Friday, 1 January 2010

‘‘आचार्य नरेन्द्र देव और समाजवाद’’


संजय कुमार पाण्डेय
शोध छात्र (राजनीतिशास्त्र),
सतीश चन्द्र काॅलेज, बलिया।


शिक्षा विद्, राजनेता, चिन्तक और समाजवादी आचार्य नरेन्द्र देव के भारत के समाज वादी चिन्तकों में अग्रणी स्थान है। आचार्य नरेन्द्र देव का चिन्तन में ज्ञान, विज्ञान, धरातल, दर्शन आदि का समावेश है। आचार्य नरेन्द्र देव का समाजवाद काल्पनिक समाजवाद अथवा समाज सुधारकों का समाजवाद नहीं था। वे वैज्ञानिक समाजवाद के मनीषी, सिद्धान्तकार और मीमांसक थे। वैज्ञानिक समाजवाद न तो सुधारवाद है और न काल्पनिक समाजवाद। इसे तर्क की कसौटी पर कसा जा सकता है। यह समाज की एक ऐसी नवीन आर्थिक व्यवस्था प्रतिष्ठित करना चाहता है जिसमें उत्पादन के साधन तथा उत्पन्न वस्तुओं का वितरण और विनिमय समाज के हाथ में हो।1
काल्पनिक समाजवादी अथवा मौसमी सुधारक समाजवादी हवा के रुख को देखकर समाजवाद की माला जपने लगते हैं। उन्हें अतीत के स्वर्णयुग में समाजवाद परिलक्षित होता है। उनके अनुसार अतीत का समाज ही एक आदर्श समाज था जिसमें गरीब और अमीर का फर्क नहीं था। प्रजा जन सुखी और समृद्ध थे।2 किन्तु सच तो यह है कि अतीत उतना एैश्वर्य सम्पन्न और आकर्षक नहीं था जैसी कि उसकी परिकल्पना है।3
उस समय की पूंजीवादी पद्धति के दोष के अभाव का अर्थ यह नहीं है कि उस पद्धति में ‘निज की बुराईयां’ नहीं थी। फिर, श्रमिक वर्ग को उनके शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए भी किसी संगठन की प्राचीन समाज में आशा नहीं की जा सकती थी।4 ऐसा ही तर्क पश्चिमी देशों में ईसाई समाजवादियों ने दिया। उन्हें ईसाई धर्म और समाजवाद एक-दूसरे के लिए नितान्त आवश्यक प्रतीत हुए और ईसाई धर्म ही समाजवाद की नैतिक पृष्ठभूमि में लगा। वे तो समाजवाद की व्युत्पत्ति धर्म से ही मानते हैं।5 आचार्य नरेन्द्र देव ने इन निराधार एवं कल्पित विचारों को भ्रमात्मक बताया।6
यह सत्य है कि ‘प्राचीन काल में कई स्थानों पर भूमि व्यक्ति की सम्पत्ति न होकर समाज की सम्पत्ति मानी जाती थी। रूस में ग्राम-संस्थाएं 19वीं शताब्दी तक पायी जाती थी। भारत वर्ष के साहित्य में भी ऐसी संस्थाओं की सत्ता का पता चलता है। तथापि हमको इस भूल में नहीं पड़ना चाहिए कि यह प्राचीन ग्राम-संस्थाएं वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धान्त पर आश्रित थी। उत्पादन के जो तरीके उस समय काम में आते थे, उनसे सम्पत्ति इतनी प्रचुरता में नहीं उत्पन्न हो सकती थी कि समाजवाद के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। समाजवाद का उद्देश्य समाज के धन को सबमें बराबर-बराबर बांटना नहीं है। यदि यही उद्देश्य हो, तो अत्यन्त निर्धन देशों में इस बंटवारे का फल यह होता कि अमीर लोग तो गरीब हो जाते, पर गरीबों की गरीबी दूर नहीं होती। वैज्ञानिक समाजवाद गरीबों की गरीबी दूर करना चाहता है न कि कुछ अमीरों से कुढ़कर उनको तबाह करना।7 एतदर्थ, वैज्ञानिक समाजवाद का प्रारंभ मशीन-युग में होता है मशीन-युग तथा उसमें पैदा होने वाला वर्तमान पूंजीवाद ही वैज्ञानिक समाजवाद का जन्मदाता है।8 मशीन के माध्यम से जो औद्योगिक प्रगति हुई उसने यह सिद्ध कर दिया है कि संसार में विपन्नता, भूख और वस्तुओं के अभाव का कारण स्वल्पता नहीं-बल्कि उत्पादन के साधनों पर कुछ मुट्ठीभर पूंजीपतियों की अधिकार-सत्ता का होना है’, और यह उत्पादन समाजहित की अपेक्षा उनकी स्वार्थ-पूर्ति के लिए होता है। इसलिए प्राचीन काल में चाहे भूमि पर समाज का ही एकाधिकार रहा हो किन्तु समाजवाद अकिंचनता को दूर नहीं कर सकता था और न उस समय सम्पत्ति-वृद्धि का ऐसा कोई साधन ही था।