशा उल्टी तरफ चल पड़ी। इससे बदलाव तो आया पर इस बदलाव का सबसे बुरा असर आधुनिक विकास की दौड़ में हाॅफते जा रहे समाज पर पड़ा। यह समाज वह किसान वर्ग है जो यांत्रिक कृषि से दूर है तथा रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत चीजें जुटाने के लिए अपने दिन का एक बड़ा भाग खपा देने को मजबूर है। फ्रेडरिक एंगिल्स के अनुसार ”प्रकृति पर अपनी विजय के कारण हमें आत्म प्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि वह हर ऐसी विषय का हमसे प्रतिरोध लेती है। यह सही है कि प्रत्येक विषय से प्रथमतः वही परिणाम प्राप्त हो सकते हैं जिनका हमने भरोसा किया था पर द्वितीयतः तथा तृतीयतः उससे बिल्कुल ही भिन्न तथा अप्रत्याशित परिणाम होते हैं जिनसे पहले का असर जाता रहता है।“13 इस चेतावनी के बावजूद आज यह प्रभाव इतने व्यापक हैं कि जैवमंडल समाज की सहायता के बगैर मनुष्य विनाशक प्रभाव से नहीं निपट सकता। इसलिए अब प्रकृति के साथ मानव जाति की अन्तरक्रिया के तरीके को बदलना अनिवार्य हो गया है।14
पर्यावरणीय प्रदूषण का प्रभाव राष्ट्रीय सीमाओं से मुक्त होता है। मानव समाज का वायु, जल और भूमि पर प्राकृतिक अधिकार है। यह अधिकार विश्वव्यापी होता जा रहा है, क्योंकि वैश्वीकरण के युग में जिस तरह पूरी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ में परिवर्तित होती जा रही है, उसमें इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्व में घटी किसी घटना का दूसरे मुल्कों में असर नहीं पडे़गा। आज समूचा विश्व परमाणु बम बनाकर भले ही गर्व कर रहा हो परन्तु वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार वायुमंडल में तकरीबन 4.08 अरब टन ओजोन गैस विद्यमान है जो हमारे लिए ‘रक्षा कवच’ का काम करती है। वह मात्र 1000 मेगावाट की शक्ति वाले परमाणु बमों के विस्फोट से नष्ट हो सकती है। पर्यावरण अवनयन की ये परिस्थितियाँ मानव को जीने का अधिकार प्राप्त करने को सचेष्ट करती है। इसलिए मानव अधिकार की सीमा में पर्यावरणीय प्रबंधन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। मानव विकास का इतिहास प्रकृति के नियंत्रण और दोहन तथा मानव जाति के प्रगति का पर्याय है तो अविवेकपूर्ण दोहन विनाश का कारण बन सकता है। इसलिए भारतीय न्यायपालिका भी इस अवधारणा से अछूती न रह सकी और उसने स्वच्छ प्रदूषण रहित पर्यावरण को अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों की सूची से सम्बद्ध कर दिया।15
मानवाधिकार एवं पर्यावरण प्रबंधन पर एक साथ विचार करने का यह तथ्य स्पष्ट होता है कि मानवाधिकार का केन्द्र बिन्दु मनुष्य है तथा जीवन उसका मूलभूत अधिकार है जो पर्यावरणीय दशाओं और तत्वों के पारिस्थितिकीय प्रबंधन पर आधारित है। पारिस्थितिकीय संतुलन सभी जीवधारियों की उत्तरजीवियों के लिए अनिवार्य है। अतः जीवन का अधिकार पर्यावरण के संतुलन के अधिकार का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि एक संतुलित एवं प्रफुल्लित पर्यावरण से ही विकास के प्रयास जारी रह सकते हैं और मानव जीवन उच्चस्तर तक पहुँच सकता है। ‘ग्रीन इंडिया, 2045’ के अध्ययनों से पता चलता है कि पर्यावरण प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के विनाश से सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का 15 प्रतिशत से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। अतः पर्यावरण प्रबंधन कोई फैशन नहीं बल्कि एक अनिवार्यता है। यह समझना आज के मानव के लिए बहुत ही आवश्यक है ताकि लोगों को स्वच्छ, पर्यावरणयुक्त जीवन का अधिकार मिल सके। तभी सही अर्र्थों में मानवाधिकार सुरक्षित रखा जा सकता है। पर्यावरण प्रबंधन के माध्यम से मानव को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का ढंग बदलना होगा और जीवन को प्रमुख मानते हुए पर्यावरणीय तथ्यों के संरक्षण और विकास के लिए सरकारों के साथ-साथ स्वयं भी जिम्मेदार बनना होगा। क्योंकि मानवाधिकार में जहाँ मानव अपने मूलभूत अधिकारों के लिए सरकार एवं प्रशासन तंत्र को जिम्मेदार मानता है वहीं पर्यावरण प्रबंधन में स्वयं भी उतना ही जिम्मेदार बन जाता है। इसलिए आज आवश्यकता एक ऐसे पर्यावरण प्रबंधन की है जिससे व्यक्तियों के मानवाधिकार भी सुरक्षित रहें।
संदर्भ सूची
1. धर, प्रांजल, ‘मानवाधिकार और वर्तमान भविष्य’, कुरुक्षेत्र, दिसम्बर ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली,2006 पृ. 4
2. सिंहल, एस.सी. ‘समकालीन राजनीतिक मुद्दे’, लक्ष्मी अग्रवाल प्रका, आगरा-3,2001 पृ. 96
3. फडि़या, बी.एल.,‘अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति’ 1998, साहित्य भवन पब्लिेकशन, आगरा
4. सिंह, अनीता व यादव, चंदेश्वर, ‘मानवाधिकार:मानवीय संवेदना का द्योतक’, कुरुक्षेत्र, दिसम्बर 2006, पृ. 11
5- Sheth, Pravin, Environmentalism-Politics, Ecology and Development 1997, Rawat Publication, New Delhi, p. 161-162
6. दैनिक जागरण (वाराणसी), फरवरी 2008, ‘ग्लोबल वार्र्मिंग’, पृ. 14-15
7. धर, प्रांजल, ‘पर्यावरण एक साझी समस्या है’, योजना, जून 2007, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय,दिल्ली, पृ. 39
8. ।दनंस त्मचवतज 2004.05 डपदपेजतल व िम्दअपतवदउमदज-थ्वतमेजेए छमू क्मसीपए चह 132.134
9. दैनिक जागरण (वाराणसी), फरवरी 2008, ‘ग्लोबल वार्र्मिंग’, पृ. 14-15
10. दृष्टिकोण मंथन, नई दिल्ली, 16-28 फरवरी 2007, पृ. 17
11. उपाध्याय आशुतोष, ‘गुस्से में मौसम’ ,दैनिकहिन्दुस्तान(वाराणसी),मई 10, 2006
12. श्रीवास्तव, मयंक, ‘प्यासी धरती-प्यासे लोग’, कुरुक्षेत्र, जून 2007, अंक-8, नई दिल्ली, पृ. 12
13. डा. बेचन, डाॅ. ममता, परिस्थितिकी विकास के मूल तत्वः मिश्रा टेªडिंग कार्पोरेशन, वाराणसी
14. मानवाधिकार: नई दिशाएं, 2006, अंक-3, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली, पृ. 59
15. डाॅ. अनिरुद्ध प्रसाद, ‘पर्यावरण एवं पर्यावरणीय विधि की रूपरेखा’ 2001, सेंट्रल लाॅ पब्,ि इलाहाबाद, पृ. 467

‘‘पर्यावरण संरक्षण का संवैधानिक एवं कानूनी पक्ष’’


