Friday, 1 January 2010

प्रारंभिक बौद्ध साहित्य में वर्णित धातु-शिल्प


मनोज कुमार दुबे 
शोध छात्र, प्रा0 इति0,सं0 एवं पुरा0 विभाग,
इलाहाबाद विश्वविद्या0 इलाहाबाद।

प्रारंभिक बौद्ध साहित्य (5वीं शताब्दी ई0पू0) अपने समय में प्रचलित व्यावसायों, शिल्पों एवं उद्योगों की स्थिति पर विस्तृत प्रकाश डालता है। इससे स्पष्ट होता है कि लोंगों ने अनेक शिल्पों/व्यावसायों में प्रवीणता हासिल की तथा जीविकोपार्जन के नवीन साधनों का जन्म हुआ। शिल्पकार स्थानीय वर्ग के रूप में स्थापित हो रहे थे। प्रायः लोग पैतृक व्यवसाय का ही अनुसरण करते थे, लेकिन यह कोई निश्चित नियम नहीं था। सुत्त पिटक में एक ऐसे क्षत्रिय का उल्लेख है, जो पहले कुम्भकार था, बाद में उसने रसोइये एवं मालाकार का व्यवसाय अपनाया।
भिन्न-भिन्न शिल्पों (विद्या/कला) को सीख कर लोग उसे जीवन यापन के साधन के रूप में अपनाते थे। भगवान बुद्ध ने कहा था दस ऐसी बातें हैं, जिसे पहले न करके पीछे आदमी पछताता है।1 ’’सक्य रूपं पुरे सन्तं मया सिप्पं न सिक्खितं, किच्छा बुत्ति असिप्पस्स इति पच्छानुपत्ति’’ अर्थात् पहले मैंने सामथ्र्य रहते कोई शिल्प नहीं सीखा, शिल्प रहित का जीविका चलाना कठिन होता है, सोच बाद में वह पश्चाताप करता है। युवक जीवक कौमार भृत्य ने विचार किया ’’बिना शिल्प के जीविका करना मुश्किल है, क्यों न मैं शिल्प सीखूँ’’। ऐसा विचार कर जीवक अभय राजकुमार की बिना आज्ञा लिये सुविख्यात वैद्य से वैद्यक शिल्प की शिक्षा लेने राजगृह से तक्षशिला के लिये प्रस्थान किया।2
प्रारंभिक बौद्ध साहित्य में जिन प्रमुख धातु शिल्पों एवं धातु कर्मों का विवरण हमें प्राप्त होता है, वे इस प्रकार हैं-1. लौह धातु कर्म, 2. सुवर्ण धातु कर्म, 3. रजत धातु कर्म, 4. ताम्र धातु कर्म, 5. कांस्य धातु कर्म, 6. सीसा धातु कर्म, 7. त्रपु (रांगा) धातु कर्म।
बौद्ध ग्रंथों में मुख्यतः विनय पिटक से ज्ञात होता है कि लौह पात्रों का बौद्ध भिक्षुओं के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था। भगवान बुद्ध ने स्थान-स्थान पर बौद्ध भिक्षुओं को बहुमूल्य धातुओं से दूर रहने एवं लौह तथा मिट्टी के पात्रों के उपयोग की अनुमति दी है। ’’भिक्षुओ सुवर्णमय पात्र धारण नहीं करना चाहिये, रौप्यमय, मणिमय, वैदूर्यमय, स्फटिकमय, कांसमय, कांचमय, सीसमय, ताम्र-लोह का ..... दुष्कृत....। भिक्षुओं लोहे और मिट्टी के दो पात्रों की अनुश्रा देता हूँ’’।3 बुद्ध ने लोह कुंभ, लोह भाणक, लोह वारक, लोह कटात, वासी, फरसा, कुदाल, निखादन (रखने का औजार) भिक्षुओं को अपने पास रखने की अनुमति दी थी।4 वैदिक साहित्य में पानी इकठ्ठा करने के लिये ’कुम्भ’ नाम के पात्र का उल्लेख प्राप्त होता है। भिक्षुओं द्वारा प्रयुक्त लोह कुम्भि सम्भवतः घट आकृति का पात्र रहा होगा।5
जातक6 एवं सुत्तनिपात7 में विशाल आकृति की लोह कुम्भी में अपराधियों को दण्ड स्वरूप लटकाये जाने का उल्लेख मिलता है। दीर्घनिकाय के महापरिनिब्बाण सुत्त में भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपरान्त उनके शरीर को रखने के लिये लोहमय द्रोणी का उल्लेख मिलता है।8 लौह कृषि उपकरणों में फाल, फरसा, कुदाल, कुल्हाड़ी का उल्लेख मिलता है।9 लोहे के हथियारों का भी वर्णन मिलता है, जैसे- बर्छी,10, कूट,11 बाण,12 कवच,13 तलवार,14 शूल15 आदि। धम्मपद में उसुकार द्वारा आग में तपाकर बाण को एकदम सीधा व तीक्ष्ण बनाने का उल्लेख आया है।16 लोहे का काम करने वालों को कम्मार कहा जाता था। कभी-कभी ये लोहार बहुत बड़ी संख्या में एक स्थान पर रहते थे। इस गाँव से लोहे के विविध उपकरण, शस्त्र आदि आस-पास के क्षेत्रों में जाते थे।17