9 जब तक विभिन्न वर्गों में आर्थिक वैषम्य प्रतिष्ठित है तब तक सुखद जीवन की कल्पना असम्भव है। ‘उत्पादन की पूंजीवादी प्रक्रिया मानव-श्रम के गौरव को नष्ट कर देती है।10 पूंजीवादी उत्पादन पद्धति में, श्रमिक उत्पादन साधनों से अलग कर दिया जाता है। श्रमिक के श्रम का भी अन्य व्यापारिक सामग्री के समान ही हाट-मूल्य पर बाजार में विक्रय होता है। श्रमिक द्वारा उत्पादित वस्तु पर उसकी अधिकार-सत्ता नहीं होती। वह नीरस होती है। वह श्रम करने के उपरान्त भी प्रफुल्लित नहीं होता और न ही उसका शारीरिक बौद्धिक विकास हो पाता है।11 पूंजीवादी व्यवस्था में आंतरिक असंगति है। यद्यपि उत्पादन का समाजीकरण हो गया है किन्तु उत्पादन के साधनों पर प्रभुत्व नहीं रहेगा और उन पर सम्पूर्ण समाज का स्वामित्व हो जाएगा तब पूंजीवाद में प्रतिष्ठित आन्तरिक विषमता का अन्त हो सकेगा।12
आचार्य नरेन्द्र देव का प्रभाव:
आचार्य नरेन्द्र देव का कथन था कि यदि हम मशीन-युग के दोषों से मुक्ति चाहते हैं तो इसका यह ढंग नहीं है कि हम अतीत की ओर देखें और औद्योगिक प्रगति को विनष्ट कर संसार की निर्धनता तथा उत्पीड़न को और बढ़ा दें। वैज्ञानिक समाजवाद ही इन दोषों की एक मात्र रामबाण औषधि है।13
आज मानव को रोटी, शान्ति और स्वतंत्रता तीनों ही वांछनीय है इनकी उपलब्धि समाजवाद की स्थापना द्वारा ही सम्भव हो सकती है। ‘मानव समाज का उद्धार समाजिक शक्तियों के ऐसे नवीन संगठन द्वारा हो सकता है जो मनुष्य को उन साधनों का मालिक बनाये जो उनको जीवन प्रदान करते हैं।14 जब औद्योगिक व्यवसाय का संगठन समाज-कल्याण के लिए होगा और उत्पादन के सम्पूर्ण साधनों पर व्यक्ति की अपेक्षा समाज का एकाधिकार होगा तो एक सी स्थिति में समाज वस्तुओं का उत्पादन अपनी आवश्यकतानुसार ही करेगा जिससे समाज के प्रत्येक सदस्य को शक्तियों के विकास के अवसर उपलब्ध हो जाए। उत्पादित वस्तुओं के वितरण एवं विनिमय का कार्य जब समाज द्वारा किया जाएगा तो समाज में अकिंचनता और अशान्ति नहीं रहेगी ा15
आचार्य नरेन्द्र देव ने उत्पादन के साधनों को सामाजिक सम्पत्ति बनाए जाने से उत्पन्न दोष पर भी विचार किया। उन्हें भय था कि नौकरशाही की अधिकार-सत्ता इससे बढ़ेगी। यह नहीं बढे़ इसके लिए उपाय करने होंगे। ऐसे नियमों का निर्माण करना होगा जिससे जन-नियंत्रण बने। औद्योगिक व्यवसाय के प्रबन्ध में एकमात्र राज्य के प्रभुत्व से ही आचार्य नरेन्द्र देव सन्तुष्ट नहीं थे अपितु उन्होंने श्रमिक वर्ग को पर्याप्त भागीदार बनाए जाने पर बल दिया। कुछ व्यवसायों का संचालन वे स्वायत्त संस्थाओं द्वारा कराए जाने के पक्षधर थे।
नरेन्द्र देव के लिए ‘मानवता ही समाजवाद का आधार है’। समाजवाद जितना अर्थिक स्वतंत्रता बल देता है उतना ही वह व्यक्तिगत-स्वातंत्र्य के विकास पर भी बल देता है। व्यक्तित्व का पूर्णतः विकास समाजवादी समाज में ही हो सकता है। ‘समाजवाद मानव स्वतंत्रता की कुंजी है’।16 एक स्वच्छन्द और सौख्यपूर्ण समाज में सम्पूर्ण स्वतंत्र मानवत्व की प्रतिष्ठा समाजवाद के द्वारा ही हो सकती है। ‘समाजवाद ही श्रेणी-नैतिकता तथा मत्स्य न्याय के बदले जनप्रधान नैतिकता तथा सामाजिक न्याय की स्थापना कर सकता है।