डाॅ0 इन्द्रमणि
प्रवक्ता, राजनीति विज्ञान,
अकबरपुर महाविद्यालय, कानपुर देहात।


आज समाज का प्रत्येक वर्ग विकास की बात करता है, परन्तु प्रायः वह खोखले विकास के संदर्भ में ही गम्भीर है। आज विकास का परिचायक है- फ्रिज, ए0सी0, कार, टी0वी0, एल0सी0डी0, कम्प्यूटर, इण्टरनेट, मोबाइल इत्यादि। क्या विलासी जीवन यापन को सुसज्जित करने वाले इन संसाधनों का उपभोग करते समय अन्य साधन हीन व्यक्तियों के संदर्भ में नहीं सोचना चाहिये। यदि व्यक्ति सर्वोदयी दृष्टि रखे एवं समाज के सभी वर्ग का ख्याल रखे तो आज जो संकट दुनिया के सामने गहराता जा रहा है, वह न हो। भौतिकवादी, विज्ञान-प्रधान एवं भाग्यवादी भावनाओं वाले तथाकथित विकास की कीमत पर पर्यावरण को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। मानव का अन्तिम लक्ष्य स्थायी एवं सर्वोदयी विकास होना चाहिये, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन जी सके। किन्तु वास्तविकता यह है कि जिस पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है उसकी तुलना में पर्यावरण संरक्षण का कार्य नगण्य है।
1972 से प्रत्येक वर्ष पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण के लिये सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है- ‘‘आपके ग्रह (पृथ्वी) की आपको जरूरत है, जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये एक हो’’1 जलवायु परिवर्तन के अनेकानेक दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं। यदि इन पर आम जनमानस गम्भीर एवं जागरूक नहीं हुआ तो धरा की धड़कन बहुत तेज हो जायेगी और अपने अस्तित्व को मिटाकर आग के गोले में तब्दील हो जायेगी। भविष्य में बहुत भयावह स्थिति आने वाली है जिसे निम्नलिखित आंकड़ों में देख सकते हैं2-
1. हर वर्ष 32.5 करोड़ लोग जलवायु परिवर्तन के कहर से आने वाली बाढ़, सूखा और बीमारियों से गम्भीर रूप से प्रभावित होते हैं।
2. अगर इसी गति से कोयले का प्रयोग जारी रहा तो अगले सवा सौ सालों में इसका भण्डार समाप्त हो सकता है।
3. 2025 तक विकासशील देशों में पानी की मांग में 50 फीसदी जबकि विकसित देशों में 18 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो जायेगी।
4. पिछले 25 साल में दुनिया की आबादी में करीब एक तिहाई बढ़तोत्तरी हुयी है अगर यही हाल रहा तो खड़े होने के लिये जमीन मिलनी मुश्किल हो जायेगी।
5. दुनिया में कुल खर्च की जाने वाली ऊर्जा का 11 फीसदी हिस्सा केवल घर को गर्म ठण्डा व प्रकाशमय करने के साथ- साथ घरेलू उपकरणों के प्रयोग में खर्च होता है।
6. तेजी से पिघलती बर्फ और ग्लेशियरों से समुद्रों का जल स्तर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर इसी तरह समुद्र का जल स्तर बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समुद्र से सटे शहरों और देशों के नामों निशां मिट जायेंगे। बांग्लादेश, न्यूयार्क सिटी का मैनहट्टन और नीदरलैण्ड पूरी तरह तबाह हो सकते हैं। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई के साथ-साथ कोलकाता और मद्रास जैसे शहरों पर भी खतरे मंडरा रहें हैं।
7. एक अनुमान के मुताबिक डायनासोर की भांति 2050 तक पृथ्वी के 40 फीसदी जीव-जन्तुओं का खात्मा हो जायेगा।
8. वैज्ञानिकों की मानें तो आने वाले सौ सालों में वायुमण्डल में कार्बनडाई आक्साइड की मात्रा मौजूदा स्तर की तीन गुना हो जायेगी।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कानून का सहारा लिया जा सकता है। कानून और उसके प्रभावी क्रियान्वयन से पर्यावरण की सेहत सुधारी जा सकती है। जैसा कि दिल्ली में बसों एवं टैक्सियों के सी0एन0जी0 चालित करने का कानून। उल्लेखनीय है कि दिल्ली विश्व का चैथा सर्वाधिक प्रदूषित शहर था3 परन्तु सी0एन0जी0 चालित बसों एवं टैक्सियों के कारण वायु प्रदूषण से होने वाले रोगों में कमी आई। इसी प्रकार पर्यावरण की सुरक्षा के मद्देनजर दिल्ली, हरियाणा सीमा पर खनन और स्टोन क्रशर पर रोक लगाने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी इस क्षेत्र के निवासियों के लिये एक भेंट है।
संविधान में पर्यावरण की सुरक्षा नागरिकों के मूल अधिकारों में शामिल नहीं की गयी है, किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने अन्तरदृष्टि और दूरदर्शिता दिखाते हुये स्थापना दी कि संविधान की धारा 21 में जीवन के अधिकार से आशय है, स्वस्थ और उपयुक्त जीवन, जिसके लिये स्वच्छ पर्यावरण अनिवार्य शर्त है। राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों को भी ध्यान में रखते हुये सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किये हैं यह आदेश निर्देश अनुच्छेद- 47, 48ए और 51ए (जी) में दिये गये प्राविधानों से सम्बन्धित है अनुच्छेद-47 के अनुसार जनता के स्वास्थ्य में सुधार करना और पौष्टिकता एवं जीवन स्तर में वृद्धि करना राष्ट्र-राज्य की जिम्मेदारी है। अनुच्छेद-48ए के तहत राष्ट्र पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार सुनिश्चित करेगा। साथ ही देश के वनों और वन्य जीव-जन्तुओं की सुरक्षा करेगा। अनुच्छेद-51 ए (जी) के अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और इसमें सुधार लाये इनमें वन, झीलें, नदियां और वन्य जीव-जन्तु शामिल है। सामान्य तौर पर अदालतों द्वारा इन प्राविधानों की उदार व्याख्या की गई है और यह ध्यान रखा गया है कि जो भी निर्देश जारी किये जायें वे पर्यावरण के रक्षार्थ हों।4
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा होने वाले विभिन्न सम्मेलनों में पारित सिद्धान्तों एवं नीतियों में तादात्म्य स्थापित करते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ दिशानिर्देश एवं अनुसंशाओं को जारी किया है जिसमें पर्यावरण, टिकाऊ विकास, पानी, बंजर भूमि, जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन, तापमानों में वृद्धि; जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
न्यायिक सक्रियता के पर्यावरण सुधार सम्बन्धी उदार एवं दृढ़ दृष्टिकोण के बावजूद अनेक मामलों में इनका अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इसीलिये भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम0एन0 वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने संविधान में संशोधन करना और उसमें अनुच्छेद-30डी जोड़ने की सिफारिश की। इसके तहत लोगों को ये अधिकार हैं- समाज के हर व्यक्ति को स्वच्छ एवं सुरक्षित पानी मिले, स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिले, भावी पीढ़ी के लिये पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना, पारिस्थितिकी अनुकूल विकास तथा आर्थिक व सामाजिक विकास में प्राकृतिक संसाधनों को क्षति से बचाना। यदि इन सिफारिशों को सरकार व संसद के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता एवं संविधान संशोधन करते हुये पर्यावरण से सम्बन्धित सख्त कानून बनाये जाते, तो निश्चित रूप से पर्यावरण के बचाव और उसमें सुधार के काम में कानून और उनकी सही व्याख्या महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि खराब जीवन यापन, व्यक्तिनिष्ठ जीवन, खराब सामाजिक और सांस्कृतिक लोकाचार, कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति, अक्षम प्रशासन, भ्रष्टाचार, सर्वोदयी भावना का अभाव और सार्वजनिक जीवन में अगतिशीलता से इन प्रयासों पर पानी फिर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में बने कानून एवं न्यायिक सक्रियता के दौरान अदालतों के आदेश-निर्देश हमें वांछित परिणाम नहीं दिला सकते। इसके लिये हमें एक जुट होकर समग्र क्रान्ति करनी होगी। प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा  के शोधपरक अध्ययन पर अमल करते हुये उनके कथनों पर अमल करना चाहिये जैसे कि अब समय सोचने का नहीं बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत ढूढ़ने का है तथा दुनिया बचानी है तो हिमालय को पेड़ों से ढकें।5
गंगा की सफाई एकाकी प्रयासों से सम्भव नहीं है। इस समय करीब 100 शहर गंगा के किनारे बसे हुये है। सुनियोजित विकास और इन शहरों के पुनर्विकास के बिना अपशिष्ट प्रबन्धन, कूड़ा निस्तारण अथवा अवैध निर्माण या अतिक्रमण की समस्या का हल नहीं किया जा सकता
पर्यावरण का मुद्दा पृथ्वी पर मानव जाति के अस्तित्व और उसके समस्त क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है। यह आधुनिक संस्कृति, राजनीति और जीवन पद्धति में गहराई से सन्निहित है। वास्तव में यह समस्या आम जन मानस की है और इसे कानून अथवा तकनीक के बल पर नहीं सुलझाया जा सकता। जरूरत है सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन करने की एवं जागरूक होने की। एक ऐसी नयी व्यवस्था विकसित करने की तरफ सोंचना चाहिये जो सर्वोदयी हो एवं दुनिया के तमाम लोगों के जीवन को नया रूप दे सके। एक सहकारी समाज की आवश्यकता है। व्यक्ति गांव से पलायन करके शहर को संकेन्द्रित कर, प्रदूषण फैला रहा है क्यों न गांव को ही स्वर्ग बनाया जाये एवं शहरी आधारगत् सुविधाओं को मुहैया कराया जाये। खेती आधुनिक यंत्रों एवं रासायनिक खादों के बजाय सामूहिक एवं प्राकृतिक होनी चाहिये। गन्ना गांव में होता है तो गुड़ भी गांव में ही बनना चाहिये, सरसों एवं अरहर गांव में पैदा होती है तो तेल एवं दाल वहीं बननी चाहिये। सन गांव में पैदा होती है तो कपड़ा भी गांव में ही बनना चाहिये। गांव-गांव में हो पंचायत एवं गांव-गांव में विश्वविद्यालय बनें ऐसी सोंच आचार्य विनोबा भावे की थी।6
5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस बार की थीम- ‘‘आपके ग्रह पृथ्वी की आपको जरूरत है, जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये एक हों’’ है। जगह-जगह पर जागरुकता कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं। सरकारी, गैर-सरकारी, सामाजिक, शैक्षिक संस्थाओं की ओर से सेमिनार आयोजित किये जाते हैं। भाषणबाजी होती है परन्तु पर्यावरण संरक्षण के लिये न तो कोई ठोस रणनीति बनाई जाती है और न ही नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण का जज्बा ही उत्पन्न हो पाता है। यह सही है कि उत्तरोत्तर पर्यावरण प्रदूषण मानव जाति के लिये खतरा है परन्तु इसके लिये आवश्यक है कि वृक्षों का संरक्षण हो, शहरों में हरियाली हो। वृक्षारोपण और हरियाली ही पर्यावरण को संतुलित कर सकती है। सभी को पर्यावरण बचाने के प्रति गम्भीरता से विचार करना चाहिये।
संदर्भ ग्रन्थ-
1. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार-पत्र, कानपुर संस्करण, दिनांक 5 जून, 2009 पृ0-16।
2. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार-पत्र, कानपुर संस्करण, दिनांक 5 जून, 2009 पृ0-16।
3. ग्लोबल ग्रीन, हिन्दी मासिक पत्रिका में डाॅ0 संध्या शास्त्री के लेख ‘‘जहरीली होती हवा’’ से उद्धृत, प्रकाशक इजी ग्लोबल आर्गेनाइजेशन, नोएडा, जून-जुलाई, 2009, पृ0-06
4. भारत का संविधान सेन्ट्रल लाॅ पब्लिकेशन, इलाहाबाद, 2005, पृ0-26
5. ग्लोबल ग्रीन, हिन्दी मासिक पत्रिका में डाॅ0 संध्या शास्त्री के लेख ‘‘जहरीली होती हवा’’ से उद्धृत, प्रकाशक इजी ग्लोबल आर्गेनाइजेशन, नोएडा, जून-जुलाई, 2009, पृ0-26
6. विनोबा, ‘‘ग्राम पंचायत’’, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी। मई, 1997, पृ0-21
मैत्री मासिक पत्रिका प्रकाशन चन्नम्मा हल्लिकोरी, बृह्मविद्या मन्दिर, पवनार, वर्धा महाराष्ट्र।
योग चिकित्सा सन्दर्शिका, कुमार कामाख्या, प्रकाशन, वेद माता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज हरिद्वार।
करेन्ट अफेयर्स रिमाईन्डर 2007, सम्पादक-प्रभात कुमार सिंह प्रकाशक कम्पिटीशन स्पेक्ट्रम, इलाहाबाद।


‘‘आचार्य नरेन्द्र देव और समाजवाद’’


