Tuesday, 31 March 2009

सम्पत्ति-विभाजन के संदर्भ मेें याज्ञवल्क्य स्मृति का योगदान


श्रीमती रेखा खरे
शोध छात्रा, प्राचीन इतिहास,
उ0प्र0 राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविविद्यालय, इलाहाबाद |

              भारत वर्ष में प्राचीन काल से ही आर्थिक विकास के क्रम में सम्पत्ति का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है, जिसका महत्व अद्यावधि विद्यमान है। सम्पत्ति ऐश्वर्य का पर्याय रहा है। सम्पत्ति की अवधारणा के सम्बन्ध में बुच का दृष्टिकोण यह कहता है, कि जब-तक वस्तुएं पर्याप्त मात्रा में रहती है और निसर्ग पर उनका अस्तित्व निर्भर करता है, तब तक स्वामित्व का प्रश्न नहीं खड़ा होता है। प्रत्येक व्यक्ति नैसर्गिक वस्तुओं का उपभोग अपनी स्वेच्छानुसार करता है, परन्तु जिस क्षण मानव-श्रम, मानव-शिल्प और मानव-पराक्रम वस्तु की स्थिति को प्रभावित करता है, वहीं सम्पत्ति की धारणा अस्तित्व में आ जाती हैै।1 ऐश्वर्यशाली बनने के लिए अनेक प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता वैदिक-काल से ही अनुभूत की जाती रही है। वेदों में धन को ’रयी’ कहा गया है। रयी शब्द सुकर्णादि एवम् धन का वाचक है। वेदों ने धन की प्राप्ति में लोभ वृत्ति के त्याग की अनुशंसा की है।2
समस्त स्मृतियाँ आद्यतन दो प्रकार की सम्पत्तियों की चर्चा करती है, प्रथम स्थावर सम्पत्ति द्वितीय जंगम सम्पत्ति। स्थावर से भूमि खण्ड एवम् जंगम् से चल सम्पत्ति द्योतित है, परन्तु याज्ञवल्क्य तीन प्रकार की सम्पत्तियों की विवेचना करते हैं, भूमि, निबन्ध एवं द्रव्य, स्वर्ण रजत तथा अन्य चल-सम्पत्ति। ‘निबन्ध’ शब्द के अर्थ में डाॅ0 काणे का अभिमत है, कि रुपये-पैसे अन्न या अन्य वस्तुओं के रूप में वह आवाधिक शुल्क या चुकती या दान जो राजा द्वारा या संघ द्वारा यह किसी जाति द्वारा किसी व्यक्ति, कुल मठ या मन्दिर को जो स्थायी रूप से मिलता है, निबन्ध कहलाता है।
जंगम-सम्पत्ति से दायभाग का बोध होता है, जो माता-पिता के द्वारा कुल परम्परा से आयी हुई होती है, और कुल-परम्परा से आने वाली इस सम्पत्ति का पुत्रों में बँटवारा दाय भाग कहलाता है।3 स्मृतियों में दाय की बहुत विस्तृत चर्चा हुई है, जिसके कारण ही मध्य-युग में इसके दो सम्प्रदायों का उदय हुआ, प्रथम मिताक्षरा-सम्प्रदाय, द्वितीय दायभाग सम्प्रदाय। मिताक्षरा  सम्प्रदाय याज्ञवल्क्य-स्मृति के ऊपर विज्ञानेश्वर की टीका मिताक्षरा पर आधृत था। यह जन्मना स्वत्व के सिद्धान्त को मानता था, जिसके अनुसार पिता के जीवन-काल में ही पुत्रों को दायभाग मिल सकता था। इसका प्रचार बंगाल को छोड़कर समस्त भारत में है।
दायभाग-सम्प्रदाय जीमूत वाहन के निबन्ध ग्रंथ दायभाग के ऊपर आधृत था, जो ’उपरम्स्वत्व’ सिद्धान्त को मानता था, जिसके अनुसार पिता की मृत्यु के पश्चात् ही पुत्रों को दाय मिल सकता था। इसकी विशेषता यह है, कि इसका प्रचार मात्र बंगाल में ही है, और आधुनिक काल में बंगाल के कुछ कुलों में मिताक्षरा के कानून प्रतिनिष्ठित है।
