Friday, 1 January 2010

‘‘पर्यावरण संरक्षण का संवैधानिक एवं कानूनी पक्ष’’


डाॅ0 इन्द्रमणि
प्रवक्ता, राजनीति विज्ञान,
अकबरपुर महाविद्यालय, कानपुर देहात।


आज समाज का प्रत्येक वर्ग विकास की बात करता है, परन्तु प्रायः वह खोखले विकास के संदर्भ में ही गम्भीर है। आज विकास का परिचायक है- फ्रिज, ए0सी0, कार, टी0वी0, एल0सी0डी0, कम्प्यूटर, इण्टरनेट, मोबाइल इत्यादि। क्या विलासी जीवन यापन को सुसज्जित करने वाले इन संसाधनों का उपभोग करते समय अन्य साधन हीन व्यक्तियों के संदर्भ में नहीं सोचना चाहिये। यदि व्यक्ति सर्वोदयी दृष्टि रखे एवं समाज के सभी वर्ग का ख्याल रखे तो आज जो संकट दुनिया के सामने गहराता जा रहा है, वह न हो। भौतिकवादी, विज्ञान-प्रधान एवं भाग्यवादी भावनाओं वाले तथाकथित विकास की कीमत पर पर्यावरण को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। मानव का अन्तिम लक्ष्य स्थायी एवं सर्वोदयी विकास होना चाहिये, जिससे हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ एवं खुशहाल जीवन जी सके। किन्तु वास्तविकता यह है कि जिस पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया जा रहा है उसकी तुलना में पर्यावरण संरक्षण का कार्य नगण्य है।
1972 से प्रत्येक वर्ष पर्यावरण संतुलन एवं संरक्षण के लिये सम्पूर्ण विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है- ‘‘आपके ग्रह (पृथ्वी) की आपको जरूरत है, जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये एक हो’’1 जलवायु परिवर्तन के अनेकानेक दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं। यदि इन पर आम जनमानस गम्भीर एवं जागरूक नहीं हुआ तो धरा की धड़कन बहुत तेज हो जायेगी और अपने अस्तित्व को मिटाकर आग के गोले में तब्दील हो जायेगी। भविष्य में बहुत भयावह स्थिति आने वाली है जिसे निम्नलिखित आंकड़ों में देख सकते हैं2-
1. हर वर्ष 32.5 करोड़ लोग जलवायु परिवर्तन के कहर से आने वाली बाढ़, सूखा और बीमारियों से गम्भीर रूप से प्रभावित होते हैं।
2. अगर इसी गति से कोयले का प्रयोग जारी रहा तो अगले सवा सौ सालों में इसका भण्डार समाप्त हो सकता है।
3. 2025 तक विकासशील देशों में पानी की मांग में 50 फीसदी जबकि विकसित देशों में 18 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो जायेगी।
4. पिछले 25 साल में दुनिया की आबादी में करीब एक तिहाई बढ़तोत्तरी हुयी है अगर यही हाल रहा तो खड़े होने के लिये जमीन मिलनी मुश्किल हो जायेगी।
5. दुनिया में कुल खर्च की जाने वाली ऊर्जा का 11 फीसदी हिस्सा केवल घर को गर्म ठण्डा व प्रकाशमय करने के साथ- साथ घरेलू उपकरणों के प्रयोग में खर्च होता है।
6. तेजी से पिघलती बर्फ और ग्लेशियरों से समुद्रों का जल स्तर बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर इसी तरह समुद्र का जल स्तर बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समुद्र से सटे शहरों और देशों के नामों निशां मिट जायेंगे। बांग्लादेश, न्यूयार्क सिटी का मैनहट्टन और नीदरलैण्ड पूरी तरह तबाह हो सकते हैं। भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई के साथ-साथ कोलकाता और मद्रास जैसे शहरों पर भी खतरे मंडरा रहें हैं।
7. एक अनुमान के मुताबिक डायनासोर की भांति 2050 तक पृथ्वी के 40 फीसदी जीव-जन्तुओं का खात्मा हो जायेगा।
8. वैज्ञानिकों की मानें तो आने वाले सौ सालों में वायुमण्डल में कार्बनडाई आक्साइड की मात्रा मौजूदा स्तर की तीन गुना हो जायेगी।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कानून का सहारा लिया जा सकता है। कानून और उसके प्रभावी क्रियान्वयन से पर्यावरण की सेहत सुधारी जा सकती है। जैसा कि दिल्ली में बसों एवं टैक्सियों के सी0एन0जी0 चालित करने का कानून। उल्लेखनीय है कि दिल्ली विश्व का चैथा सर्वाधिक प्रदूषित शहर था3 परन्तु सी0एन0जी0 चालित बसों एवं टैक्सियों के कारण वायु प्रदूषण से होने वाले रोगों में कमी आई। इसी प्रकार पर्यावरण की सुरक्षा के मद्देनजर दिल्ली, हरियाणा सीमा पर खनन और स्टोन क्रशर पर रोक लगाने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी इस क्षेत्र के निवासियों के लिये एक भेंट है।