संजय कुमार पाण्डेय
शोध छात्र (राजनीतिशास्त्र),
सतीश चन्द्र काॅलेज, बलिया।


शिक्षा विद्, राजनेता, चिन्तक और समाजवादी आचार्य नरेन्द्र देव के भारत के समाज वादी चिन्तकों में अग्रणी स्थान है। आचार्य नरेन्द्र देव का चिन्तन में ज्ञान, विज्ञान, धरातल, दर्शन आदि का समावेश है। आचार्य नरेन्द्र देव का समाजवाद काल्पनिक समाजवाद अथवा समाज सुधारकों का समाजवाद नहीं था। वे वैज्ञानिक समाजवाद के मनीषी, सिद्धान्तकार और मीमांसक थे। वैज्ञानिक समाजवाद न तो सुधारवाद है और न काल्पनिक समाजवाद। इसे तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है। यह समाज की एक ऐसी नवीन आर्थिक व्यवस्था प्रतिष्ठित करना चाहता है जिसमें उत्पादन के साधन तथा उत्पन्न वस्तुओं का वितरण और विनिमय समाज के हाथ में हो।1
काल्पनिक समाजवादी अथवा मौसमी सुधारक समाजवादी हवा के रुख को देखकर समाजवाद की माला जपने लगते हैं। उन्हें अतीत के स्वर्णयुग में समाजवाद परिलक्षित होता है। उनके अनुसार अतीत का समाज ही एक आदर्श समाज था जिसमें गरीब और अमीर का फर्क नहीं था। प्रजा जन सुखी और समृद्ध थे।2 किन्तु सच तो यह है कि अतीत उतना एैश्वर्य सम्पन्न और आकर्षक नहीं था जैसी कि उसकी परिकल्पना है।3
उस समय की पूंजीवादी पद्धति के दोष के अभाव का अर्थ यह नहीं है कि उस पद्धति में ‘निज की बुराईयां’ नहीं थी। फिर, श्रमिक वर्ग को उनके शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए भी किसी संगठन की प्राचीन समाज में आशा नहीं की जा सकती थी।4 ऐसा ही तर्क पश्चिमी देशों में ईसाई समाजवादियों ने दिया। उन्हें ईसाई धर्म और समाजवाद एक-दूसरे के लिए नितान्त आवश्यक प्रतीत हुए और ईसाई धर्म ही समाजवाद की नैतिक पृष्ठभूमि में लगा। वे तो समाजवाद की व्युत्पत्ति धर्म से ही मानते हैं।5 आचार्य नरेन्द्र देव ने इन निराधार एवं कल्पित विचारों को भ्रमात्मक बताया।6
यह सत्य है कि ‘प्राचीन काल में कई स्थानों पर भूमि व्यक्ति की सम्पत्ति न होकर समाज की सम्पत्ति मानी जाती थी। रूस में ग्राम-संस्थाएं 19वीं शताब्दी तक पायी जाती थी। भारत वर्ष के साहित्य में भी ऐसी संस्थाओं की सत्ता का पता चलता है। तथापि हमको इस भूल में नहीं पड़ना चाहिए कि यह प्राचीन ग्राम-संस्थाएं वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धान्त पर आश्रित थी। उत्पादन के जो तरीके उस समय काम में आते थे, उनसे सम्पत्ति इतनी प्रचुरता में नहीं उत्पन्न हो सकती थी कि समाजवाद के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। समाजवाद का उद्देश्य समाज के धन को सबमें बराबर-बराबर बांटना नहीं है। यदि यही उद्देश्य हो, तो अत्यन्त निर्धन देशों में इस बंटवारे का फल यह होता कि अमीर लोग तो गरीब हो जाते, पर गरीबों की गरीबी दूर नहीं होती। वैज्ञानिक समाजवाद गरीबों की गरीबी दूर करना चाहता है न कि कुछ अमीरों से कुढ़कर उनको तबाह करना।7 एतदर्थ, वैज्ञानिक समाजवाद का प्रारंभ मशीन-युग में होता है मशीन-युग तथा उसमें पैदा होने वाला वर्तमान पूंजीवाद ही वैज्ञानिक समाजवाद का जन्मदाता है।8 मशीन के माध्यम से जो औद्योगिक प्रगति हुई उसने यह सिद्ध कर दिया है कि संसार में विपन्नता, भूख और वस्तुओं के अभाव का कारण स्वल्पता नहीं-बल्कि उत्पादन के साधनों पर कुछ मुट्ठीभर पूंजीपतियों की अधिकार-सत्ता का होना है’, और यह उत्पादन समाजहित की अपेक्षा उनकी स्वार्थ-पूर्ति के लिए होता है। इसलिए प्राचीन काल में चाहे भूमि पर समाज का ही एकाधिकार रहा हो किन्तु समाजवाद अकिंचनता को दूर नहीं कर सकता था और न उस समय सम्पत्ति-वृद्धि का ऐसा कोई साधन ही था।9 जब तक विभिन्न वर्गों में आर्थिक वैषम्य प्रतिष्ठित है तब तक सुखद जीवन की कल्पना असम्भव है। ‘उत्पादन की पूंजीवादी प्रक्रिया मानव-श्रम के गौरव को नष्ट कर देती है।10 पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में, श्रमिक उत्पादन साधनों से अलग कर दिया जाता है। श्रमिक के श्रम का भी अन्य व्यापारिक सामग्री के समान ही हाट-मूल्य पर बाजार में विक्रय होता है। श्रमिक द्वारा उत्पादित वस्तु पर उसकी अधिकार-सत्ता नहीं होती। वह नीरस होती है। वह श्रम करने के उपरान्त भी प्रफुल्लित नहीं होता और न ही उसका शारीरिक बौद्धिक विकास हो पाता है।11 पूंजीवादी व्यवस्था में आंतरिक असंगति है। यद्यपि उत्पादन का समाजीकरण हो गया है किन्तु उत्पादन के साधनों पर प्रभुत्व नहीं रहेगा और उन पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व हो जाएगा तब पूंजीवाद में प्रतिष्ठित आन्तरिक विषमता का अन्त हो सकेगा।12
आचार्य नरेन्द्र देव का प्रभाव:
आचार्य नरेन्द्र देव का कथन था कि यदि हम मशीन-युग के दोषों से मुक्ति चाहते हैं तो इसका यह ढंग नहीं है कि हम अतीत की ओर देखें और औद्योगिक प्रगति को विनष्ट कर संसार की निर्धनता तथा उत्पीड़न को और बढ़ा दें। वैज्ञानिक समाजवाद ही इन दोषों की एक मात्र रामबाण औषधि है।13
आज मानव को रोटी, शान्ति और स्वतंत्रता तीनों ही वांछनीय है इनकी उपलब्धि समाजवाद की स्थापना द्वारा ही सम्भव हो सकती है। ‘मानव समाज का उद्धार समाजिक शक्तियों के ऐसे नवीन संगठन द्वारा हो सकता है जो मनुष्य को उन साधनों का मालिक बनाये जो उनको जीवन प्रदान करते हैं।14 जब औद्योगिक व्यवसाय का संगठन समाज-कल्याण के लिए होगा और उत्पादन के सम्पूर्ण साधनों पर व्यक्ति की अपेक्षा समाज का एकाधिकार होगा तो एक सी स्थिति में समाज वस्तुओं का उत्पादन अपनी आवश्यकतानुसार ही करेगा जिससे समाज के प्रत्येक सदस्य को शक्तियों के विकास के अवसर उपलब्ध हो जाए। उत्पादित वस्तुओं के वितरण एवं विनिमय का कार्य जब समाज द्वारा किया जाएगा तो समाज में अकिंचनता और अशान्ति नहीं रहेगी ा15
आचार्य नरेन्द्र देव ने उत्पादन के साधनों को सामाजिक सम्पत्ति बनाए जाने से उत्पन्न दोष पर भी विचार किया। उन्हें भय था कि नौकरशाही की अधिकार-सत्ता इससे बढ़ेगी। यह नहीं बढे़ इसके लिए उपाय करने होंगे। ऐसे नियमों का निर्माण करना होगा जिससे जन-नियंत्रण बने। औद्योगिक व्यवसाय के प्रबन्ध में एकमात्र राज्य के प्रभुत्व से ही आचार्य नरेन्द्र देव सन्तुष्ट नहीं थे अपितु उन्होंने श्रमिक वर्ग को पर्याप्त भागीदार बनाए जाने पर बल दिया। कुछ व्यवसायों का संचालन वे स्वायत्त संस्थाओं द्वारा कराए जाने के पक्षधर थे।
नरेन्द्र देव के लिए ‘मानवता ही समाजवाद का आधार है’। समाजवाद जितना अर्थिक स्वतंत्रता बल देता है उतना ही वह व्यक्तिगत-स्वातंत्र्य के विकास पर भी बल देता है। व्यक्तित्व का पूर्णतः विकास समाजवादी समाज में ही हो सकता है। ‘समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है’।16 एक स्वच्छन्द और सौख्यपूर्ण समाज में सम्पूर्ण स्वतंत्र मानवत्व की प्रतिष्ठा समाजवाद के द्वारा ही हो सकती है। ‘समाजवाद ही श्रेणी-नैतिकता तथा मत्स्य न्याय के बदले जनप्रधान नैतिकता तथा सामाजिक न्याय की स्थापना कर सकता है।17 समाजवाद ही एक सुन्दर, सशक्त मानव-संस्कृति का जिसका आधार स्वच्छन्दता, समानता एवं बन्धुत्व हो, निर्मित कर सकता है। समाजवादी का साध्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो परस्पर विरोधी एवं शोषित आर्थिक वर्ग-विहीन हो और जो सहयोग के आधार पर संगठित मानवों का सच्चा लोकतंत्र बने।18 समाजवाद पूर्ण लोकतंत्र को पुष्ट करता है।19 समाजवाद का लक्ष्य विश्व-स्वतंत्रता है। वह व्यक्तित्व-विकास के मार्ग में अवरोधक सामाजिक बन्धनों से उसे मुक्त करना चाहता है। समाजवाद शोषण-विहीन समाज का निर्माण कर वर्तमान समाज के दासत्व, वैषम्य और असहिष्णुता का सदैव के लिए उन्मूलन कर स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व भावना को वस्तुतः प्रतिष्ठित करना चाहता है।20 आचार्य नरेन्द्र देव की दृष्टि में समाजवाद अन्ततोगत्वा वर्ग-विहीन समाज की स्थापना करना चाहता है। वह अस्तित्वपूर्ण समाज के ढांचे को इस प्रकार निर्मित करना चाहता है जिसमें शोषक एवं शोषित, उत्पीड़क एवं उत्पीडि़त वर्गों का मूलतः अन्त हो जाए और वह सहयोग पर आधारित संगठित मानवों का ऐसा समाज बन जाए जहाँ एक की प्रगति का अर्थ सभी की प्रगति हो और सभी सामूहिक रूप से प्रगति करते हुए अपना जीवन-यापन कर सकें।21 समाजवाद ऐसे शोषण-विहीन और स्वतंत्र समाज की स्थापना करना चाहता है जिसमें मानव अपना इस सामथ्र्यहीन परिधि से ऊपर उठ सके तथा सामाजिक विकास को नियंत्रित कर सके। कार्ल माक्र्स के मतानुसार, ‘समाजवापद मनुष्य को विवशता के क्षेत्र से हटाकर स्वाधीनता के राज्य में ले जाना चाहता है।22
आचार्य नरेन्द्र देव ने यह अंगीकार किया था कि समाजवाद द्वारा प्रत्येक प्रकार की समानता स्थापित नहीं हो सकती। जिनका ऐसा विश्वास है यह उनकी भूल होगी। समाजवाद पूर्ण समानता प्रतिष्ठित किए जाने का दावा नहीं करता। समाजवादी समाज के सदस्यों में बौद्धिक एवं शारीरिक विभेद रहेगा। समाजवादी समाज में कुछ पेशे न्यून हो सकते हैं, जैसे सेनाओं की आवश्यकता नहीं पड़ेगी किन्तु समाज को भलीभांति चलाने के लिए तो श्रम-विभाजन आवश्यक होगा। और फलतः पेशे भी आवश्यक होंगे।
एक समाजवादी वर्गों का उल्लेख उत्पादन सम्बन्धों को दृष्टि से करता है। वर्ग या सामाजिक वर्ग उन व्यक्तियों का समूह है जो सामाजिक उत्पादन में एक प्रकार का कार्य करते हैं और उत्पादन क्रम में लगे हुए दूसरे व्यक्तियों के साथ उनका सम्बन्ध भी एक ही जैसा होता है। यह एक-सा सम्बन्ध स्रम के साधनों के सम्बन्ध में भी लागू है क्योंकि सामाजिक उत्पादन में आर्थिक वस्तुओं के उत्पादन में इनका भाग समान है। ये उत्पादन-साधनों के स्वामी नहीं है और उनका अपने स्वामी के प्रति सामूहिक रूप से एक-सा सम्बन्ध है।
