Tuesday, 31 March 2009

सात्र्रीय नीतिशास्त्र में ईश्वर का स्थान


अमित यादव
शोध छात्रा, दर्शन एवं धर्म विभाग,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।


             अस्तित्ववादी विचारक जाॅन पाल सात्र्र ने मनुष्य को अस्तित्ववादी चेतन सत के रूप में स्वीकार कर उसके जीवन के प्रत्येक पक्ष और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार कर अपना मत प्रस्तुत किया। सात्र्र के अस्तित्ववादी विचार का दर्शन सबसे पहले उनकी साहित्यिक रचनाओं में होता है किंतु एक अस्तित्ववादी दार्शनिक कृति के रूप में उनका ग्रंथ ‘बीइंग एण्ड नथिंगनेस’ 1943 में प्रकाशित हुआ जिसमें इन्होंने मानव जीवन से जुड़ी समस्याओं पर अस्तित्ववादी समाधान प्रस्तुत किया है।
मनुष्य सात्र्र के लिए क्या है? यह जानने के उपरांत ही यह निर्णय किया जा सकता है कि सात्र्र के नीतिशास्त्रीय अथवा नैतिकता के संदर्भ में क्या मत है और किसी मानववाह्य आध्यात्मिक सत्ता के साथ उसका क्या सम्बन्ध है। इस संदर्भ में सात्र्र का सत्ता सम्बंधी मत अत्यंत प्रासंगिक है जिसमें इन्होंने मनुष्य को ‘पोर-सोई’ की संज्ञा दी है, इसे अंग्रेजी में ‘बीइंग फार इटसेल्फ’ कहते हैं जिसका तात्पर्य है स्वनिमित्त सत होना। इसके अतिरिक्त अन्य सांसारिक भौतिक वस्तुओं को सात्र्र ‘एन-सोई’ की संज्ञा देता है जिसे अंग्रेजी में ‘बीइंग-इन-इटसेल्फ’ कहा जाता है जिसका तात्पर्य है- अपने आप में सत। एन-सोई का एकमात्र गुण इसका अस्तित्व है। सात्र्र के लिए अचेतन सत बेतुका, अर्थहीन है। मनुष्य अपने प्रयोजनानुसार इनको सार्थक बनाता है।
सात्र्र ने पोर-सोई या बीइंग फार इटसेल्फ को और स्पष्ट करते हुआ कहा है कि ‘‘अपने लिए सत्ता एक ऐसा सत् है, जिसके होने में उसका सत् एक प्रश्न है, वह सत् एक प्रकार से सत् नहीं है। सत् तो उससे भिन्न है, जिसे चेतना निर्दिष्ट करती है।’’1 अर्थात् चेतना द्वारा निर्धारित सत ही मानव अस्तित्व का परिचायक है। चेतना के संदर्भ में सात्र्र का कहना है कि चेतना पूर्णतया अस्तित्वमय है और अपने द्वारा ही अपना निर्धारण उसकी मूल प्रवृत्ति है।2 इस प्रकार सात्र्र का पोर-सोई अथवा बीइंग फार इटसेल्फ चेतनायुक्त अस्तित्ववान मनुष्य है। सात्र्र ने मनुष्य को स्वनिमित्त-सत ;ठमपदह वित पजेमसद्धि एवं अपने में सत ;ठमपदह पद पजेमसद्धि का समुच्चय कहा है। ‘अपने में सत’ उसका भौतिक पक्ष है और ‘अपने लिए सत’ अथवा स्वनिमित्त सत मनुष्य की चेतना है। इसी क्रम में वह निरंतर अपना निर्माण करता रहता है। सात्र्र ने मनुष्य के जीवन को एक योजना, सतत अभियान और चयन की प्रक्रिया माना है। इनके अनुसार यही मनुष्य के अस्तित्व का परिचायक है जो इसे स्वीकार नहीं करता, वह पलायनवादी है। सात्र्र का कहना है कि चेतनायुक्त अस्तित्ववान मानव का स्वरूप है- स्वतंत्रता। स्वतंत्रता का तात्पर्य है संकल्प स्वातंत्र्य अर्थात् विभिन्न कार्य मार्गों में से किसी एक का चयन एवं तद्नुसार आचरण। सात्र्र का मानना है कि मनुष्य द्वारा निर्णयों अथवा कार्यों के चयन में किसी प्रकार की बाधा को पार करने का सामथ्र्य उसकी स्वतंत्रता में निहित है। इस प्रकार सात्र्र का मानना है कि मनुष्य चेतनायुक्त अस्तित्ववान ऐसा जीव है जिसका स्वरूप स्वतंत्रता है। अपनी इस स्वतंत्रता के द्वारा ही वह अपने भविष्य को गढ़ता है। जन्म से ही मनुष्य का सार निर्धारित नहीं होता अपितु स्वयं उसके द्वारा ही रचा जाता है। सात्र्र की प्रसिद्ध उक्ति है ‘‘अस्तित्व सारतत्व के पूर्ववर्ती है।’’