17 समाजवाद ही एक सुन्दर, सशक्त मानव-संस्कृति का जिसका आधार स्वच्छन्दता, समानता एवं बन्धुत्व हो, निर्मित कर सकता है। समाजवादी का साध्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो परस्पर विरोधी एवं शोषित आर्थिक वर्ग-विहीन हो और जो सहयोग के आधार पर संगठित मानवों का सच्चा लोकतंत्र बने।18 समाजवाद पूर्ण लोकतंत्र को पुष्ट करता है।19 समाजवाद का लक्ष्य विश्व-स्वतंत्रता है। वह व्यक्तित्व-विकास के मार्ग में अवरोधक सामाजिक बन्धनों से उसे मुक्त करना चाहता है। समाजवाद शोषण-विहीन समाज का निर्माण कर वर्तमान समाज के दासत्व, वैषम्य और असहिष्णुता का सदैव के लिए उन्मूलन कर स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व भावना को वस्तुतः प्रतिष्ठित करना चाहता है।20 आचार्य नरेन्द्र देव की दृष्टि में समाजवाद अन्ततोगत्वा वर्ग-विहीन समाज की स्थापना करना चाहता है। वह अस्तित्वपूर्ण समाज के ढांचे को इस प्रकार निर्मित करना चाहता है जिसमें शोषक एवं शोषित, उत्पीड़क एवं उत्पीडि़त वर्गों का मूलतः अन्त हो जाए और वह सहयोग पर आधारित संगठित मानवों का ऐसा समाज बन जाए जहाँ एक की प्रगति का अर्थ सभी की प्रगति हो और सभी सामूहिक रूप से प्रगति करते हुए अपना जीवन-यापन कर सकें।21 समाजवाद ऐसे शोषण-विहीन और स्वतंत्र समाज की स्थापना करना चाहता है जिसमें मानव अपना इस सामथ्र्यहीन परिधि से ऊपर उठ सके तथा सामाजिक विकास को नियंत्रित कर सके। कार्ल माक्र्स के मतानुसार, ‘समाजवापद मनुष्य को विवशता के क्षेत्र से हटाकर स्वाधीनता के राज्य में ले जाना चाहता है।22
आचार्य नरेन्द्र देव ने यह अंगीकार किया था कि समाजवाद द्वारा प्रत्येक प्रकार की समानता स्थापित नहीं हो सकती। जिनका ऐसा विश्वास है यह उनकी भूल होगी। समाजवाद पूर्ण समानता प्रतिष्ठित किए जाने का दावा नहीं करता। समाजवादी समाज के सदस्यों में बौद्धिक एवं शारीरिक विभेद रहेगा। समाजवादी समाज में कुछ पेशे न्यून हो सकते हैं, जैसे सेनाओं की आवश्यकता नहीं पड़ेगी किन्तु समाज को भलीभांति चलाने के लिए तो श्रम-विभाजन आवश्यक होगा। और फलतः पेशे भी आवश्यक होंगे।
एक समाजवादी वर्गों का उल्लेख उत्पादन सम्बन्धों को दृष्टि से करता है। वर्ग या सामाजिक वर्ग उन व्यक्तियों का समूह है जो सामाजिक उत्पादन में एक प्रकार का कार्य करते हैं और उत्पादन क्रम में लगे हुए दूसरे व्यक्तियों के साथ उनका सम्बन्ध भी एक ही जैसा होता है। यह एक-सा सम्बन्ध स्रम के साधनों के सम्बन्ध में भी लागू है क्योंकि सामाजिक उत्पादन में आर्थिक वस्तुओं के उत्पादन में इनका भाग समान है। ये उत्पादन-साधनों के स्वामी नहीं है और उनका अपने स्वामी के प्रति सामूहिक रूप से एक-सा सम्बन्ध है।
पूंजीपति वर्ग भी विभिन्न औद्योगिक क्रिया-कलापों को सम्पादित करते हुए उत्पादन-क्रम में समान भाग रखते हैं। इन सभी की उत्पादन के साधनों पर अधिकार सत्ता है और श्रमिक के श्रम को खरीदते हैं और अतिरिक्त मूल्य को लेते हैं- उत्पादन-क्रम में रत अन्य समूहों के साथ उनका सम्बन्ध समान है। दोनों वर्ग जिनमें एक का उत्पादन-साधनों पर एकाधिकार है और अन्य जो इस विशेषाधिकार से वंचित है परस्पर विरोधी है। एक स्वामी है तो दूसरा दास है। दोनों के बीच वर्ग-युद्ध है। प्राचीन काल में ये वर्ग स्वामी और दास, मध्यकाल में सामन्त और अर्द्ध-कृषक और आज पूंजीपति तथा श्रमिक। समाज में अन्य वर्ग भी है किन्तु इन वर्गों का स्वार्थ इन मूलभूत वर्गों के स्वार्थ से भिन्न नहीं है। नरेन्द्र देव का कथन है कि समाज के भीतर विभिन्न कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए श्रम-विभाजन मौजूद रहेगा और फलस्वरूप अनेक पेशे भी होंगे। समाजवाद जिस नई सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करता है उसमें आजकल की भांति भीषण आर्थिक विषमताएं न पाई जाएगी।