पूंजीपति वर्ग भी विभिन्न औद्योगिक क्रिया-कलापों को सम्पादित करते हुए उत्पादन-क्रम में समान भाग रखते हैं। इन सभी की उत्पादन के साधनों पर अधिकार सत्ता है और श्रमिक के श्रम को खरीदते हैं और अतिरिक्त मूल्य को लेते हैं- उत्पादन-क्रम में रत अन्य समूहों के साथ उनका सम्बन्ध समान है। दोनों वर्ग जिनमें एक का उत्पादन-साधनों पर एकाधिकार है और अन्य जो इस विशेषाधिकार से वंचित है परस्पर विरोधी है। एक स्वामी है तो दूसरा दास है। दोनों के बीच वर्ग-युद्ध है। प्राचीन काल में ये वर्ग स्वामी और दास, मध्यकाल में सामन्त और अर्द्ध-कृषक और आज पूंजीपति तथा श्रमिक। समाज में अन्य वर्ग भी है किन्तु इन वर्गों का स्वार्थ इन मूलभूत वर्गों के स्वार्थ से भिन्न नहीं है। नरेन्द्र देव का कथन है कि समाज के भीतर विभिन्न कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए श्रम-विभाजन मौजूद रहेगा और फलस्वरूप अनेक पेशे भी होंगे। समाजवाद जिस नई सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करता है उसमें आजकल की भांति भीषण आर्थिक विषमताएं न पाई जाएगी।23 किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि समाजवाद आर्थिक एकरूपता स्थापित करना चाहता है। समाजवादी समाज में पूर्ण एक रूपता तथा पूर्ण समाज लाने का वायदा नहीं किया जा सकता।24 समाजवादी यह अवश्य करेगा कि शोषक वर्ग का अन्त करके, असमानता का आर्थिक आधार नष्ट कर देगा और सबको अवसर की समानता प्रदान करेगा।25 समाजवाद का आदर्श हर व्यक्ति से उसकी योग्यतानुसार काम लेकर उसकी आवश्यकतानुसार उपभोग की वस्तुओं का प्रबन्ध करना है।26
माक्र्स ने कहा था कि ‘‘मानव-समाज का उद्धार सामाजिक शक्तियों के ऐसे नवीन संगठन द्वारा हो सकता है जो मनुष्य को उन साधनों का मालिक बनाये जो उनको जीवन प्रदान करते हैं। अतएव समाजवाद व्यक्तिगत सम्पत्ति का उन्मूलन चाहता है क्योंकि यह श्रमिक को अपने श्रम से पृथक करती है और तभी मानव-समाज मानवता के गुणों से संयुक्त किया जा सकता है। सच्ची मानवता की प्राप्ति तभी हो सकती है।
पूंजीवादी राज्य में मानव को राजनीतिक स्वतंत्रता है किन्तु यह स्वतंत्रता पूंजीवादी समाज का सदस्य और राज्य का नगरिक बन जाने की स्वतंत्रता है। आधुनिक राज्य मानव के साधारण अधिकारों को स्वीकार करता है किन्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार नहीं देता। राजनीतिक दृष्टि से राज्य ने शिक्षा और व्यवसाय के विभेद का भी अन्त कर दिया क्योंकि सभी को समान अधिकार दिए। धर्म ने भी उसी का औचित्य सिद्ध किया। राज्य मानव के भौतिक जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह उसके सामाजिक जीवन का ही मुख्यतः प्रतिनिधित्व करता है। जब राज्य मानव के साधारण अधिकारों को स्वीकार करता है तो उसका अभिप्राय केवल पूंजीवाद समाज के व्यक्ति के अस्तित्व, मानव-जीवन के बौद्धिक एवं भौतिक अवयवों की निर्बाध गति की स्वीकृति से है। इस प्रकार राज्य न तो धार्मिक दासता से मुक्ति दिलाता है और न मताधिकार के प्रदान करने में सम्पत्ति, जन्म और व्यवसाय के कृत्रिम अन्तर को ही मिटाता है। इस प्रकार राजनीतिक स्वातंत्र्य मानव-मुक्ति का प्रतीक नहीं है। मनुष्य स्वतंत्रता का उपभोग तभी करेगा जब उसका जीवन अखण्डित हो, उसके जीवन में बौद्धिक एवं भौतिक अवयव पृथक हों वह एक सामाजिक प्राणी के रूप में अपनी नैसर्गिक शक्तियों को सामाजिक शक्तियों में संगठित करे और उन्हें राजनीति-सत्ता के रूप में स्वयं से अपृथक करे।
लेनिन की भांति आचार्य नरेन्द्र देव भी आतंक एवं षड्यंत्र को क्रान्ति का अंग नहीं मानते थे। उन्होंने क्रान्ति के लिए संगठित सशस्त्र संघर्ष को जनतांत्रिक साधनों के अभाव में ही उचित माना और प्रत्येक परिस्थिति में सशस्त्र क्रान्ति करना अमान्य ठहराया। उन्होंने विप्लववाद को लेनिन के समान ही त्याज्य बताया। यह कभी भी सफल नहीं होता तथा लक्ष्य को हानि पहुंचाता है। लेनिन के अनुरूप ही उन्होंने जनतंत्र का मूल्यांकन किया। नरेन्द्र देव की लेनिन के इन कतिपय विचारों की स्वीकृति से हम यह निष्कर्ष निकालें कि माक्र्सवादी होने की अपेक्षा लेनिनवादी अधिक थे, भूल होगी। वस्तुतः नरेन्द्र देव तो जीवन पर्यन्त माक्र्सवाद के निष्ठावान शिष्य बने रहे, उसका विकास करते रहे, उसकी मीमांसा करते रहे और उसका औचित्य सिद्ध करते रहे। जब सर्वोदय अथवा भूदान आन्दोलन की गंगा इस देश में बही और माक्र्सवाद के अनन्यतम शिष्य जयप्रकाश नारायण भी इस ओर मुड़ गये तो नरेन्द्र देव को किंचित मात्र भी अपनी माक्र्सवादी निष्ठा से डिगते नहीं देखा बल्कि सोशलिस्ट पार्टी के क्रिया-कलापों को विशुद्धतः माक्र्सवादी सिद्ध कर उन्होंने आलोचकों के मुँह बन्द कर दिए। वे माक्र्सवादी थे ‘पर उनका माक्र्सवाद रूसी कम्युनिज्म और कट्टरता का सहचर नहीं था। वह हर दर्शन की तरह माक्र्सवादी दर्शन को भी विकासशील मानते थे और उसके विकास में योगदान दिया था। एक तो उन्होने उदात्त राष्ट्रीयता और समाजवाद के समन्वय पर जोर देकर, और उत्तरदायी व्यापक राष्ट्रीयता को समाजवाद का अंग बनाकर माक्र्सवाद की एक बड़ी समस्या का समाधान किया। दूसरे उन्हांेने कृषि क्रान्ति समाजवादी क्रान्ति के योग पर जोर देकर और समाजवादी क्रान्ति के लिए मजदूरों और किसानों के संयुक्त मोर्चों की जरूरत बताकर तथा समता के आधार पर किसानों और मजदूरों के पारस्परिक सम्बन्ध कायम करने का पाठ पढ़ाकर माक्र्सवाद की दूसरी बड़ी समस्या का समाधान किया। उन्होने जनतांत्रिक विकेन्द्रीकरण, औद्योगिक जनतंत्र और अर्द्ध-स्वतंत्र कारपोरेशनों द्वारा समाजीकृत उद्योगों की व्यवस्था के सिद्धान्तों का माक्र्सवाद में प्रवेश कर उसे व्यापक और जनतांत्रिक रूप प्रदान किया और जनतांत्रिक केन्द्रवाद के सर्वसत्तावाद और केन्द्रित नौकरवाद से उसकी रक्षा की। राज्य में जनतांत्रिक भावनाओं को जागृत, सुदृढ़ और व्यापक बताते हुए जनतांत्रिक उपायों से, जिससे सत्याग्रह और हड़ताल भी शामिल है, समाजवादी समाज बनाने पर जदेकर, उन्होने माक्र्सवाद के जनतांत्रिक स्वरूप को निखारा और पुष्ट किया और उसे व्यक्ति-पूजा और दल-अधिनायकत्व द्वारा विकृत किए जाने से बचाया। दीर्घकालीन नैतिक मूल्यों का और सामान्यशील का पालन माक्र्सवादियों के लिए भी जरूरी बताकर मानवता को माक्र्सवाद का आधार स्वीकार कर और माक्र्सवादी समाज के नैतिक मूल्यों का विश्लेषण कर माक्र्सवाद के नैतिक स्वरूप को पुष्ट किया और उसके नैतिक भण्डार को परिपूर्ण किया। समाजवादी संस्कृति के कतिपय मूल तत्वों की व्याख्या कर और उसे समाजवादी समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग बनाकर उन्होने माक्र्सवाद के सांस्कृतिक लक्ष्य की अभिवृद्धि की। उनका कथन था, ‘माक्र्सवाद कोई अटल सिद्धान्त नहीं है। जीवन की गति के साथ वह भी बदलता है। इसकी विशेषता इसका क्रान्तिकारी होना है। माक्र्स की शिक्षा में हेरफेर करना उस समय तक संशोधनवाद नहीं है जब तक आप इस परिवर्तन से उसके क्रान्तिकारी तत्व को सुरक्षित रखते हैं माक्र्सवाद को एक जिन्दा शास्त्र मानने में ही उसका गौरव है। वस्तुतः आचार्य नरेन्द्र देव ने कार्लमाक्र्स के मानवतावादी तत्व और जनवादी तत्वों को पोषित एवं विकसित किया। समाजवादी नेता प्रेम भसीन का विचार है कि ‘आचार्य नरेन्द्र देव के लिए माक्र्सवाद कभी भी एक सिद्धान्त नहीं रहा। उनके लिए वह एकमात्र गति के लिए पथ-निर्देशक रहा और माक्र्सवाद की आत्मा और अनिवार्य वस्तु से निर्देशित होते हुए वे सन् 1950 तक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लोकतांत्रिक समाजवाद माक्र्सवादी विचार का साम्यवाद होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। माक्र्स अनियंत्रित जनतंत्र का महानतम समर्थक था। जनतंत्र के बिना समाजवाद पर विचार करना असम्भव है। उनके लिए माक्र्सवाद एक विज्ञान’ था और यह रोमांसवाद का पूर्णतः विरोधी था। आचार्यजी समाजवाद के नवीनतम संस्कार के अनुयायी हैं जो कि बौद्धिक रूप में कार्लमाक्र्स की पुस्तकों में विराजमान है और व्यवहार रूप में लेनिन की सृष्टि में सम्भवतः दीख पड़ता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि उनका दर्शन मूलतः माक्र्सवादी है और कार्य-प्रणाली में माक्र्स-लेनिन की पुट है। यह प्रणाली भी माक्र्स के विचारों से विचलन की प्रतीक नहीं है। वे तो ‘प्रजा समाजवादी पार्टी को माक्र्सवादी दल बनाने के पक्ष में थे।’ नरेन्द्र देव का विचार है कि माक्र्स का शान्तिपूर्ण साधनों में विश्वास था। माक्र्स ने सन् 1872 में यह स्वीकार किया था कि हालैण्ड और अमेरिका में शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा समाजवाद की स्थापना हो सकती है। ऐसा होना अन्यत्र सम्भव नहीं है। माक्र्स की मृत्यु के तीन वर्ष के उपरान्त, एंजेल्स ने भी इंग्लैण्ड में शान्तिपूर्ण समाजवादी क्रान्ति का समर्थन किया था। लेनिन ने भी यही का था कि माक्र्स के समय में यह मत सर्वथा उचित था किन्तु सन् 1917 में इसकी संभावना नहीं रही।27 माक्र्स ने पार्टी के अधिनायकत्व की अपेक्षा अधिनायकत्व का प्रतिपादन किया था। इसलिए आचार्य नरेन्द्र देव के मतानुसार, दो बातें स्पष्ट है। एक यह कि अधिनायकत्व शोषितों का हो, पार्टी का नहीं और दूसरे यह कि ज्यों ही उद्देश्य पूरा हुआ अधिनायकत्व का अन्त होना चाहिए।
संदर्भ ग्रन्थ
1. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-725
2. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-720,721
3. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-721
4. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-721
5. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-720,721
6. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-722
7. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-722,723
8. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
9. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
10. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
11. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-725
12. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
13. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
14. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
15. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
16. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
17. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
18. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-5
19. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
20. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-7
21. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-8
22. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-7
23. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-14
24. लाल, प्रो0 मुकुट बिहारी: आ0 नरेन्द्र देव-युग और नेतृत्व, पृ0-476
25. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-413-414