3 अपने कथन के समर्थन में सात्र्र में डेकार्ट के कथन का खण्डन किया है। सात्र्र का कहना है कि ‘मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ’ ऐसा न कहकर ‘मैं हूँ’ इसलिए ‘मैं सोचता हूँ’ कहना अधिक तर्कसंगत है। डेकार्ट ‘मैं सोचता हूँ’ कहकर प्रत्यय को प्राथमिकता देता है और ‘मैं हूँ’ को द्वितीय स्थान प्रदान करता है। सात्र्र के अनुसार ‘मैं हूँ’ (अस्तित्व) सोचने (सारतत्व) के पहले हैं। आत्मा या अपने विषय में यह प्रश्न करना तो उचित है कि ‘मैं क्या हूँ’? किन्तु इसके विपरीत यह प्रश्न करना कि ‘क्या मैं हूँ?’ उचित नहीं है, हास्यास्पद है। अपने अस्तित्व को स्वीकार किये बिना व्यक्ति अपने बारे में  प्रश्न कर ही नहीं सकता। अतः सात्र्र कहते हैं कि अस्तित्व पहले है सारतत्व बाद में। सात्र्र कहते हैं कि ‘‘विषय जगत की संज्ञाएं अपने सारतत्व के माध्यम से जानी जाती हैं, क्योंकि उनके अस्तित्व को उनका सारतत्व निर्धारित करता है, परंतु मानव जगत या मूर्तमान व्यक्तित्व का अस्तित्व उसके सारतत्व के पहले है।4
इस प्रकार सात्र्र का ‘बीईंग फार इटसेल्फ’ अर्थात चेतन, सत्तावान, स्वरूप-स्वतंत्र प्राणी अपने सारतत्व का निर्माता है। सात्र्र का मनुष्य स्वतंत्र है अपने कार्यों, निर्णयों एवं मूल्यों के चयन में, कोई भी पूर्व निर्धारित मूल्य या नैतिकता नहीं है जो उसे नियमित या सीमित करे अपितु वह स्वयं अपने मूल्यों का निर्माता है। सात्र्र इसका खण्डन करता है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास है अपितु वह मनुष्य को इसका नियंता व निर्देशक कहता है। वह जो बनना चाहता है वही बनता है। सात्र्र कहता है कि परिस्थिति वह है जिसमें स्वतंत्रता जन्म लेती है। सात्र्र के अनुसार, ‘‘मेरी स्वतंत्रता ही मूल्यों का एकमात्र आधार है मेरे द्वारा किसी भी मूल्य के औचित्य को अन्यत्र ढूँढना सर्वथा बेमानी है। स्वयं का ऐसी सत्ता के रूप में बोध जो स्वयं तो मूल्यों का एकमात्र आधार है, पर जिसके स्वयं के अस्तित्व और प्रक्रियाओं का कोई आधार नहीं है, दुश्चिंता उत्पन्न करता है।’’5 इस प्रकार सात्र्र यह बताते हैं कि किस प्रकार मनुष्य अपनी स्वतंत्रता और उससे उत्पन्न एकाकीपन में कष्ट का अनुभव करता है जिसे सात्र्र ने दुश्चिंता कहा है। इस दुश्चिंता से बचने के लिए हम अपनी वास्तविकता एवं जगत की वास्तविकता को स्वीकार करने से डरते हैं और अपनी स्वतंत्रता से भागने का प्रयास करते हैं ऐसा आचरण करते हैं जैसे कि हम दूसरों से निर्धारित नियंत्रित हो रहे हैं इस प्रक्रम में मनुष्य स्वयं से झूठ बोलता है जिसे सात्र्र ने दुरास्था ;ठंकंिपजीद्ध कहा है। सात्र्र के अनुसार मानव जीवन दुरास्थाओं से भरा पड़ा है.....अपने ही एकाकीपन से भयभीत एवं उत्तरदायित्व को वहन करने में सक्षम मनुष्य ईश्वर का सहारा लेता है। ईश्वर की स्वीकृति मानव अस्तित्व की वास्तविकता से पलायन की एक विधि है। मनुष्य स्वयं को ईश्वरकृत स्वीकार मान उसके हस्तक्षेप को स्वीकार करता है ताकि वह अपने उत्तरदायित्व से बच सके। इस प्रकार सात्र्र ने मनुष्य को मूलतः स्वतंत्र घोषित कर उसे मूल्यों का निर्माता माना है और धर्माधारित नैतिकता, नियतिवाद, पूर्व निर्धारित मूल्यों को अस्वीकृत किया।
सात्र्र मानव जीवन की मौलिकता से इतना प्रभावित था कि वह मानता था कि मनुष्य के अस्तित्व, जीवन और जीवन की सारी योजनाओं की मानवीय ढंग से व्याख्या हो सकती है। इस व्याख्या के लिए ईश्वर के प्रत्यय की आवश्यकता नहीं अपितु इसे स्वीकार करने पर मनुष्य की स्वतंत्रता का हनन होता। अतः सात्र्र ईश्वर के प्रत्यय की आवश्यकता को अस्वीकृत करता है।