23 किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं है कि समाजवाद आर्थिक एकरूपता स्थापित करना चाहता है। समाजवादी समाज में पूर्ण एक रूपता तथा पूर्ण समाज लाने का वायदा नहीं किया जा सकता।24 समाजवादी यह अवश्य करेगा कि शोषक वर्ग का अन्त करके, असमानता का आर्थिक आधार नष्ट कर देगा और सबको अवसर की समानता प्रदान करेगा।25 समाजवाद का आदर्श हर व्यक्ति से उसकी योग्यतानुसार काम लेकर उसकी आवश्यकतानुसार उपभोग की वस्तुओं का प्रबन्ध करना है।26
माक्र्स ने कहा था कि ‘‘मानव-समाज का उद्धार सामाजिक शक्तियों के ऐसे नवीन संगठन द्वारा हो सकता है जो मनुष्य को उन साधनों का मालिक बनाये जो उनको जीवन प्रदान करते हैं। अतएव समाजवाद व्यक्तिगत सम्पत्ति का उन्मूलन चाहता है क्योंकि यह श्रमिक को अपने श्रम से पृथक करती है और तभी मानव-समाज मानवता के गुणों से संयुक्त किया जा सकता है। सच्ची मानवता की प्राप्ति तभी हो सकती है।
पूंजीवादी राज्य में मानव को राजनीतिक स्वतंत्रता है किन्तु यह स्वतंत्रता पूंजीवादी समाज का सदस्य और राज्य का नगरिक बन जाने की स्वतंत्रता है। आधुनिक राज्य मानव के साधारण अधिकारों को स्वीकार करता है किन्तु व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार नहीं देता। राजनीतिक दृष्टि से राज्य ने शिक्षा और व्यवसाय के विभेद का भी अन्त कर दिया क्योंकि सभी को समान अधिकार दिए। धर्म ने भी उसी का औचित्य सिद्ध किया। राज्य मानव के भौतिक जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वह उसके सामाजिक जीवन का ही मुख्यतः प्रतिनिधित्व करता है। जब राज्य मानव के साधारण अधिकारों को स्वीकार करता है तो उसका अभिप्राय केवल पूंजीवाद समाज के व्यक्ति के अस्तित्व, मानव-जीवन के बौद्धिक एवं भौतिक अवयवों की निर्बाध गति की स्वीकृति से है। इस प्रकार राज्य न तो धार्मिक दासता से मुक्ति दिलाता है और न मताधिकार के प्रदान करने में सम्पत्ति, जन्म और व्यवसाय के कृत्रिम अन्तर को ही मिटाता है। इस प्रकार राजनीतिक स्वातंत्र्य मानव-मुक्ति का प्रतीक नहीं है। मनुष्य स्वतंत्रता का उपभोग तभी करेगा जब उसका जीवन अखण्डित हो, उसके जीवन में बौद्धिक एवं भौतिक अवयव पृथक हों वह एक सामाजिक प्राणी के रूप में अपनी नैसर्गिक शक्तियों को सामाजिक शक्तियों में संगठित करे और उन्हें राजनीति-सत्ता के रूप में स्वयं से अपृथक करे।
लेनिन की भांति आचार्य नरेन्द्र देव भी आतंक एवं षड्यंत्र को क्रान्ति का अंग नहीं मानते थे। उन्होंने क्रान्ति के लिए संगठित सशस्त्र संघर्ष को जनतांत्रिक साधनों के अभाव में ही उचित माना और प्रत्येक परिस्थिति में सशस्त्र क्रान्ति करना अमान्य ठहराया। उन्होंने विप्लववाद को लेनिन के समान ही त्याज्य बताया। यह कभी भी सफल नहीं होता तथा लक्ष्य को हानि पहुंचाता है। लेनिन के अनुरूप ही उन्होंने जनतंत्र का मूल्यांकन किया। नरेन्द्र देव की लेनिन के इन कतिपय विचारों की स्वीकृति से हम यह निष्कर्ष निकालें कि माक्र्सवादी होने की अपेक्षा लेनिनवादी अधिक थे, भूल होगी। वस्तुतः नरेन्द्र देव तो जीवन पर्यन्त