भारत की परमाणु नीति


शिव प्रकाश राय
शोध छात्र, राजनीतिविज्ञान विभाग,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।


भारत की परमाणु नीति भगवान बुद्ध के विचारों के परिधि घूमती रहती है। बुद्ध का मध्यम मार्ग एक माॅडल है जो खुशी देता है, शान्ति, विकास और शक्ति का सन्देश देता है। भारत की परमाणु नीति को हम तीन बिन्दुओं में देख सकते हैं-(1)ठनककीं ैसममचपदह- यह परमाणु दौड़ को कम करने को बोधित करता है। यह नेहरू कालीन समय था जिसमें यह माना गया कि परमाणु दौड़ में भाग लेना भारत के लिए उचित नहीं है। (2)ठनककीं ैउपसपदह- भारत के पड़ोसी देशों की संदिग्ध गतिविधियां और वैश्विक स्तर पर शक्ति संतुलन बाध्य करता है कि परमाणु दौड़ में भाग लिया जाए। ैउपसम एक व्यंग्य भी हे, जो देश शान्ति का रट लगाए रहता है वो आज परमाणु दौड़ में कूद पड़ा है। ैउपसम एक सन्देश भी है जो पड़ोसियों को और पूरे विश्व को यह दर्शाना चाहता है की भारत इस स्थिति में है कि परमाणु दौड़ में भाग ले सकता है। (3) ठनककीं डवअपदह दृ इसमें यह माना जाता है कि जब भारत के पास परमाणु क्षमता हो गयी तो हमें यह सोचना चाहिए कि परमाणु क्षमता का उपयोग कैसे करें। शान्ति के क्षेत्र में, सैनिक क्षेत्र में, नैनो तकनीक में या ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक क्षेत्र में उपयोग किया जाए।1
भारत की परमाणु नीति मे हम देखते हैं कि दुनिया में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो शत-प्रतिशत सही हो। एक वर्ग जो अपने को बुद्धिवादी, विश्व शांति का पैरोकार मानता है वो परमाणु नीति को गलत मानता है। वही एक वर्ग जो अपने को राष्ट्रवादी मानता है वो परमाणु नीति को सही मानता है। वैसे हम देखते हैं कि भारत में इस समय इस बात पर कोई बहस नहीं है कि परमाणु नीति सही है या गलत है। भारत की जनता एकमत हैं कि यह भारत की सुरक्षा के लिए सही है। रूस, चीन, पाकिस्तान, ईरान जैसे पड़ोसी देशों के परमाणु सम्पन्न रहने पर भारत की परमाणु नीति पर कोई प्रश्नवाचक (?) नहीं है।
भारत की परमाणु नीति को हम पाँच चरणों में रख सकते हैं-
(क) नेहरू कालीन परमाणु नीति(1946-1964)
(ख) शास्त्री कालीन परमाणु नीति (1964-1966)
(ग) इन्दिरा कालीन परमाणु नीति (1966-1984)
(घ) राजीव व अन्य काल में परमाणु नीति (1985-1997)
(ङ) वर्तमान समय में परमाणु नीति (1998 के बाद)
(क) नेहरू कालीन परमाणु नीति (1946-1964) - नेहरू के काल मे सरकार को पूंजीपति, वैज्ञानिक और सरकार तीनों का समर्थन था, लेकिन यह आदर्शवादी सहयोग था। परमाणु नीति को मूक समर्थन मिला क्योंकि ये आदर्शवादी था इसके पीछे के कारणों को हम देखते हैं-
ंण् भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक पक्ष बुद्ध, महावीर, अशोक, गांधी, नेहरू से जुड़ा था, जो कि अहिंसा और शान्ति की नीति से जुड़ा था। भारत हिरोशिमा, नागासाकी की विभीषिका को देख चुका था और जो देश शान्ति का नारा लगा रहा था वो परमाणु नीति को कैसे खुलकर सामने आने दे, अतः विरोधाभास था।
इण् भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन बहुत ही शान्तिपूर्ण, रक्तहीन क्रान्ति था।
बण् नेहरू का विश्व को देखने का दृष्टिकोण जो कि पूंजीवाद और साम्यवाद से हटकर पंचशील पर आधारित था।
कण् भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी,जो परमाणु शोध पर पैसा लगा सके।
मण् यूरेनियम, थोरियम, इत्यादि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं था।
 शान्तिपूर्ण विखण्डन को वैज्ञानिकों, पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों तीनों का सकारात्मक सहयोग था।एक तरफ चीन अतिराष्ट्रवाद की भावना से परमाणु दौड़ में शामिल हो रहा था। वहीं भारत में ठनककीं ूंे ैसममचपदहण्  दौर था दूसरी तरफ पाकिस्तान चालाकी से परमाणु दौड़ में कदम बढ़ा रहा था। लेकिन भारत में ठनककीं ूंे ेसममचपदहए दवज कमंक जो सोया हुआ है, वह कभी भी जग सकता है। वही इसी समय कुछ लोगों का मानना था कि शान्ति का विकल्प सिर्फ शान्ति ही है। महात्मा गांधी के अनुसार शान्ति का कोई विकल्प नहीं है।3
(ख) शास्त्री कालीन परमाणु नीति (1964-1966)- 1962 में चीन के साथ और 1965 में पाकिस्तान के साथ भारत दो युद्धों का सामना कर चुका था। इसलिए भारत में परमाणु दौड़ में शामिल होने की भावना बढ़ी। नींद टूटने वाली स्थिति आ गयी। शास्त्रीजी, नेहरूजी के नीतियों में विश्वास तो रखते थे लेकिन परिस्थिति के अनुसार परमाणु नीति के धीमी गति को सक्रिय किया।
1966 में शास्त्री जी एवं डाॅ0 भाभा दोनों का ही निधन हो गया और देश में राजनैतिक अस्थिरता की शुरूआत हुई। प्रतिबद्ध नौकरशाही की बात उठने लगी। समस्याओं को देश हित में देखने के बजाए व्यक्ति विशेष पर देखा जाने लगा। उस समय मद्रासी बनाम पारसी का विवाद भी जोरों पर था जिससे भारतीय परमाणु नीति को नुकसान हुआ। आपसी सहयोग का अभाव था नहीं तो हम 1960 के दशक में ही परमाणु शक्ति होते। उसी समय इंजीनियर बनाम भौतिकज्ञ, विशेषज्ञ बनाम सामान्य प्रशासक का विवाद और भारत में राष्ट्र विरोधी गुट ज्यादा सक्रिय होने लगे। परमाणु दौड़ पर कोई बहस नहीं हो रही थी। (जनता का सहयोग है कि नहीं ये नहीं पता था)।
(ग) इन्दिरा कालीन परमाणु नीति (1966-1984)- छच्ज् पर भारत ने हस्ताक्षर नहीं किया क्योंकि यह विश्व को दो भागों परमाणु क्षमता और अपरमाणु क्षमता वाले देशों के बीच बाँटता था। उसी समय 1971 में भारत-पाक के बीच युद्ध होता है और भारत में इस बात पर बहस शुरू होता है कि परमाणु बम क्यों नहीं? परमाणु दौड़ में जाना हमारी आवश्यकता/मजबूरी हो गयी। 18 मई 1974 को भारत का पहला परमाणु परीक्षण होता है। इन्दिरा जी ने कहा कि शान्ति के लिए शक्ति की जरूरत होती है (च्मंबम ूपजी च्वूमत)। भारत परमाणु क्षमता से लैस हो गया, यह शान्तिपूर्ण विखण्डन था। इस परमाणु विस्फोट से नाराज होकर कनाडा ने परमाणु क्षेत्र में सहयोग बन्द कर दिया। अमेरिका नाराज हुआ जो कि स्वाभाविक था, सोवियत संघ भी खुश नहीं था, पाकिस्तान का कहना था कि भारत हमारे ऊपर आक्रमण की तैयारी कर रहा है। वहीं दक्षिण एशिया में ‘ैमंतबी वित छनबसमंत थ्तमर्म वदम’ की बात होने लगी।4
(घ) राजीव व अन्य काल में परमाणु नीति (1985-1997)- राजीव गांधी,चन्द्रशेखर और राव के समय में परमाणु नीति पर चुप्पी थी। 1974 के बाद 1998 तक फिर ठनककीं ूंे ैसममचपदहण् क्योंकि राजनैतिक अस्थिरता, राजीव गांधी का कम्प्यूटर पर विशेष जोर, राव का स्ववा म्ंेज च्वसपबल तथा गुजराल का गुजराल डाॅक्ट्रिन। उसी समय राजीव गाँधी को ष्ठमलवदक ॅंत ।ूंतकष् दिया गया।5
(ङ) वर्तमान समय में परमाणु नीति (1998 के बाद)- विश्व परिस्थितियों में काफी बदलाव आया, अमेरिका और चीन के संबंधों में प्रगाढ़ता आई और पाक भी परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बनने के कगार पर था। भारत की सुरक्षा की समस्या और समय की मांग भी थी। 11 मई व 13 मई 1998 को भारत ने पोखरण में दूसरा परमाणु विस्फोट किया। भारत ने परमाणु दबाव (।जवउपब च्तमेेनतम) का प्रयोग कैसे किया जाए और ‘प्रथम प्रयोग नहीं’ की बात की। परमाणु शक्ति का उपयोग शान्तिपूर्ण कार्यों में हो या सैनिक क्षेत्रों में भी। भारत की परमाणु नीति को जनता का भरपूर सहयोग रहा। भारत अभी भी आत्मरक्षात्मक उद्देश्य से परमाणु नीति अपनाए हुए है। छच्ज्ध्ब्ज्ठज् को सहयोग करते हुए भी भारत ने परमाणु दौड़ में शामिल हुआ। यह सशर्तता छच्ज्ध्ब्ज्ठज् के प्रति है और अपनी सुरक्षा के प्रति अधिक जागरूक है। भारत की परमाणु नीति 80 प्रतिशत शान्ति के लिए तथा 20 प्रतिशत आत्मरक्षात्मक है।6
भारत की परमाणु नीति में अब जबर्दस्त बदलाव आया है। 18 जुलाई, 2005 को भारत और अमेरिका के बीच ‘परमाणु समझौता’ हुआ और यह भारतीय असैनिक रियक्टरों को ईंधन की आपूर्ति के लिए हुआ। साथ ही असैनिक रियक्टरों को अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजंेसी के निगरानी में लाने की बात भी थी। अन्ततः अक्टूबर 2008 में दोनों देशों के मध्य यह समझौता हो गया। इससे भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग में वृद्धि की सम्भावना है। लेकिन कुछ आलोचकों का मानना है कि इससे हमारी परमाणु नीति की स्वतंत्रता खत्म हो जायेगी। वहीं परमाणु समझौते के समर्थकों का मानना है कि इससे भारत के ऊर्जा सुरक्षा में मदद मिलेगी। इसे ईरान मुद्दे से भी जोड़ा जा रहा है।7
अमेरिकी कांग्रेस की शोध सेवा सीआरएस की रिपोर्ट ‘पाकिस्तान न्यूक्लियर वेपेंस:प्रोलीफरेशन एंड सिक्यूरिटी इश्यूज’ के मुताबिक, ‘पाकिस्तान के पास करीब 60 परमाणु हथियार हैं, और हथियार बनाने के लिए वह क्षमता बढ़ा रहा है।’ परमाणु हथियारों के संबंध में पाकिस्तान की कोई घोषित नीति नहीं है। सीआरएस रिपोर्ट में कहा गया है कि परमाणु हथियारों के मामले में भारत से आगे निकलने और पारंपरिक सैन्य ताकत में भारत से पीछे रहना ऐसे कारण हैं, जो पाकिस्तान को परमाणु हथियारों को बढ़ाने के लिए पे्ररित करते हैं।8
भारत ने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और उसके इस्तेमाल की धमकी देने पर ‘पूरी रोक’ के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव दिया है। म्यूनिख में एक अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन में भारत के सुरक्षा सलाहकार एम0के0 नारायण ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री प0नेहरू के समय से ही पुष्टि, योग्य और भेदभावरहित वैश्विक परमाणु निरस्तीकरण की वकालत करता रहा है। भारत उसका एक दृढ़ पक्षधर बना हुआ है।10
भारत ने परमाणु परीक्षणों का पहले इस्तेमाल न करने तथा विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक शक्ति प्राप्त करने की नीति अपनाई। ये विचार सबसे पहले स्वतंत्र रूप से भारत में ही विकसित हुए। भारत का नाभिकीय शस्त्रागार के साथ एक महाशक्ति के रूप में उभरने को दुनिया के बाकी देशों में खतरे के रूप में नहीं देखा जाता है। पोखरण अंतर्राष्ट्रीय तंत्र में एक जिम्मेदार शक्ति संतुलनकर्ता बनने की भारत की यात्रा का उद्गम बिन्दु है। यदि इसे समझ लिया जाएगा तो फिर किसी को भारतीय परमाणु नीति पर कोई भ्रम नहीं रह जाएगा।
संदर्भ ग्रन्थ

1- George Perkovich – ‘India’s Nuclear Bomb : The Impact on Global Proliferation’, Oxford University Press, New Delhi, 2000.
2- Sekhar, Basu Ray (ed) – NEW APPROACH (Atomic India Edition, 1998), Calcutta, National Art Press, 1998.
3. एअर कमोडोर सिंह जसजीत - ‘भारतीय परमाणु शास्त्र’, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली,  2004।
4- K.Subrahmanayan – ‘Nuclear Myths and Realites : India’s Dilemma’, ABC Publishing House, New Delhi, 1981.
5. पंत पुष्पेश एवं जैन रीपाल - ‘अंतर्राष्ट्रीय संबंध’ मीनाक्षी प्रकाशन, बेगमब्रिज- मेरठ,  2000।
6- Kapur Ashok - ‘Pokhran and Beyond : India’s Nuclear Behaviour’ Oxford University Press, New Delhi, 2001.
7- Gupta U.N.– International Nuclear Diplomacy and India, ATLANTIC Publishers & Distributors (P) Ltd., New Delhi, 2007.
8- Jain B.M. & Eva – Maria Hexanner (ed) ‘Nuclearisation in South Asia : Reactions and Responses’, Rawat Publications, New Delhi, 1999.
9- Journal of Conflict Resolution, Journal of the Peace Science Society (International), California, SAGE Publications, Thousands Oaks, Volume-53, No.02, April 2009.
10- Arms Control Today, July/August 2008, Volume 38, No. 06.
11. डाॅ0 चैधरी बीरेन्द्र कुमार - ‘भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण’, अकादमिक प्रतिभा, नई दिल्ली,  2006

‘‘स्वामी विवेकानन्द का प्रारम्भिक जीवन परिचय’’