सुवर्णकार एवं उसके द्वारा निर्मित विभिन्न प्रकार की बस्तुओं पर प्राचीन पालि साहित्य से प्रकाश पड़ता है। प्रारंभिक पालि साहित्य में सुवर्ण बोधक शब्द के रूप में हिरण्य, जातरूप, कंचन, श्रृंगी, हाटक, हेम, कम्बु एवं निष्क का प्रयोग मिलता है। उपयोग की दृष्टि से इन्हे दो भागों में विभाजित किया गया है- 1. सम्पत्ति मूलक सुवर्ण धनराशि 2. मुद्रा सूचक सुवर्ण धनराशि। अंगुत्तर निकाय में प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त मिट्टी धूलादि कणों से युक्त सुवर्ण कण का प्रारंभिक रूप में दो अवस्थाओं में शुद्ध किये जाने का उल्लेख प्राप्त होता है।18 उपरोक्त उल्लेखों से ज्ञात होता है कि प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त सुवर्ण को मूल धातु के रूप में प्राप्त कर लिया जाता था, किन्तु वह साफ नहीं होता था। सुवर्णकार द्वारा गेरू व नमक द्वारा सुवर्ण धातु को शोधित किये जाने का संदर्भ प्राप्त होता है। ’’अंगीठी होने से, नमक होने, गेरू होने, सण्डसी होने, उसके साथ आदमी का प्रयास होने से मलिन सोना क्रमशः शुद्ध होता है।19 इस प्रकार सुवर्ण को साफ कर उपयोग हेतु तैयार किया जाता था।
उल्लेखों से ज्ञात होता है कि रजत धातु से निर्मित वस्तुओं का प्रयोग समाज का दोनों वर्ग अर्थात् धनाढ्य व गरीब करता था अर्थात् यह सर्व-प्रचलित धातु थी। दैनिक जीवन में रजतमय पात्रों के प्रयोग की स्पष्ट सूचना हमें प्राप्त होती है। राजगृह के भिक्षु बहुमूल्य स्वर्ण एवं रजत धातु से निर्मित पात्र उपयोग में लाते थे जिनका व्यवहार उनके लिये विहित नहीं था।20 पालि ग्रंथों मंे रजत् धातु संबंधी विवरणों में धनराशि के रूप में रजत के उल्लेखों का बाहुल्य है। धनराशि के रूप में इसे दो प्रकार से व्यवहृत किया था- 1. सम्पत्ति मूलक रजत धनराशि 2. मुद्रा सूचक रजत धनराशि।
व्यवहार में प्रचलित तथा संख्यावाची रजत धनराशि को उपयोग में लाये जाने के उल्लेख मिलते हैं। चुल्ल-वग्ग में रजत की व्यवहार में प्रचलित मुद्रा को कहापण कहा गया है, जो ताम्र के मासक, हड्डी , लाख एवं दारू के मासक के समान दैनिक व्यवहार में प्रचलित थी।21 उल्लेखों से ज्ञात होता है कि सहस्रों की संख्या में कहापण बुद्ध के जन्मोत्सव पर बरसाये गये।22
’अयस्’ शब्द को यद्यपि धातु बोधक लौह तथा ताम्र के अर्थ में उल्लिखित किया गया है, किन्तु संदर्भ विशेष के आधार पर स्पष्ट है कि ‘अयस्’ शब्द को इस काल में प्रायः लौह सूचक अर्थों में ही प्रयुक्त किया गया है। दीर्ध निकाय क महापरिनिब्बाण सुत्त में कहा गया है कि ‘‘तेल की लोह द्रोणी में रखकर....... ऐसा सम्भवतः भगवान बुद्ध के महापुरुषल के कारण कहा गया है, जो उचित प्रतीत होता है।23 पालि ग्रंथों में ताम्र को लाल रंग का कहा गया है। प्रायः ताम्र की उपमा रक्त वर्ण नेत्रों से की गयी है। भिक्षुओं के संदर्भ में प्रायः ताम्र पात्रों का ही उल्लेख मिलता है। ताँबे के तकनीकी पक्ष पर भी पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। प्रारंभिक पालि ग्रंथों में ताँबे के प्रगलन के विषय में कहा गया है कि ‘‘पिघला हुआ ताँबा जितना कष्ट देता है, कामभोगों का दुःख उससे भी कष्टकर होता है।’’24
लगभग 3000 ई0 पू0 से ही भारत में कांस्य धातु के प्रयोग का साक्ष्य उपलब्ध होता है। मूलधातु में 5प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक रांगे का मिश्रण कर कांसे को तैयार किया जाता था। (मूलधातु ताँबा क साथ रांगे को मिश्रित कर) इसे घण्टिका धातु के नाम से भी सम्बोधित किया जाता था। कसि भारद्वाज नामक ब्राह्मण ने भगवान बुद्ध के सत्कार में ‘एक बहुत बड़ी काँसे की थाली में खीर परस कर दिया।’’25 दीघ निकाय के महासुदस्सन सुत्त में एवं अंगुत्तर निकाय के वेलाम सुत्त में दुग्धधारी काँसे की घण्टी पहने गायों को दान में दिये जाने का उल्लेख प्राप्त होता है।26 काँस्यकार को धातुकार सूचक कम्मार तथा कंसपत्थकारिका आदि नामों से सम्बोधित किया जाता था, तथा ये ही काँस्य वस्तुओं का निर्माण एवं विक्रय करते थे।