याज्ञवल्क्य ने ’दाय’ शब्द को वह धन कहा है, जो धन स्वामी के सम्बन्ध मंे निमित्त से ही अन्य का ’स्व’ (धन) हो जाय। दाय दो प्रकार  के कहलाते हंै, प्रथम अप्रतिबंधक अर्थात जिसको कोई रोक न सके, द्वितीय सप्रतिबंधक, जिसका कोई प्रतिबंधक हो। अप्रतिबंधक दाय उसे कहते हैं, जिनमें पुत्रों और पौत्रों का पुत्र और पौत्र रूप से पिता और पितामह के धन में स्वत्व है, वह अप्रतिबंधक दाय होता है, क्योंकि उसको कोई नहीं हटा सकता है। पिता और भ्राता रूप से जिनमें स्वत्व हो, वह सप्रतिबन्धक दाय होता है।
दाय के सम्बन्ध में मिताक्षरा और दायभाग  दो विचाराधारा के रूप में प्रचलित रहे हैं। संयुक्त सम्पत्ति के सम्बन्ध में मिताक्षरा में वर्णित है, कि पुत्र का जन्म से ही सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो जाता है। पुत्र पैतृक सम्पत्ति में पिता का सह-स्वामी होता है। पिता सम्पत्ति के बँटवारे का सीमित अधिकारी है, और पुत्र बँटवारें का दावा पिता के जीवन-काल में कर सकता है, तथा संयुक्त परिवार के सदस्यों का परिवार के प्रधान की मृत्यु के पश्चात्  स्वतः अधिकार प्राप्त हो जाता है। उक्त कथनों के विपरीत दायभाग में वर्णित है, कि पुत्र को पिता की मृत्यु के बाद ही सम्पत्ति मेें अधिकार प्राप्त हो सकता है। पिता के जीवन काल में पैतृक सम्पत्ति पर पुत्र का कोई अधिकार नहीं होता है। पिता को सम्पत्ति के बँटवारे का निरपेक्ष अधिकार होता है, तथा पुत्र बँटवारा व परवरिश का दावा नहीं कर सकता। पिता की मृत्यु के पश्चात् ही उत्तराधिकारियों, विधवा तथा पुत्रियों का अधिकार प्राप्त होता है। बँटवारे के सम्बन्ध में मिताक्षरा का कथन है, कि संयुक्त परिवार के सदस्य अविभाजित सम्पत्ति का निष्पादन नहीं कर सकते, जबकि दायभाग में संयुक्त परिवार का कोई सदस्य अपना हिस्सा अविभाजित होनें पर भी निष्पादित कर सकता है। उत्तराधिकार  के सम्बन्ध में मिताक्षरा का मानना है, कि रक्त सम्बन्धों के आधार पर उत्तराधिकार निर्धारित होता है, तथा उत्तराधिकार में मातृबंधु को निरस्त कर पितृबंधु को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि दायभाग का मानना है, कि उत्तराधिकार का सिद्धांत आध्यात्मिक पिण्डदान पर आधारित है, इसमें मातृबंधु अर्थात् बहन-पुत्र को उनके पितृबंधु की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।