संविधान में पर्यावरण की सुरक्षा नागरिकों के मूल अधिकारों में शामिल नहीं की गयी है, किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने अन्तरदृष्टि और दूरदर्शिता दिखाते हुये स्थापना दी कि संविधान की धारा 21 में जीवन के अधिकार से आशय है, स्वस्थ और उपयुक्त जीवन, जिसके लिये स्वच्छ पर्यावरण अनिवार्य शर्त है। राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों को भी ध्यान में रखते हुये सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किये हैं यह आदेश निर्देश अनुच्छेद- 47, 48ए और 51ए (जी) में दिये गये प्राविधानों से सम्बन्धित है अनुच्छेद-47 के अनुसार जनता के स्वास्थ्य में सुधार करना और पौष्टिकता एवं जीवन स्तर में वृद्धि करना राष्ट्र-राज्य की जिम्मेदारी है। अनुच्छेद-48ए के तहत राष्ट्र पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार सुनिश्चित करेगा। साथ ही देश के वनों और वन्य जीव-जन्तुओं की सुरक्षा करेगा। अनुच्छेद-51 ए (जी) के अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और इसमें सुधार लाये इनमें वन, झीलें, नदियां और वन्य जीव-जन्तु शामिल है। सामान्य तौर पर अदालतों द्वारा इन प्राविधानों की उदार व्याख्या की गई है और यह ध्यान रखा गया है कि जो भी निर्देश जारी किये जायें वे पर्यावरण के रक्षार्थ हों।4
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा होने वाले विभिन्न सम्मेलनों में पारित सिद्धान्तों एवं नीतियों में तादात्म्य स्थापित करते हुये सर्वोच्च न्यायालय ने भी कुछ दिशानिर्देश एवं अनुसंशाओं को जारी किया है जिसमें पर्यावरण, टिकाऊ विकास, पानी, बंजर भूमि, जैव-विविधता, जलवायु परिवर्तन, तापमानों में वृद्धि; जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं।
न्यायिक सक्रियता के पर्यावरण सुधार सम्बन्धी उदार एवं दृढ़ दृष्टिकोण के बावजूद अनेक मामलों में इनका अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इसीलिये भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम0एन0 वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित संविधान समीक्षा आयोग ने संविधान में संशोधन करना और उसमें अनुच्छेद-30डी जोड़ने की सिफारिश की। इसके तहत लोगों को ये अधिकार हैं- समाज के हर व्यक्ति को स्वच्छ एवं सुरक्षित पानी मिले, स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण मिले, भावी पीढ़ी के लिये पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करना, पारिस्थितिकी अनुकूल विकास तथा आर्थिक व सामाजिक विकास में प्राकृतिक संसाधनों को क्षति से बचाना। यदि इन सिफारिशों को सरकार व संसद के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता एवं संविधान संशोधन करते हुये पर्यावरण से सम्बन्धित सख्त कानून बनाये जाते, तो निश्चित रूप से पर्यावरण के बचाव और उसमें सुधार के काम में कानून और उनकी सही व्याख्या महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रखने की बात यह है कि खराब जीवन यापन, व्यक्तिनिष्ठ जीवन, खराब सामाजिक और सांस्कृतिक लोकाचार, कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति, अक्षम प्रशासन, भ्रष्टाचार, सर्वोदयी भावना का अभाव और सार्वजनिक जीवन में अगतिशीलता से इन प्रयासों पर पानी फिर सकता है।
पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में बने कानून एवं न्यायिक सक्रियता के दौरान अदालतों के आदेश-निर्देश हमें वांछित परिणाम नहीं दिला सकते। इसके लिये हमें एक जुट होकर समग्र क्रान्ति करनी होगी। प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा  के शोधपरक अध्ययन पर अमल करते हुये उनके कथनों पर अमल करना चाहिये जैसे कि अब समय सोचने का नहीं बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत ढूढ़ने का है तथा दुनिया बचानी है तो हिमालय को पेड़ों से ढकें।5
गंगा की सफाई एकाकी प्रयासों से सम्भव नहीं है। इस समय करीब 100 शहर गंगा के किनारे बसे हुये है। सुनियोजित विकास और इन शहरों के पुनर्विकास के बिना अपशिष्ट प्रबन्धन, कूड़ा निस्तारण अथवा अवैध निर्माण या अतिक्रमण की समस्या का हल नहीं किया जा सकता
पर्यावरण का मुद्दा पृथ्वी पर मानव जाति के अस्तित्व और उसके समस्त क्रियाकलापों से जुड़ा हुआ है। यह आधुनिक संस्कृति, राजनीति और जीवन पद्धति में गहराई से सन्निहित है। वास्तव में यह समस्या आम जन मानस की है और इसे कानून अथवा तकनीक के बल पर नहीं सुलझाया जा सकता। जरूरत है सामाजिक संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन करने की एवं जागरूक होने की। एक ऐसी नयी व्यवस्था विकसित करने की तरफ सोंचना चाहिये जो सर्वोदयी हो एवं दुनिया के तमाम लोगों के जीवन को नया रूप दे सके। एक सहकारी समाज की आवश्यकता है। व्यक्ति गांव से पलायन करके शहर को संकेन्द्रित कर, प्रदूषण फैला रहा है क्यों न गांव को ही स्वर्ग बनाया जाये एवं शहरी आधारगत् सुविधाओं को मुहैया कराया जाये। खेती आधुनिक यंत्रों एवं रासायनिक खादों के बजाय सामूहिक एवं प्राकृतिक होनी चाहिये। गन्ना गांव में होता है तो गुड़ भी गांव में ही बनना चाहिये, सरसों एवं अरहर गांव में पैदा होती है तो तेल एवं दाल वहीं बननी चाहिये। सन गांव में पैदा होती है तो कपड़ा भी गांव में ही बनना चाहिये। गांव-गांव में हो पंचायत एवं गांव-गांव में विश्वविद्यालय बनें ऐसी सोंच आचार्य विनोबा भावे की थी।6
5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस बार की थीम- ‘‘आपके ग्रह पृथ्वी की आपको जरूरत है, जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिये एक हों’’ है। जगह-जगह पर जागरुकता कार्यक्रम चलाये जा रहें हैं। सरकारी, गैर-सरकारी, सामाजिक, शैक्षिक संस्थाओं की ओर से सेमिनार आयोजित किये जाते हैं। भाषणबाजी होती है परन्तु पर्यावरण संरक्षण के लिये न तो कोई ठोस रणनीति बनाई जाती है और न ही नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण का जज्बा ही उत्पन्न हो पाता है। यह सही है कि उत्तरोत्तर पर्यावरण प्रदूषण मानव जाति के लिये खतरा है परन्तु इसके लिये आवश्यक है कि वृक्षों का संरक्षण हो, शहरों में हरियाली हो। वृक्षारोपण और हरियाली ही पर्यावरण को संतुलित कर सकती है। सभी को पर्यावरण बचाने के प्रति गम्भीरता से विचार करना चाहिये।
संदर्भ ग्रन्थ-
1. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार-पत्र, कानपुर संस्करण, दिनांक 5 जून, 2009 पृ0-16।
2. दैनिक जागरण, दैनिक समाचार-पत्र, कानपुर संस्करण, दिनांक 5 जून, 2009 पृ0-16।
3. ग्लोबल ग्रीन, हिन्दी मासिक पत्रिका में डाॅ0 संध्या शास्त्री के लेख ‘‘जहरीली होती हवा’’ से उद्धृत, प्रकाशक इजी ग्लोबल आर्गेनाइजेशन, नोएडा, जून-जुलाई, 2009, पृ0-06
4. भारत का संविधान सेन्ट्रल लाॅ पब्लिकेशन, इलाहाबाद, 2005, पृ0-26
5. ग्लोबल ग्रीन, हिन्दी मासिक पत्रिका में डाॅ0 संध्या शास्त्री के लेख ‘‘जहरीली होती हवा’’ से उद्धृत, प्रकाशक इजी ग्लोबल आर्गेनाइजेशन, नोएडा, जून-जुलाई, 2009, पृ0-26
6. विनोबा, ‘‘ग्राम पंचायत’’, सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी। मई, 1997, पृ0-21
मैत्री मासिक पत्रिका प्रकाशन चन्नम्मा हल्लिकोरी, बृह्मविद्या मन्दिर, पवनार, वर्धा महाराष्ट्र।
योग चिकित्सा सन्दर्शिका, कुमार कामाख्या, प्रकाशन, वेद माता गायत्री ट्रस्ट, शांतिकुंज हरिद्वार।
करेन्ट अफेयर्स रिमाईन्डर 2007, सम्पादक-प्रभात कुमार सिंह प्रकाशक कम्पिटीशन स्पेक्ट्रम, इलाहाबाद।