प्रेम प्रकाश सिंह 
शोध छात्र, राजनीति विज्ञान,
सतीश चन्द्र काॅलेज, बलिया |


वर्तमान भारत के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सुधारों के अग्रदूतों में स्वामी विवेकानन्द का स्थान सर्वोपरि है जिन्होंने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व में भारतीय धर्म और अध्यात्म को प्रतिष्ठापित किया। उन्होंने भारत में हिन्दू धर्म का पुनरुद्धार किया और विदेशों में भारतीय सनातन सत्यों और मूल्यों का प्रचार किया। भारत के अध्यात्म का सन्देश विदेशों में प्रत्येक युग में पहुँचा किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय अध्यात्म के माध्यम से भारत की प्रतिष्ठा को एक ही पल में अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में स्थापित कर दिया। स्वामी जी कहते थे कि ‘‘धर्म, भारत के राष्ट्रीय जीवन के समग्र संगीत का मुख्य स्वर एवं केन्द्र है।’’1 स्वामी जी की आस्था ‘सार्वभौमिक धर्म’ में थी। विभिन्न धर्मों व पद्धत्तियों से उनका कोई विरोध नहीं था। उनके लिए वेदान्त दर्शन अन्तिम एकता की खोज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे धर्म को सृजनात्मक, निर्माणात्मक मानते थे, विध्वंसात्मक नहीं। वे कहते थे कि ‘‘किसी एक धर्म का पालन करते समय दूसरे धर्मों का विरोध या निन्दा नहीं करनी चाहिए।’’2 स्वामी विवेकानन्द साम्प्रदायिकता और धार्मिक विद्वेष के कट्टर विरोधी थे। स्वामी विवेकानन्द जी के शब्दों में, ‘‘सतर्क रहकर चेष्टा करनी होगी कि धर्म से किसी संकीर्ण सम्प्रदाय की सृष्टि न हो पाए। इससे बचने के लिए हम अपने को एक असाम्प्रदायिक सम्प्रदाय बनाना चाहेंगे। सम्प्रदाय से जो लाभ होते हैं वे भी उसमें मिलेंगे और सार्वभौमधर्म का उदारभाव भी होगा।’’3 उन्होंने धार्मिक संकीर्णता के परित्याग का आह्वान किया और उसके लिए सतत् प्रयास भी किया। वे कहते थे कि ‘‘मैं सभी धर्मों की आराधना करूँगा। अपनी माता जी से, शिक्षकों से एवं मित्रों से बचपन में जो कुछ उन्होंने ग्रहण किया, युवावस्था में वही उनमें प्रस्फुटित हुआ।’’4
स्वामी विवेकानन्द का जन्म कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कुलीन कायस्थ परिवार में 12 जनवरी, 1863 को हुआ था। उनकी माताजी अन्य धर्म प्राण हिन्दू माताओं की भाँति पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर व्रत उपवास किए थे और भगवान शिव की अराधना करती थीं। उन्होंने वाराणसी में रहने वाली अपनी एक रिश्तेदार महिला से बाबा विश्वनाथ की विशेष पूजा-अर्चना कर अपने लिए आशीर्वाद माँगने का अनुरोध किया था। माता भुवनेश्वरी देवी ने पुत्र प्राप्ति को बाबा विश्वनाथ का प्रसाद माना अतः बालक को ‘‘वीरेश्वर’’ नाम दिया किन्तु परिजनों ने बालक का नाम ‘‘नरेन्द्र’’ रखा और उन्हें ‘‘नरेन्द्र नाथ दत्त’’ नाम दिया गया।।
बालक ‘नरेन्द्र’ का जन्म जिस दत्त वंश में हुआ वह अपनी समृद्धि, विद्वता, सहृदयता और स्वाधीन मनोवृत्ति के लिए विख्यात था। उनके दादा दुर्गा चरण दत्त कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित एडवोकेट थे। बालक नरेन्द्र की शिक्षा की व्यवस्था घर से प्रारम्भ हुई। बालक नरेन्द्र को सोने से पूर्व एक ज्योति दिखाई देती थी जिसका उल्लेख वे बचपन में अपने मित्रों से किया करते थे। कालान्तर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस से साक्षात् होने पर उन्होंने स्वामी विवेकानन्द से पूछा था- ‘‘नरेन, सोने से पूर्व क्या तुम्हें ज्योति दिखती है?’’ नरेन्द्र के लिए यह प्रश्न विस्मयकारी था। छः वर्ष की आयु में बालक नरेन्द्र को सरकारी स्कूल में अध्ययन हेतु भेजा गया। किन्तु अभिभावकों को स्कूली वातावरण सन्तोष जनक नहीं लगा तो नरेन्द्र का स्कूल जाना बन्द हो गया और घर पर ही एक प्राइवेट शिक्षक से उनकी प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था की गई। बालक नरेन्द्र भगवान शिव के समक्ष बैठकर घण्टों ध्यानमग्न हो पूजा करते थे। बचपन में वे पूछा करते थे कि एक व्यक्ति को दूसरे से ऊँचा क्यों समझा जाय? पिताजी से पूछते कि ‘‘मुझे जगत् में कैसे रहना उचित है?’’ पिता का उत्तर था ‘‘कभी किसी बात पर विस्मित न होना।’’ एक बार माताजी ने कहा ‘‘बेटा, फल की ओर ध्यान दिए बिना तू सदा सत्य का पालन किए जाना। सत्यनिष्ठा के फलस्वरूप सम्भव है तुझे कभी-कभी अन्याय व कटु परिणाम सहन करना पड़े किसी भी परिस्थिति में तू सत्य को न छोड़ना।’’5 स्वामी विवेकानन्द जी कहा करते थे कि ‘‘अपने ज्ञान के विकास के लिए मैं अपनी माताजी का ऋणी हूँ।
1870 ई0 में बालक नरेन्द्र जब सात वर्ष के थे तो उनका एक उच्च विद्यालय में प्रवेश कराया गया। प्रारम्भ में अंग्रेजी के प्रति, झुकाव न होते हुए भी उन्होंने अंग्रेजी में पारंगत होने का गौरव प्राप्त किया। अपने उम्र के साथियों में वे सबसे अधिक चंचल, साहसी, तेजस्वी और लोकप्रिय थे। अन्ध विश्वास और डराने वाली बातों के प्रति वे अपने मित्रों से सच्चाई की जाँच किए बिना विश्वास न करने की बातें किया करते थे। कालान्तर में अपने भाषणों में स्वामी जी कहते थे कि ‘‘ किसी बात पर केवल इसी कारण विश्वास न कर लो कि वह किसी ग्रन्थ में लिखी है। किसी चीज पर इसलिए विश्वास कर लो कि किसी व्यक्ति ने उससे सत्य कहा है। किसी बात पर केवल इस कारण भी विश्वास न करना कि वे परम्परा से चली आ रही हैं। अपने लिए सत्य की स्वयं ही उपलब्धि करो। उसे तर्क की कसौटी पर कसो। इसी को अनुभूति कहते हैं।’’6
बचपन के इन क्रीड़ा-कौतुकपूर्ण जीवन के साथ-साथ किशोर नरेन्द्र के हृदय में परिव्राजक सन्यासी जीवन के प्रति आकर्षण प्रगाढ़ होता गया। अपनी हथेली की एक रेखा को अपने मित्रों को दिखते हुए वे प्रायः कहा करते थे ‘‘मैं अवश्य ही सन्यासी बनूँगा, एक हस्तरेखाविद ने मेरे बारे में बताया है।’’7
किशोरावस्था में प्रवेश के साथ ही नरेन्द्र के व्यवहार में विशेष परिवर्तन होने लगा। उनका झुकाव बौद्धिक जीवन और अध्यात्म की ओर बढ़ने लगा। वे साहित्य, इतिहास, धर्मग्रन्थ, समाचारपत्र आदि पढ़ने लगे। वे सार्वजनिक सभाओं में जाने लगे। अब वे संगीत प्रेमी बन गए थे क्योंकि संगीत उनके मन को बहलाने का एक साधन था। एक बार परिवार के साथा नरेन्द्र रायपुर (म0प्र0) गए। रास्ते में बैलगाड़ी से यात्रा करनी थी। रास्ते में वृक्ष, लताएँ, रंग बिरंगे फूल, पशु-पक्षी, गगनचुम्बी पर्वत शिखर आदि को देखकर नरेन्द्र मंत्र मुग्ध हो गए। वे ईश्वर की अनन्त शक्ति की कल्पना में डूब गए। रायपुर से कलकत्ता लौटकर नरेन्द्र ने हाईस्कूल की परीक्षा दिया और वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। अब उनकी जिज्ञासा बंगला साहित्य और अंग्रेजी की उच्चकोटि की पुस्तकों को पढ़ने की ओर बलवती हुई। 1879 में उच्च शिक्षा के लिए नरेन्द्र का प्रवेश प्रेसीडेंसी काॅलेज कलकत्ता में कराया गया। अगले वर्ष उनका प्रवेश ‘‘स्काटिश जनरल मिशनरी बोर्ड’’ द्वारा स्थापित ‘‘जनरल एसेम्बलीज इन्स्टीट्यूशन’’ में हुआ जो बाद में ‘स्काटिश चर्च काॅलेज’ के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने पाश्चात्य तर्कशास्त्र, पाश्चात्य दर्शन तथा यूरोप के प्राचीन व अर्वाचीन इतिहास का गहन अध्ययन किया। काॅलेज शिक्षा के दौरान ही युवक नरेन्द्र का स्वामी रामकृष्ण से साक्षात् हुआ। रामकृष्ण परमहंस से भेंट ने नरेन्द्र नाथ का जीवन कालान्तर में परिवर्तित कर दिया। रामकृष्ण परमहंस के दर्शन के बाद नरेन्द्र में अन्तर्निहित आध्यात्मिक पिपासा जागृत हो उठी और वे प्रभु में लीन रहने लगे। यहाँ तक कि उन्हें बी0ए0 की परीक्षा का भी ध्यान नहीं रहा। सहपाठियों ने उन्हें याद दिलाया तो परीक्षा मे बैठे और उत्तीर्ण हुए। नरेन्द्र की प्रतिभा से प्रभावित होकर काॅलेज के प्राचार्य और अंग्रेजी के प्राध्यापक प्रो0 हेस्टी ने कहा था, ‘‘नरेन्द्र एक वास्तविक प्रतिभाशाली युवक है। मैंने दूर-दूर की यात्रा की है किन्तु ऐसी प्रतिभा एवं सम्भावनाओं वाला युवक कहीं भी नहीं मिला, यहाँ तक कि जर्मन विश्वविद्यालय के दर्शन के छात्रों में भी कोई नहीं मिला। वह जीवन में निश्चय ही कुछ कर दिखाएगा।’’8
युवक नरेन्द्र की बहुमुखी प्रतिभा संगीत के माध्यम से भी अभिव्यक्त हुई। उन्होंने संगीत विशारदों से वाद्य एवं स्वर संगीत दोनों ही सीखा। वे कई प्रकार के वाद्य में पारंगत थे। गायन में तो उनकी कोई तुलना ही नहीं थी। उन्होंने एक मुसलमान शिक्षक से हिन्दी, उर्दू, फारसी और बंगला शिक्षक से बंगला के भक्तिमूलक सीखा। फलस्वरूप नरेन्द्र इन भाषाओं के भक्तिरस के गाने गा-गाकर उसमें लीन हो जाते थे।
नरेन्द्र के विवाह के लिए परिवार, शुभचिन्तक और मित्रों ने भगीरथ प्रयास किया किन्तु वे विवाह बंधन में बँधना नहीं चाहते थे। वे जानते थे कि अगर वे इस बँधन में में बँध जाएंगे तो उनका चिर प्रतीक्षित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा। उनके भाग्य में वैवाहिक सुख नहीं बल्कि विश्व विख्यात सन्यासी बनना लिखा था, वही हुआ। इस प्रकार नरेन्द्र ज्ञान, शिक्षा, संगीत, भक्ति आदि को लिए हुए सन्यास की ओर बढ़े।
स्वामी विवेकानन्द ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। भारत भ्रमण में उन्हें नवज्ञान और अनुभव का दर्शन हुआ। भारत की विविधता में एकता को देखा। भारत के पुनरुत्थान के लिए नया सोंच दिया। वे भारत के साधु सन्तों की कार्यशैली से क्षुब्ध थे। स्वामी विवेकानन्द ने प्राचीन भारतीय ग्रन्थों दर्शन और जीवनशैली का अध्ययन किया, साथ ही पाश्चात्य दर्शन, इस्लामिक और ईसाई दर्शन को भी जानने-समझने का पूरा प्रयास किया। वे ‘ब्रह्मसमाज’ और उसके संस्थापकों राजाराम मोहन राय, देवेन्द्र नाथ ठाकुर और केशव चन्द्र सेन से भी प्रभावित थे। समी जी पाखण्ड, कर्मकाण्ड आदि के दिखावे और अन्धविश्वास से दुःखी थे और इसका विरोध करते थे।
नरेन्द्र नाथ की पवित्रता में गहरी आस्था थी। उनकी पवित्रता ऐसी आध्यात्मिक शक्ति थी जिसे संचय कर भावी जीवन में उदात्त इच्छाओं को अभिव्यक्त किया जा सकता था। उन्होंने अपने समक्ष हिन्दू परम्परा के ऐसे ब्रह्मचारी विद्यार्थी का आदर्श रखा था, जो कठोर परिश्रम करता था, संयममय जीवन को महत्त्व देता था, पवित्र चीजों के प्रति श्रद्धा का भाव रखता था और मनसा-वाचा-कर्मणा शुद्ध जीवन बिताया करता था। वे कहते थे कि हिन्दू शास्त्रग्रन्थों ने ब्रह्मचर्य को सर्वश्रेष्ठ गुण माना है; इसी की सहायता से मानव सूक्ष्मतम आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति कर सकता है। नरेन्द्र नाथ की गहन एकाग्रता, तीव्र स्मरण शक्ति, गहन अन्तर्दृष्टि, अदम्य मानसिक क्षमता, ब्रह्मचर्य, शारीरिक बल, अटूट इच्छा शक्ति और अध्यात्म व दर्शन का गहरा अध्ययन आदि ने शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में 11 सितम्बर, 1893 को स्वामी विवेकानन्द ने पल भर में ही भारत को जो प्रतिष्ठा दिलाया वह ऐतिहासिक एवं अतुलनीय है। 4 जुलाई, 1902 को 37 वर्ष की अल्प आयु में भारत का महान सपूत और अध्यात्म का प्रचारक असमय काल के गाल में समा गया अन्यथा आज भारत का अध्यात्म व दर्शन पूरे विश्व में छा गया होता।
सन्दर्भ ग्रन्थ
1. वर्मा, विश्वनाथ प्रसाद: आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारक
2. फडि़या, बाबूलाल: आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तक, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा, 2006
3. फडि़या, बाबूलाल: आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तक, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा, 2006
4. वर्मा, विश्वनाथ प्रसाद: आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारक
5. स्वामी निखिलानन्दः विवेकानन्द,एक जीवनी, डिही एण्टली रोड,कलकत्ता, 1996, पृ0-7
6. स्वामी निखिलानन्द: विवेकानन्द, एक जीवनी, अद्वैत आश्रम(प्रकाशन विभाग), पृ0-9
7. स्वामी निखिलानन्द: विवेकानन्द, एक जीवनी, अद्वैत आश्रम(प्रकाशन विभाग), पृ0-10
8. स्वामी निखिलानन्द: विवेकानन्द, एक जीवनी, अद्वैत आश्रम(प्रकाशन विभाग), पृ0-13

मानवता के पथ-प्रदर्शक- स्वामी विवेकानन्द


डा0 कुलदीप कुमार
रीडर, शिक्षा विभाग, फोर्ट इन्स्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलोजी,
मवाना रोड, मेरठ।