सम्पत्ति विभाजन के संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति का प्रावधान है, कि यदि पिता चाहे तो अपने जीवित रहते ही अपना धन पुत्रों को बाँट कर दे सकता है।4 मनु ने भी अपनी स्मृति मंे सविस्तार सम्पत्ति के अधिकार विभाजन के सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है। मनु का मानना है, कि माता-पिता के मरने पर भाई एकत्र होकर पैतृक सम्पत्ति को बराबर-बराबर बाँट लें, क्योंकि वे पुत्र माता-पिता के जीवित रहते उनकी सम्पत्ति लेने में असमर्थ रहते हैं।5 मनु के कथन का सारगर्भित तात्पर्य यह है कि पिता की मृत्यु के पश्चात् पितृ सम्बन्धी तथा माता की मृत्यु के पश्चात् मातृ सम्बन्धी द्रव्य सब भाइयों को बराबर-बराबर बाँट लेना चाहिए। पितामह की सम्पत्ति में स्मृतिकार विष्णु का अभिमत है, कि दादा से उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति में पिता और पुत्र  का स्वामित्व बराबर होता है।6 इसी संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति में उद्घृत है, कि संचय की गयी सम्पत्ति में पिता और पुत्र का स्वामित्व बराबर होता है।7
महान स्मृतिकार याज्ञवल्क्य ने किचिंत विस्तार में पैतृक सम्पत्ति के विभाजन के संदर्भ मेें अपनी स्मृति में वर्णित करते हैं कि पिता यदि अपने अर्जित धन का विभाजन करें तो वह अपनी इच्छा से न्यूनाधिक भाग भी बाँट सकता हैं। वह पिता की इच्छा पर निर्भर हैं। वह ज्येष्ठ पुत्र को श्रेष्ठ भाग दे सकता हैं या सबको समान भाग विभाजित कर सकता हैं। पिता की इच्छा से किया जाने वाला विभाजन दो प्रकार का होता हैं, यदि पिता सभी पुत्रों को समान रूप से समविभाजन करता है, तो पत्नी को भी सामांश रूप से भाग देने की अनुशंसा याज्ञवल्क्य ने की है, परन्तु वह यह भी कहतें हैं कि इस सम-अंाश की उत्तराधिकारिणी वही पत्नी होती है, जिसे स्वामी या श्वसुर से स्त्री-धन न प्राप्त हुआ हो। विषम-भाग उसी धन का होता है, जिसको पिता स्वमेव अर्जित करता हैं। यदि कोई पुत्र स्वयं द्रव्यावर्जन करने में समर्थ हो और पिता के धन की इच्छा न रखे, तो उसे कुछ भी देकर विभाजन करना पिता का कार्य है। न्यूनाधिक विभाजन पिता के द्वारा ही धर्म होता है।8
इस प्रकार सम्पत्ति विभाजन के संदर्भ में याज्ञवल्क्य-स्मृति का महनीय योगदान है। समयानुसार समाज हर युग में उससे उत्प्रेरित होता रहा है। वर्तमान समय मंे ही समाज इन्ही विचार धाराओं से अभिसिंचित हैं। यद्यपि सम्पत्ति के अधिकार को लेकर विवाद होते रहें हैं, परन्तु प्राचीन काल से ही सम्पत्ति और उसका अधिकार भारतवर्ष में विचारणीय विषय रहा है। इस संबंध में स्मृतिकार याज्ञवल्क्य ने अपनी अनमोल स्मृति द्वारा समाज में शान्ति-व्यवस्था और सौहार्द बनाये रखने के लिए अग्रणीय तथा अनुकरणीय प्रयास किया है।
संदर्भ सूची-
1. एम0ए0बुच, ए सर्वे आॅफ एकनाॅमिक्स एण्ड एकनाॅमिक लाइफ इन एनाशियेन्ट इण्डिया, भाग-1, पृ0-1 ।
2. यजुर्वेद, 40/1 ।
3. मनुस्मृति, 9/103 ।
4. याज्ञवल्क्य-स्मृति, 2/114 ।
5. मनुस्मृति, 9/104 ।
6. विष्णु-स्मृति, 17/2, 3 ।
7. याज्ञवल्क्य-स्मृति, 2/121,    8.    वही 2/114-115

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