माक्र्सवाद के निष्ठावान शिष्य बने रहे, उसका विकास करते रहे, उसकी मीमांसा करते रहे और उसका औचित्य सिद्ध करते रहे। जब सर्वोदय अथवा भूदान आन्दोलन की गंगा इस देश में बही और माक्र्सवाद के अनन्यतम शिष्य जयप्रकाश नारायण भी इस ओर मुड़ गये तो नरेन्द्र देव को किंचित मात्र भी अपनी माक्र्सवादी निष्ठा से डिगते नहीं देखा बल्कि सोशलिस्ट पार्टी के क्रिया-कलापों को विशुद्धतः माक्र्सवादी सिद्ध कर उन्होंने आलोचकों के मुँह बन्द कर दिए। वे माक्र्सवादी थे ‘पर उनका माक्र्सवाद रूसी कम्युनिज्म और कट्टरता का सहचर नहीं था। वह हर दर्शन की तरह माक्र्सवादी दर्शन को भी विकासशील मानते थे और उसके विकास में योगदान दिया था। एक तो उन्होने उदात्त राष्ट्रीयता और समाजवाद के समन्वय पर जोर देकर, और उत्तरदायी व्यापक राष्ट्रीयता को समाजवाद का अंग बनाकर माक्र्सवाद की एक बड़ी समस्या का समाधान किया। दूसरे उन्हांेने कृषि क्रान्ति समाजवादी क्रान्ति के योग पर जोर देकर और समाजवादी क्रान्ति के लिए मजदूरों और किसानों के संयुक्त मोर्चों की जरूरत बताकर तथा समता के आधार पर किसानों और मजदूरों के पारस्परिक सम्बन्ध कायम करने का पाठ पढ़ाकर माक्र्सवाद की दूसरी बड़ी समस्या का समाधान किया। उन्होने जनतांत्रिक विकेन्द्रीकरण, औद्योगिक जनतंत्र और अर्द्ध-स्वतंत्र कारपोरेशनों द्वारा समाजीकृत उद्योगों की व्यवस्था के सिद्धान्तों का माक्र्सवाद में प्रवेश कर उसे व्यापक और जनतांत्रिक रूप प्रदान किया और जनतांत्रिक केन्द्रवाद के सर्वसत्तावाद और केन्द्रित नौकरवाद से उसकी रक्षा की। राज्य में जनतांत्रिक भावनाओं को जागृत, सुदृढ़ और व्यापक बताते हुए जनतांत्रिक उपायों से, जिससे सत्याग्रह और हड़ताल भी शामिल है, समाजवादी समाज बनाने पर जदेकर, उन्होने माक्र्सवाद के जनतांत्रिक स्वरूप को निखारा और पुष्ट किया और उसे व्यक्ति-पूजा और दल-अधिनायकत्व द्वारा विकृत किए जाने से बचाया। दीर्घकालीन नैतिक मूल्यों का और सामान्यशील का पालन माक्र्सवादियों के लिए भी जरूरी बताकर मानवता को माक्र्सवाद का आधार स्वीकार कर और माक्र्सवादी समाज के नैतिक मूल्यों का विश्लेषण कर माक्र्सवाद के नैतिक स्वरूप को पुष्ट किया और उसके नैतिक भण्डार को परिपूर्ण किया। समाजवादी संस्कृति के कतिपय मूल तत्वों की व्याख्या कर और उसे समाजवादी समाज के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग बनाकर उन्होने माक्र्सवाद के सांस्कृतिक लक्ष्य की अभिवृद्धि की। उनका कथन था, ‘माक्र्सवाद कोई अटल सिद्धान्त नहीं है। जीवन की गति के साथ वह भी बदलता है। इसकी विशेषता इसका क्रान्तिकारी होना है। माक्र्स की शिक्षा में हेरफेर करना उस समय तक संशोधनवाद नहीं है जब तक आप इस परिवर्तन से उसके क्रान्तिकारी तत्व को सुरक्षित रखते हैं माक्र्सवाद को एक जिन्दा शास्त्र मानने में ही उसका गौरव है। वस्तुतः आचार्य नरेन्द्र देव ने कार्लमाक्र्स के मानवतावादी तत्व और जनवादी तत्वों को पोषित एवं विकसित किया। समाजवादी नेता प्रेम भसीन का विचार है कि ‘आचार्य नरेन्द्र देव के लिए माक्र्सवाद कभी भी एक सिद्धान्त नहीं रहा। उनके लिए वह एकमात्र गति के लिए पथ-निर्देशक रहा और माक्र्सवाद की आत्मा और अनिवार्य वस्तु से निर्देशित होते हुए वे सन् 1950 तक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लोकतांत्रिक समाजवाद माक्र्सवादी विचार का साम्यवाद होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। माक्र्स