महान कर्मयेागी स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के सिमुलियापल्ली में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त एवं माता का नाम भुवनेश्वरी था। बचपन से ही परिवार के उदात्त संस्कार एवं आध्यात्मिक परिवेश का इनके ऊपर व्यापक प्रभाव पड़ा। उनमें सहानुभूति, सहृदयता, सात्विकता और आध्यात्म वृत्ति के गुण जन्म से ही आ गये। और उनके जीवन में उत्तरोत्तर विकसित होते गये। भारत की धार्मिक और दार्शनिक परम्पराओं के प्रति उनकी गहन जिज्ञासा थी और शीघ्र ही भारतीय चिन्तन के मूलभूत विचारों का उन्होंने विशद् ज्ञान प्राप्त कर लिया।1
नवम्बर 1881 में स्वामी रामकृष्ण परमहंस से उनकी भेंट ने उनके जीवन में एक क्रान्तिकारी मोड़ लाई जिसके फलस्वरूप नरेन्द्रनाथ से वह स्वामी विवेकानन्द बन गये। उन्होंने यह प्रण किया कि वे अपना जीवन गुरू के सन्देश के प्रचार में लगायेगें। स्वामी विवेकानन्द एक तेजस्वी संन्यासी थे।स्वामी विवेकानन्द ने कहा -मैं उस भगवान या धर्म पर विश्वास नहीं करता जो न विधवाओं के आसूं पोंछ सकता है और न अनाथों को रोटी दे सकता है।2
स्वामी जी भारत की तत्कालीन दुर्दशा से आहत थे और दूसरों को पीडि़त देखकर रो पड़ते थे। वे निर्बल वर्ग के उत्थान के हिमायती थे उन्होंने कहा कि - दुर्बल की सहायता पहले होनी चाहिए। भारतीय समाजवादी चिन्तक के प्रणेता स्वामी जी संन्यासी होते हुए भी कभी अपने लिए मोक्ष की कामना नहीं की। वे अपना सारा जीवन मानव सेवा में समर्पित कर अपने को धन्य मानते थे वे अपने शिष्यों को सदैव कहा करते थे तेरा काम है- जाति वर्ग का विचार छोड़कर दीन-दुखियों की सेवा करना- उसका परिणाम क्या होगा, क्या न होगा यह सोचना तेरा काम नही है। तेरा काम है सिर्फ करते जाना- फिर सब अपने आप ही ठीक हो जायेगा उन्होंने उद्घोष किया कि ”उठो जागो- आत्म निर्भर बनो“। स्वामी विवेकानन्द शक्ति के उपासक थे उनका मानना था कि निर्बल को कुछ नहीं मिलता अतः ”शक्तिशाली बनो, संगठित बनो, पवित्र बनो“। यदि तुम पवित्र हो, यदि तुम सशक्त हो, तो तुम एक, समस्त संसार के बराबर हो।3
स्वामी जी कहते थे की दूसरे के गुणों को देखो। दूसरो में बुराई मत देखो, बुराई अज्ञान है, दुर्बलता है। लोगों को यह बताने से क्या लाभ कि वे दुर्बल है। आलोचना एवं खण्डन से कोई लाभ नही होता। तुम तो ईश्वर की सन्तान हो, अमर आनन्द के भागी हो, पवित्र और पूर्ण आत्मा हो। उठो साहसी बनो, वीर्यवान होओ, सब उत्तदायित्व अपने कन्धो पर लो- यह याद रखो कि तुम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हो। उठो, जागो, स्वंय जगकर औरों को जगाओ। अपने जन्म को सफल करो। ”उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य व्ररान्निबोद्यतः“। उठो जागो और तब तक रूको नही, जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाये।“4
स्वामी विवेकानन्द के सभी व्याख्यानों का सार दीन-दुखियों और पीडि़तों की सहायता करना है जो परम धर्म है। सभी उपासनाओं का उद्देश्य पवित्र रहना व दूसरों की भलाई करना है। बिना धर्म व जाति का विचार किये असहायों की सेवा करना, सच्चा धर्म पालन करना है। निस्वार्थ भाव से सेवा करने वाला ही सच्चा भक्त है।5 स्वामी जी ने साम्प्रदायिक कट्टरता, धर्मान्घता, जाति प्रथा तथा बाल विवाह की भत्र्सना की।6 उन्होंने मनुष्य और उसके उत्थान को सर्वोपरि माना। इस धरातल पर सभी मानवों और उनके विश्वासों का महत्व देते हुए धार्मिक जड़ सिद्धान्तों को मिटाने का आग्रह किया। युवाओं के लिए उनका कहना था कि पहले अपने शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाओं, मैदान में जाकर खेलो, कसरत करों ताकि स्वस्थ एवं पुष्ट शरीर से धर्म-आध्यात्म ग्रंथो में बताये आदर्शो में आचरण कर सको। आज जरूरत है ताकत और आत्म विश्वास की, आप में होनी चाहिए फैलादी शक्ति और अदम्य मनोबल।7
स्वामी जी ने शिक्षा को अध्यात्म से जोड़कर कहा कि ”जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र बने, मानसिक बल बढ़े, बुद्धि विकसित होे और जिससे मनुष्य अपने पैरांे पर खड़ा हो सके।“8 भारतीय समाज को उन्होंने स्वार्थ, प्रमाद व कायरता की नींद से जगाया और कहा कि ”मैं एक हजार बार सहर्ष नरक में जाने को तैयार हूँ, यदि इससे अपने देशवासियों का जीवन-स्तर थोड़ा सा भी उठा सकूं।“9
इस प्रकार एक सच्चे भारतीय संत की मर्यादा के अनुरूप स्वमाी जी ने अशिक्षा, अज्ञान, तथा भूख से लड़ने के लिऐ अपने समाज को तैयार किया। उन्होंने राष्ट्रीय चेतना जगाने, साम्प्रदायिकता मिटाने, मानवतावादी संवेदनशील समाज बनाने की एक आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाया। 4 जुलाई सन् 1902 में 35 वर्ष की अल्पायु में इनकी इहलीला समाप्त हुयी।
सन्दर्भ ग्रन्थ
1. डाॅ0 अग्रवाल रीता द्वारा संकलित शिक्षक पत्रिका विषेषांक प्रका0 अखिल भारतीय शिक्षक पत्रिका, मेरठ, पृ0-210
2. दीक्षित आर0सी0 द्वारा संकलित, समाजवादी बुलेटिन, प्रकाशन मार्च-2004, पृ0-37-38
3. स्मामी विवेकानन्द कर्मयोग प्रकाशक रामकृष्ण मठ, नागपुर
4. दीक्षित आर0सी0 द्वारा संकलित, समाजवादी बुलेटिन, प्रकाशन मार्च-2004, पृ0-37-38
5. डाॅ0 अग्रवाल रीता द्वारा संकलित शिक्षक पत्रिका विषेषांक प्रका0 अखिल भारतीय शिक्षक पत्रिका, मेरठ, पृ0-210
6. डाॅ0 कुमार कुलदीप द्वारा संकलित शोध ग्रन्थ प्रकाशक मेरठ,
7. डाॅ0 बंशी बलदेव, दैनिक समाचार पत्र, दैनिक जागरण के धर्म एवं आध्यात्म विशेषांक से उद्धृत पृ0-10
8. स्मामी विवेकानन्द, शिक्षा, प्रकाशक रामकृष्ण मठ, नागपुर
9. डाॅ0 बंशी बलदेव, दैनिक समाचार पत्र, दैनिक जागरण के धर्म एवं आध्यात्म विशेषांक से उद्धृत पृ0-10

प्रथम आम चुनाव (1952) से चतुर्थ आम चुनाव (1967) तक के उत्तर प्रदेश विधान सभा में महिला प्रतिनिधित्व