सात्र्र कहते हैं कि ईश्वर में विश्वास का आधार जीवन की निस्सारता और निष्फलता है। मनुष्य का जीवन अनिश्चित है। उसे पग-पग पर निराशा मिलती है और संघर्ष करना पड़ता है फलस्वरूप उसे सब कुछ तथ्यहीन और बेकार मालूम पड़ता है। उसे एक सहारे की आवश्यकता होती है और वह ईश्वर में विश्वास जगा लेता है तो उस विश्वास से अधिक मौलिक चिंता, क्लेष और जीवन की सारहीनता की चेतना प्रकट होती है। यदि अपने वैयक्तिक अस्तित्व में अपने आंतरिक जीवन में व्यक्ति को सबकुछ तथ्यहीन प्रतीत होता है तो ईश्वर में विश्वास भी तथ्यहीन है।
सात्र्र द्वारा वर्णित ‘मानव स्वतंत्रता’ एवं ‘ईश्वर’ में मौलिक विरोध है। यदि विश्व की सृष्टि ईश्वर द्वारा हुई है तो इसका अर्थ है कि सृष्टिकर्ता ने मनुष्य को एक पूर्वनिर्मित भाव के अनुरूप बनाया है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक शिल्पी अपनी कलाकृति का सृजन करता है, किंतु उस दशा में मानव स्वतंत्रता का अपहरण हो जाता है और सात्र्र को यह कदापि स्वीकार नहीं है क्योंकि मानवीय स्वतंत्रता सात्र्र के अस्तित्ववाद की मूल्य मान्यता है।
सात्र्र ने एक अन्य ढंग से भी ईश्वर की आवश्यकता को अस्वीकृत करते हुए कहते हैं कि ईश्वर का भाव मानव मन में उसी ढंग से बनता है जिस ढंग से व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों का आभास होता है। सात्र्र के दर्शन में ‘अन्य व्यक्तियों की दृष्टि’ की चेतना होती है। यह चेतना होती है कि उसे देखा जा रहा है। शायद उसी ढंग से जिस ढंग से वस्तु या पदार्थ को देखा जा रहा है। यदि अन्य व्यक्ति मेरे वातावरण के अंग हैं। यदि मेरे लिए है तो मैं भी उनके वातावरण का अंग हूँ, उनके लिए हूँ, यह चेतना तो अनुभव की है किंतु कभी-कभी जब मनुष्य का मस्तिष्क भाव और प्रत्यय में उलझ जाता है तो वह इन वास्तविक और मानवीय सम्बंधों से अलग हो एक प्रकार से शून्य में ही इन व्यक्तियों की उपस्थिति के पीछे जाने की चेष्टा करता है वह विचार करता है कि शायद कोई ऐसा भी है जो किसी व्यक्ति की दृष्टि का विषय नहीं है, जो अन्य व्यक्तियों के पीछे है और सभी व्यक्ति उसी के लिए हैं। साधारणतः तो हर व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि का विषय है ही केवल वही एक ऐसा व्यक्ति है जो स्वयं किसी की दृष्टि का विषय नहीं किंतु उसकी दृष्टि का विषय सभी है।7 सात्र्र के अनुसार यह ईश्वर के भाव तक पहुँचने का एक ढंग है किंतु इस उद्धरण से पता चलता है कि यह ईश्वर की वास्तविकता या उसके अस्तित्व को स्थापित नहीं करता। इस प्रकार सात्र्र ने ईश्वर को मानव अस्तित्व और उसके जीवन के विविध पक्षों की व्याख्या के लिए अप्रासंगिक, अनावश्यक माना है और इसी अर्थ में सात्र्र नास्तिक है।
सात्र्र यद्यपि कि ईश्वर के स्थान पर मानवीय दुश्चिंता को अधिक मौलिक मानते हैं तथापि वह यह भी स्वीकार करते हैं कि मानव जीवन में कुछ बातें होती है जो उसकी स्वतंत्रता को परिसीमित करती हैं, सात्र्र ने इन्हें ‘तथ्यता’ की संज्ञा दी है जैसे- मेरा स्थान, मेरा अतीत, सहयोगी, मृत्यु इत्यादि। सात्र्र ने कहा है कि स्वतंत्रता के बाधक यह तत्व मनुष्य की स्वतंत्रता के प्रमाण हैं। सात्र्र के अनुसार ‘‘हम सदा किसी न किसी स्थिति में होते हैं और हमारा चुनाव उस स्थिति के द्वारा परिसीमित होता है परंतु उसके भीतर हम अपने चुनाव के लिए स्वतंत्र होते हैं। पर्वत के रूप में बाधा हमारे लिए यह निर्णय लेने का अवसर उपस्थित करती है कि हम आगे बढ़ने से रूक जाएंगे अथवा नये मार्ग की खोज करेंगे। इस प्रकार मनुष्य की स्वतंत्रता ही बाधाओं का भी चुनाव करती है।’’8