काले रंग की अत्यधिक चमकदार धातु सीसे को अति प्राचीन काल से ही कांस्य ताम्र वस्तुओं के निर्माण में उपयोग में लाने के साक्ष्य प्रापत होते हैं जिन्हे हम पुरातात्विक प्रमाणों से भी पुष्ट कर सकते हैं। महावग्ग में बौद्ध भिक्षुओं को बहुमूल्य धातु से बने पादुकाओं का प्रयोग न करने के संदर्भ में सीसे से बनी चरण पादुका का उल्लेख प्रापत होता है।27 चुल्लवग्ग में राजगृह के षणवर्गीय भिक्षुओं का सीसेमय पात्र का प्रयोग न करने के निर्देष दिये गये हैं।28 पालि ग्रंथों से सीसे की शोधन प्रक्रिया एवं मिश्रित सुवर्ण तैयार किये जाने में सीसे को उपयोग में लाये जाने के उल्लेख प्राप्त होते हैं। अंगुत्तर निकाय के उपोसथ सुत्त में मैले सीसे को शोधित करने की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है।29 सीसे का मिश्रण सुवर्ण धातु में भी किया जाता था, जिससे सुवर्ण को शुद्धता प्रभावित होती थी। ‘‘लोहा, ताँबा, वंग, सीसा, चाँदी इन पाँच धातुओं से तैयार सुवर्ण न तो मृदु होता है, न कोमल होता है, न ठोस, न प्रभास्वर, और न ही कमाया जा सकने वाला होता है।’’30
भारत में प्राचीन काल से ही काँसे के निर्माण में त्रपु अर्थात् रांगे की धातु का उपयोग प्रमुख रूप से किया जाता था। ताम्र वस्तुओं को कठोरता प्रदान करने के लिये उसमें त्रपु धातु को मिलाया जाता था। विनय पिटक में बौद्ध भिक्षुओं को बहुमूल्य धातु के पात्रों को उपयोग न करने के संदर्भ में रांगे मय पात्र का भी उल्लेख मिलता है।31राँगे को सुवर्ण में भी मिश्रित किया जाता था परंतु इसे सोने की मैल कहा गया है।32 इस प्रकार प्रारंभिक पालि साहित्य में लगभग समस्त धातुओं से सम्बन्धित विस्तृत विवेचन हमें प्राप्त होता है।
संदर्भ ग्रन्थ
1. जन संघ जातक, जातक संख्या-468, पृ0 168
2. विनय पिटक, महावग्ग, 8/1/1, पृ0 267 (हिन्दी अनुवाद)
3. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, 5/1/10, पृ0 423(हिन्दी अनुवाद)
4. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, 6/1/3, पृ0 47(हिन्दी अनुवाद)
5. सिंह शिवाजी, ‘वैदिक लिटरेचर आॅन पाटरीज़ इन एंशिएंट इंडिया’, पृ0 304
6. जातक संख्या-54, पृ0 210
7. सुत्त निपात, कोकालिक सुत्त, 3/10
8. दीघ निकाय, महावग्ग, महापरिनिब्बाण सुत्त, पृ0 415
9. सुत्त निपात, 1/8
10. कोकालिक सुत्त, पृ0 71 (हि0 अनु0)
11. सुत्त निपात, पृ0 176 (हि0 अनु0)
12. धम्म पद, पंडितवग्गो, पृ037
13. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 3, पृ0 253
14. असिलखक्या जातक, जातक संख्या, 216
15. महानारद कास्यप जातक, जातक संख्या, 544
16. धम्मपद, पंडित वग्गो, पृ0 37
17. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, पृ0 236
18. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 1, पृ0216
19. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 1, पृ0 176
20. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, 5/1/10
21. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, पृ0 16, (हि0 अनु0)
22. धम्मपद, पृ0 118, (हि0 अनु0)
23. प्रिया श्रीवास्तव, ‘प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में वर्णित धातु एवं धातु कर्म, पृ0 224
24. पानीय जातक, जातक संख्या, 456
25. सुत्त निपात, 1/4
26. दीर्घ निकाय, खण्ड 2, पृ0 157 (हि0 अनु0)
27. विनय पिटक, महावग्ग, पृ0 206-10
28. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, पृ0 225
29. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 2, पृ0 215, (हि0 अनु0)
30. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 2, पृ0 286, (हि0 अनु0)
31. विनय पिटक, चुल्लवग्ग, पृ0 441 (हि0 अनु0)
32. अंगुत्तर निकाय, खण्ड 2, पृ0 286, (हि0 अनु0)