रश्मि सिंह
शोध छात्रा, राजनीतिशास्त्र विभाग,
 सतीश चन्द्र काॅलेज, बलिया।



भारतीय संघ में उत्तर प्रदेश का विशिष्ट स्थान है। उत्तर प्रदेश का धार्मिक, दार्शनिक, साहित्यिक और राजनैतिक महत्व सदैव से रहा है। वर्तमान भारतीय राजनीति और प्रशासन में उत्तर प्रदेश का योगदान महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश की महिला श्रीमती इन्दिरा गाँधी प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं तो श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम महिला अध्यक्षा चुनी गई। उ0 प्र0 की प्रथम महिला राज्यपाल श्रीमती सरोजिनी नायडू, प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती सुचेता कृपलानी, चार बार मुख्यमंत्री का रिकार्ड बनाने वाली वर्तमान मुख्यमंत्री सुश्री मायावती का उ0 प्र0 की राजनीति में महिला राजनीति को दिशा तय करने में अग्रणी योगदान है। श्रीमती सोनिया गाँधी कांग्रेस (ई) अध्यक्ष और संप्रग अध्यक्ष के रूप में भारतीय राजनीति को संचालित कर रही हैं जिनका उ0 प्र0 (रायबरेली) से गहरा सम्बन्ध है। वस्तुतः उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिलाओं को सदैव महत्व मिला है।2
भारतीय राजनीति में प्रथम आम चुनाव (1951-52) भारत की जनता और मतदाताओं के लिए सुखद क्षण और प्रयोग था। आजादी की लम्बी लड़ाई, कुर्बानी और त्याग के बाद भारतीयों ने स्वतंत्रता की देवी का हृदय से स्वागत किया और प्रथम आम चुनाव में काँग्रेस के ऋण को मतदाताओं ने चुकाया। इस चुनाव का परिणाम भारतीय मतदाताओं द्वारा काँग्रेस के प्रति आभार अभिव्यक्ति प्रदर्शित की गई। लोकसभा और राज्यों की विधान सभाओं में काँग्रेस उम्मीदवार अधिक संख्या में पहुँचे और विशाल बहुमत वाली काँग्रेस नीति सरकारें बनीं। स्वतंत्रता, स्वराज्य, सुराज, बलिदान, जनता की अपनी सरकार आदि की भावनाओं से ओतप्रोत भारत ने लोकतान्त्रिक प्रयोग का पहला स्वाद चखा जिसमें प्रत्याशी व मतदाता दोनों को पहली बार कुछ सीखने-करने का सुअवसर मिला। इस चुनाव में राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व बहुत कम मात्रा में प्राप्त हुआ। प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश विधान सभा में महिला विधायकों की संख्या कम थीं। जो विधायिका बनकर सदन में पहुँची वे स्वतंत्रता संग्राम, आन्दोलन, शिक्षा जगत् व जनसेवा से जुड़ीं महिलाएँ। आम महिला का योगदान शून्य था। इस प्रकार प्रथम आम चुनाव में महिला नेतृत्व व प्रतिनिधित्व उत्साहवर्द्धक नहीं था।3
द्वितीय आम चुनाव (1957)4 में उत्तर प्रदेश विधान सभा में कुल 341 निर्वाचन क्षेत्र थे जिनमें 252 एकल सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र और 89 द्विसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे। कुल निर्वाचन क्षेत्रों में 252 निर्वाचन क्षेत्र सामान्य और 89 अनुसूचित जाति हेतु आरक्षित थे। जनजाति के लिए कोई निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित नहीं था। उ0 प्र0 में एकल निर्वाचन क्षेत्र में कुल मतदाता 20397331 थे जिनमें 20311426 सामान्य वर्ग के मतदाता थे और 85905 अनुसूचित जाति थे। द्विसदनीय निर्वाचन क्षेत्र में कुल मतदाता 14364742 थे जिनमें 158978 सामान्य और 14205764 अनुसूचित जाति के मतदाता थे। 1957 के आम चुनाव में कुल मतदाता 34762073 थे जिनमें 2047404 सामान्य और 14291669 अनुसूचित जाति के थे। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत 44.68 प्रतिशत था। द्वितीय आमचुनाव में 21918604 वैध मत पड़े जिनमें 10170782 सामान्य और 11747822 अनुसूचित मत थे। भारतीय जनसंघ ने 236 सी0पी0आई0 ने 90, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 430, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 261, राम राज्य परिषद ने 14 उम्मीदवार खड़े किये और 660 निर्दलीय उम्मीदवारों ने विधान सभा के लिए अपना भाग्य आजमाया जिनमें भारतीय जनसंघ को 17, सी0पी0आई0 को 09, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को 286, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को 44, राम राज्य परिषद को 34 और निर्दलीयों व अन्य को 74 स्थानों पर सफलता मिली। इन दलों को प्राप्त मत प्रतिशत क्रमशः 9.84,3.83, 42.42, 14.47, 0.76 और 28.65 प्रतिशत मत मिले। रामराज्य परिषद राज्य स्तरीय पार्टी थी जबकि जनसंघ, काँग्रेस, सी0पी0आई0 और प्र0सो0 पार्टी राष्ट्रीय दल थे। इस चुनाव में महिला प्रत्याशियों की संख्या प्रथम आम चुनाव की तुलना में बढ़ी किन्तु यह बढ़ोत्तरी उत्साहवर्द्धक नहीं थी। उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रांे में 39 महिलाएँ ही सक्रिय रूप से चुनाव लड़ी है और अन्य महिला उम्मीदवार केवल उपस्थिति दर्ज करने के लिए चुनाव मैदान में थी। कुल 18 महिलाएँ ही विधान सभा में पहुँच सकीं। ये सभी विजयी महिलाएँ भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की थीं। शेष महिला उम्मीदवार अन्य दलों की और निर्दलीय थीं।
तृतीय आम चुनाव (1962) लोकतान्त्रिक भारत के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था। भारत का मतदाता अपने मताधिकार और मतदान का महत्व समझ चुका था। मतदाता यह समझ गया था की नीतिनिर्धारकों और शासन कर्ताओं को वही ताज पहनाता है और अगले चुनाव में उसे या तो पदच्युत करता है अथवा उसके अच्छे एवं जनहित के लिए किए गए कार्यों के अगले कार्यकाल के लिए पुनः सत्ता सौंपता है। मतदाता, लोकतंत्र में अपना भाग्य विधाता होता है इसे तीसरे आमचुनाव तक वह समझ चुका था। मतदान में मतदाता केन्द्र और प्रान्तों की सरकारों का स्वरूप निर्धारित करता है। विगत दो आमचुनावों का मतदान व्यवहार मतदाताओं के लिए प्रशिक्षण का कार्यशाला प्रमाणित हुआ। तृतीय आम-चुनाव में कुल 430 निर्वाचन क्षेत्र थे जिनमें 341 सामान्य और 89 अनुसूचित जाति के लिए थे। कुल मतदाताओं की संख्या 36661578 थी जिसमें 20008182 पुरूष और 16653396 महिला मतदाता थे। इसमें 15973334 सामान्य पुरुष और 13233587 सामान्य महिला एवं 4034848 अनुसूचित पुरुष और 3419809 अनुसूचित महिला मतदाता थे। इस प्रकार कुल 29206921 सामान्य मतदाता और 7454657 अनुसूचित मतदाता अर्थात् 36661578 मतदाता थे। तृतीय आम चुनाव में 18859667 मतदाताओं ने 39121 पोलिंग स्टेशनों पर अपने मतदान का प्रयोग किया जिनमें 15718442 सामान्य एवं 3141225 अनुसूचित मतदाता थे। पुरुष मतदाताओं की संख्या 12261740 और महिला मतदाताओं की संख्या 6597927 थी। इनमें पुरुष सामान्य 10045256 और अनुसूचित 2216484 मतदाता थे। महिला सामान्य 5673186 और अनुसूचित 924741 मतदाता थी। तृतीय आम चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत 51.44 प्रतिशत था जिसमें सामान्य मतदान प्रतिशत 53.82 प्रतिशत और अनुसूचित मतदान प्रतिशत 42.14 प्रतिशत था। इस चुनाव में कुल 3418 पुरुष उम्मीदवारों ने अपना नामांकन कराया जिसमें से 24 उम्मीदवारों का पर्चा निरस्त हो गया और 774 ने अपना नाम वापस ले लिया। इस प्रकार केवल 2620 उम्मीदवार चुनाव मैदान में रह गए। इनमें से 2145 सामान्य और 475 अनुसूचित उम्मीदवार थे। 430 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए तृतीय आम चुनाव (1962) में कुल 29206921 सामान्य एवं 7454657 अनुसूचित मतदाता थे अर्थात् कुल 36661578 मतदाता थे जिसमें मात्र 18859667 ने मतदान किया। इस चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हुई 1957 के आमचुनाव की अपेक्षा डेढ़ गुनी हुई। महिला प्रत्याशियों में से 61 ने दमखम के साथ चुनाव मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज किया जिनमें से 20 ही सफल हो सकी। 20 महिला विधायकों में 19 भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और मात्र 01 भारतीय जनसंघ की थी। अन्य दलों व निर्दलीय महिला प्रत्याशी विजयी नहीं हुई। तृतीय आम चुनाव में सी0पी0आई0 ने 147, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने 429, जनसंघ ने 377, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 288, सोशलिस्ट पार्टी ने 273, स्वतंत्र पार्टी ने 167, रामराज्य परिषद ने 41, रिपब्लिकन पार्टी ने 123, और निर्दलीय व अन्य ने 775 उम्मीदवार खड़े किए। चुनाव परिणाम के अनुसार सी0पी0आई0 के 14, भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के 249, जनसंघ के49, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के 38, सोशलिस्ट पार्टी के 24, स्वतंत्र पार्टी के 15, रामराज्य परिषद के कोई नहीं, रिपब्लिकन पार्टी के 8 और निर्दलीय व अन्य 33 उम्मीदवार विजयी हुए जिनका मत प्रतिशत क्रमशः 5.08, 36.33,16.46,16.46, 11.52, 8.21, 4.60, 0.29, 3.74, और 23.57 प्रतिशत रहा। इस चुनाव में महिला उम्मीदवारों और महिला विधायकों की संख्या में वृद्धि हुई जो महिलाओं की जागरुकता को प्रदर्शित करता है।
चतुर्थ आम चुनाव (1967)6 का भारतीय शासन और राजनीति तथा प्रान्तों की राजनीति में महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्थान है। 1962 के भारत-चीन युद्ध ने समूचे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया। हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा देकर चीन ने ‘नेफा’ और ‘लद्दाख’ की ओर से भारत पर आक्रमण कर दिया। अस्त्र, शस्त्र और भोजन पानी के अभाव में हमारे सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए या पीछे हटने को मजबूर हुए। चीन ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्जा कर लिया जिस पर वह आज भी कायम है। युद्ध की भयावह स्थिति से मंहगाई, जमाखोरी और जनता की परेशानियों का दौर शुरू हुआ। चीन के चाऊ एन लाई और माओं के विश्वासघात की गहरी चोट भारत के प्रधानमंत्री पं0 जवाहर लाल नेहरू के दिल और दिमाग में घर कर गई जिसे वे अधिक समय तक सहन न कर सके और 27 मई 1964 को असमय स्वर्गवासी हो गए। इस प्रकार भारत को दुर्दिन में छोड़कर पं0 नेहरू दुनिया से चले गए। पं0 नेहरू के साथ ही कांग्रेस में एकछत्र शासन के युग का अन्त हो गया। कांग्रेस के कर्णधार एवं खेवनहार बने- कामराज, निजलिंगप्पा, नीलम संजीव रेड्डी, अतुल्य घोष, एस0 के0 पाटिल, चन्द्रभानु गुप्त एवं मोरारजी देसाई बगैरह। ‘‘नेहरू के बाद, कौन?’’ की दौड़ में नेताओं ने अपनी-अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दिया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नन्दा के स्थान पर लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद का गुरुत्तर भार सौंप दिया। शास्त्री जी, पं0 नेहरू के उत्तराधिकारी बने। 1962 के भारत-चीन युद्ध के संकटों से अभी भारत उबर नहीं पाया था कि 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण करके अवांछित युद्ध थोप दिया। इस युद्ध में भारत की अपार क्षति हुई और एकबार फिर भारत पर संकटों का दौर शुरू होगया। मंहगाई, भूखमरी, गरीबी, लाचारी, खाद्यान्न का संकट और युद्ध की विभीषिका से जनजीवन त्रस्त हो गया। अब कांग्रेस और कांग्रेसी सरकारों से लोगों का विश्वास हटने लगा। सोवियत संघ के निमंत्रण पर युद्ध समाप्ति व समाधान के लिए प्रधानमंत्री शास्त्री मास्को गए और ताशकन्द समझौता पर पाकिस्तान के साथ 10 जनवरी, 1966 को हस्ताक्षर किए। 10-11 जनवरी, 1966 को ताशकन्द में ही प्रधानमंत्री शास्त्री जी का प्राणान्त हो गया। दो युद्धों की विभीषिकाओं अकाल, सूखा, अतिवृष्टि, बाढ़, मंहगाई, खाद्यान्न समस्या व मजबूत नेतृत्वविहीन कांग्रेस के कारण भारत की स्थिति भयंकर, सोचनीय और दयनीय हो गई थी। कांग्रेस के क्ष़त्रपों के बीच प्रधानमंत्री पद को लेकर खींचतान शुरू हो गई। प्रधानमंत्री पद के दो उम्मीदवार श्री मोरार जी देसाई और श्रीमती इन्दिरा गाँधी मैदान में थे। कांग्रेस सांसदों के मत विभाजन द्वारा श्रीमती इन्दिरा गाँधी प्रधानमंत्री बनीं और मोरार जी देसाई उप प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री बने। इसका प्रभाव यह हुआ कि केन्द्र और प्रान्तों में आपसी कलह, गुटबाजी और खींचतान प्रारम्भ हो गया।7 उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्तर प्रदेश के क्षत्रपों में सर्वश्री चन्द्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी, चैधरी चरण सिंह, उमाशंकर दीक्षित, मोहन लाल गौतम, रामचन्द्र विकल, चै0 गिरधारी लाल, हेमवती नन्दन बहुगुणा, त्रिभुवन नारायण सिंह वगैरह की गुटीय राजनीति शुरू हुई जिसका प्रभाव प्रदेश राजनीति कंे साथ-साथ जिलों की राजनीति व स्थानीय राजनीति पर भी पड़ा। 1967 की ऐतिहासिक विनाशकारी बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि आदि के कारण सम्पूर्ण भारत त्रस्त था। उत्तर प्रदेश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। अमेरिका से मंगाए गए मोटे अनाज मक्का, बाजरा आदि को सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से जनता को उपलब्ध कराया जाता था जिसके लिए अफरा-तफरी मचती थी। क्षुब्ध जनता कांग्रेस सरकार को कोस रही थी। कांग्रेस सरकारों की बदइन्तजामी से जनता में कांग्रेस पार्टी और शासन की छवि धूमिल  हो रही थी। ऐसे वातावरण में हुए चतुर्थ आम चुनाव (1967) में केन्द्र और उत्तर प्रदेश दोनों में कांग्रेस की स्थिति कमजोर हुई। कांग्रेस में प्रान्तीय, जिले और स्थानीय स्तर पर कांग्रेसी नेताओं की भितरघात और गुटबाजी ने चुनाव को अधिक प्रभावित किया और कांग्रेस को नुकसान पहुँचाया। उत्तर प्रदेश विधान सभा के 425 सीटों में कांग्रेस को मात्र 199 सीटों पर ही सन्तोष करना पड़ा। यह संख्या बल सदन में स्पष्ट बहुमत से भी 14 कम था। लोकसभा में भी कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं थी। चतुर्थ आम चुनाव में कांग्रेस ने 512 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए जिसमें से मात्र 279 उम्मीदवार ही विजयी हुए। इस चुनाव में पहली बार कांग्रेस 300 के आँकड़े को भी न छू सकी। श्रीमती इन्दिरा गाँधी की अनुभवहीनता, कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक व्याप्त घोर गुटबन्दी, दैवी प्रकोप और कांग्रेस में शीर्ष नेतृत्व के रूप में एकगुट का प्रभाव आदि ने कांग्रेस की स्थित को दयनीय बना दिया।
उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 1967 में 425 सदस्यीय विधान सभा में 336 सामान्य और 89 अनुसूचित निर्वाचन क्षेत्र थे। इस चुनाव में 421448100 मतदाता पंजीकृत थे जिनमें 33398160 सामान्य और 8749940 अनुसूचित मतदाता पंजीकृत थे। सामान्य मतदाताओं में 18006125 सामान्य पुरुष और 15392035 सामान्य महिला मतदाता थे। इसी प्रकार 4711888 अनुसूचित पुरुष एवं 4038052 अनुसूचित महिला मतदाता पंजीकृत थे। कुल 22989751 मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया जिनमें 13725449 पुरुष और 9264302 महिला मतदाता थे। मतदान प्रतिशत 54.55 प्रतिशत था जिसमें सामान्य मतदान प्रतिशत 56.59 प्रतिशत और अनुसूचित मतदान प्रतिशत 46.72 प्रतिशत था। सफल मतदान संचालन के लिए 42369 मतदेय स्थल बनाए गए थे।
चतुर्थ आम-चुनाव उठापटक और गुटीय जीत के उद्देश्य से पूरे देश में लड़ा गया जिसका उद्धरणीय अखाड़ा उत्तर प्रदेश बिहार, पं0 बंगाल आदि रहे। महिला प्रधानमंत्री के बावजूद किसी भी दल ने महिला उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा कर जोखिम लेने की भूल नहीं किया फिर भी महिलाएँ चुनाव में उतरीं। उत्तर प्रदेश विधानसभा के 425 सदस्यों के चुनाव के लिए महिलाएँ चुनाव लड़ीं किन्तु उनमें से मात्र 39 महिलाओं ने दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरीं। किन्तु मात्र 06 महिलाएँ ही विधानसभा में पहुँच सकीं। ये सभी अखिल भारतीय कांग्रेस की थीं। इस चुनाव में भारतीय जनसंघ ने 401, सी0पी0आई0 ने 96, सी0पी0एम0 ने 57, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 425, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 167, रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इण्डिया ने 168, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी नपे 254, और स्वतंत्र पार्टी ने 207 प्रत्याशी खड़े किए। साथ ही 1239 निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में उतरे। इनमें से भारतीय जनसंघ 98, सी0पी0 आई0 13, सी0पी0एम0 01, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 199, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी 11, रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इण्डिया 10, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी44, स्वतंत्र पार्टी 12 और निर्दलीय 37 स्थानों पर विजयी रहे। इन्हें क्रमशः 21.67, 3.23, 1.27, 32.20, 4.09, 4.14, 9.97, 4.73 और 18.70 प्रतिशत मत प्राप्त हुए।
चतुर्थ आम चुनाव 1967 महिला प्रधानमंत्री के नेतृत्व में लड़ा गया। किन्तु इस चुनाव में महिलाओं को महत्व नहीं दिया गया। उ0 प्र0विधान सभा में मात्र 06 महिलाएँ ही चुनकर पहुँची जो महिलाओं के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। जिताऊ प्रत्याशी की चाहत में महिलाओं की उपेक्षा हुई। 1967 के बाद शुरू हुआ ‘दल-बदल’, जातीय राजनीति, क्षेत्रीय राजनीति आदि। पुनः 1969 से और तदन्तर महिलाओं की भूमिका को महत्व दिया जाने लगा जिसका सुखद परिणाम आज दिखाई दे रहा है।8
संदर्भ ग्रन्थ
1. पाण्डे एस0 के0, आधुनिक भारत, प्रयाग एकेडमी, इलाहाबाद, 2002, पृ0-431
2. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार पत्र, बलिया संस्करण, 10 मई, 2009, पृ0-10
3. पाण्डे एस0 के0, आधुनिक भारत, प्रयाग एकेडमी, इलाहाबाद, 2002, पृ0-484
4. पाण्डे एस0 के0, आधुनिक भारत, प्रयाग एकेडमी, इलाहाबाद, 2002, पृ0-431
5. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार पत्र, बलिया संस्करण, 10 मई, 2009, पृ0-10
6. पाण्डे एस0 के0, आधुनिक भारत, प्रयाग एकेडमी, इलाहाबाद, 2002, पृ0-484
7. पाण्डे एस0 के0, आधुनिक भारत, प्रयाग एकेडमी, इलाहाबाद, 2002, पृ0-431
8. डाॅ0 मिश्रा प्रभा का शोध प्रबन्ध, भारतीय संविधान में महिलाओं की स्थिति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद वर्ष 2005 से साभार।