अनियंत्रित जनतंत्र का महानतम समर्थक था। जनतंत्र के बिना समाजवाद पर विचार करना असम्भव है। उनके लिए माक्र्सवाद एक विज्ञान’ था और यह रोमांसवाद का पूर्णतः विरोधी था। आचार्यजी समाजवाद के नवीनतम संस्कार के अनुयायी हैं जो कि बौद्धिक रूप में कार्लमाक्र्स की पुस्तकों में विराजमान है और व्यवहार रूप में लेनिन की सृष्टि में सम्भवतः दीख पड़ता है। किन्तु वास्तविकता यह है कि उनका दर्शन मूलतः माक्र्सवादी है और कार्य-प्रणाली में माक्र्स-लेनिन की पुट है। यह प्रणाली भी माक्र्स के विचारों से विचलन की प्रतीक नहीं है। वे तो ‘प्रजा समाजवादी पार्टी को माक्र्सवादी दल बनाने के पक्ष में थे।’ नरेन्द्र देव का विचार है कि माक्र्स का शान्तिपूर्ण साधनों में विश्वास था। माक्र्स ने सन् 1872 में यह स्वीकार किया था कि हालैण्ड और अमेरिका में शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा समाजवाद की स्थापना हो सकती है। ऐसा होना अन्यत्र सम्भव नहीं है। माक्र्स की मृत्यु के तीन वर्ष के उपरान्त, एंजेल्स ने भी इंग्लैण्ड में शान्तिपूर्ण समाजवादी क्रान्ति का समर्थन किया था। लेनिन ने भी यही का था कि माक्र्स के समय में यह मत सर्वथा उचित था किन्तु सन् 1917 में इसकी संभावना नहीं रही।27 माक्र्स ने पार्टी के अधिनायकत्व की अपेक्षा अधिनायकत्व का प्रतिपादन किया था। इसलिए आचार्य नरेन्द्र देव के मतानुसार, दो बातें स्पष्ट है। एक यह कि अधिनायकत्व शोषितों का हो, पार्टी का नहीं और दूसरे यह कि ज्यों ही उद्देश्य पूरा हुआ अधिनायकत्व का अन्त होना चाहिए।
संदर्भ ग्रन्थ
1. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-725
2. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-720,721
3. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-721
4. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-721
5. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-720,721
6. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-722
7. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-722,723
8. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
9. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
10. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-723
11. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-725
12. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
13. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
14. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
15. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
16. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
17. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
18. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-5
19. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-4
20. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-7
21. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-8
22. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-7
23. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘समाजवाद लक्ष्य तथा साधन’’ पृ0-14
24. लाल, प्रो0 मुकुट बिहारी: आ0 नरेन्द्र देव-युग और नेतृत्व, पृ0-476
25. देव, आचार्य नरेन्द्र: ‘‘राष्ट्रीयता और समाजवाद’’ पृ0-413-414