पुनः प्रश्न उठता है कि यदि कोई ईश्वर नहीं है, कोई पूर्व निर्धारित मूल्य नहीं है, मनुष्य ही मूल्यों का सृष्टिकर्ता है उसका औचित्य प्रस्तुतकर्ता है तो इस तरह के दर्शन की अनिवार्य परिणति नैतिक अराजकतावाद में होगी। ऐसे में वस्तुनिष्ठ नैतिकता का कोई अर्थ नहीं रह जाता, व्यक्ति जैसा चाहे वैसा आचरण करे, स्वेच्छाचारिता ही शेष रह जाती है।9 इस प्रकार आलोचकों ने सात्र्र के अस्तित्ववाद पर नैतिक-सापेक्षतावाद का आक्षेप किया है।
वस्तुतः सात्र्र के सामने दोहरी समस्या है एक तरफ वह जहाँ ईश्वर या धर्म पर आधारित नैतिकता को स्वीकार करना नहीं चाहते वहीं, दूसरी ओर किसी तरह के नैतिक सापेक्षतावाद से बचना चाहते हैं। अपनी समस्या के समाधानार्थ सात्र्र ने ‘स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व’ पर आधारित नीतिशास्त्र के मध्यम मार्ग को अपनाया है। सात्र्र के अनुसार स्वतंत्रता सदैव ‘अन्य’ के संदर्भ को लिए हुए होती है। हम किसी यूनियन, दल सामाजिक संस्था या किसी धर्म का जो चुनाव करते हैं वह देखने में भले गे कि ये वैयक्तिक रूप से स्वयं मात्र हमसे सरोकार रखता है पर देखा जाय तो हम अपने चयन के द्वारा अन्य के लिए भी उसी तरह के आचरण की अनुशंसा कर रहे होते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो हमारे सारे आचरण सिफारिश या अनुशंसा होते हैं। मैं अपने कतृत्व द्वारा अन्यों के लिए जो उसी परिस्थिति में है दृष्टांत उपस्थित कर रहा होता हूँ वस्तुतः मैं मानवमात्र के प्रतिनिधि के तौर पर आचरण कर रहा होता हूँ।10 इस प्रकार सात्र्र ने नैतिक सापेक्षतावाद के आक्षेप से बचने के लिए स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व का प्रत्यय संलग्न किया और कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने लिए चयन कर रहा होता है तो वह चयन मात्र उसके लिए न होकर सम्पूर्ण मानव जगत के लिए होता है। इस महती उत्तरदायित्व का वहन भी चयनकर्ता द्वारा चयन की प्रक्रिया के दौरान होता है।
वस्तुतः संसार में प्रचलित धर्मों एवं उन पर आधारित नैतिकता और धर्माधारित द्वेषों व संघर्षों का लम्बा इतिहास रहा है जिसने इस प्रश्न को भी जन्म दिया कि क्या ईश्वरविहीन नैतिकता संभव नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर हमें सात्र्र के निरीश्वरवादी नैतिक विचारों में खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।

संदर्भ ग्रंथ
1-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, translated by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 174
2-             Ibid, p. 5
3-             Satre : Existentialism and Humanism, Mathew & Co., London, 1960, p. 28
4-             Ibid, p. 28
5-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, tr. by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 76
6-             J.P. Sartre : No Exit and Three Other Plays, tr. by Stauart Gilbert, New York, Vintage Books, 1971, pp. 120-121
7-             Jean Paul Sartre : Being and Nothingness, translated by Hazel E. Barnes, Washington Square Press Publication of Pocket Books, New York, 1966, p. 281

8-             Ibid, p. 465
9. आनन्द मिश्र: अस्तित्ववादी नीतिशास्त्र: सात्र्र के विशेष संदर्भ में, दार्शनिक त्रैमासिक, अखिल भारतीय दर्शन परिषद, अंक-4, 2006, पृ. 142
10. वही, पृ. 144

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