Saturday, 1 October 2011

वाराणसी नगर में बालश्रम एवं शोषण


विकास कुमार
शोध छात्र, समाजशास्त्र विभाग,
काशी हिन्दू विष्वविद्यालय, वाराणसी (उ0प्र0)।

भारत सरकार की निरंतर कल्याणकारी कार्यक्रमों, विधि निर्माण और प्रषासनिक कार्य के उपरांत भी बहुत बडी संख्या में बच्चे बाल मजदूर के रूप में खटने को मजबूर है। सम्पूर्ण विष्व में लगभग 25 करोड बाल-श्रमिक है, जो मजदूरी करके अपना जीवन-निर्वाह कर रहें है। उनमें से हर चैथा श्रमिक भारत का है। इनमें भी अनुसूचित जाति के बाल-श्रमिकों की संख्या ज्यादा है। इस अध्ययन में विभन्नि उधोगों एवं व्यावसायों में कार्यरत अनुसूचित जाति के बाल-श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि एवं उनकी कार्यदषाओं को जानने के लिए वाराणसी नगर के अनुसूचित जाति के बाल-श्रमिकों से संबंधित तथ्यों का एक़़त्रीकरण समाज वैज्ञानिक प्रविधियों में मुख्यतः साक्षात्कार अनुसूचि, साक्षात्कार, अवलोकन आदि के द्वारा इनकी ताजा स्थिति का अध्ययन किया गया है।

वाराणसी नगर भी बाल श्रमिकों से अछूता नही है। यह नगर विभिन्न छोट बड़े उद्योगों एवं व्यवसायों के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध रहा है। यह लघु एवं कुटीर उद्योग के कारण एक अति व्यस्तम, छोटे महानगरों के रूप में गिना जाता है। यहाॅ हस्तकला, षिल्पकला, पीतल, बेकरी, अल्युमिनियम, अगरबत्ती, उद्योगों के अलावा अन्य कई बड़े-बड़े उद्योगों में हथकरघा, ईंट भट्ठा, कालीन, जलपान एवं होटल, मोटर गैरज एवं पम्प व्यवसाय जैसे कई बड़े उद्योग है, जिसमें एक अनुमान के अनुसार 60 हजार बाल श्रमिक कार्यरत हैं जिनमें केवाल अनुसूचित जाति के बाल श्रमिकों की संख्या 25 हजार के आस-पास है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि वाराणसी नगर में कुल बाल श्रमिकों में अनुसूचि जाति की बहुलता है।
       यह नगर रेषम एवं सिल्क साडि़यों के लिए सम्पूर्ण विष्व बाजार में प्रख्यात रहा है, जो अल्पायु वर्ग के बाल श्रमिकों के जादुई हाथों द्वारा हथकरघों पर तैयार होते हैं। जो विष्व बाजर में राष्ट्र की शोभा बढ़ाने के साथ ही, हमारे देष के लिए विदेषी मुद्रा अर्जित करते हैं। यहाॅ रेषमी वस्त्र के अन्तर्गत बनारसी साड़ी नगर के मदनपुरा, लल्लापुरा, रेवड़ी, तालाब, छित्तनपुर, सरैया जैसे अन्य कई मुहल्लों के करघों पर तैयार होते हैं। उपरोक्त मुहल्ले अधिकांष मुस्लिम सम्प्रदाय बाहुल्य माने जाते हैं, जहाॅ पर विभिन्न प्रकार के रेषमी वस्त्र हैण्डलूम व पावरलूम के करघे पर बुनकरों के साथ-साथ बाल श्रमिकों का काफी बड़ा योगदान होता है। इन उद्योगों में बाल-श्रमिक सूत की रंगाई से लेकर कटाई, छंटाई तथा बिनाई तक करते हैं। एक तरफ जहाॅ इनका कार्यस्थल दूषित वातावरण, कम रोषनी, पुराने करघे वाले होते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये मात्र 10-12 वर्ष के उम्र में 14-16 घन्टे तक बिना विश्राम किये कार्य को सम्पन्न करते हैं। परिश्रम के एवंज में मात्र 600/- से 800/- रूपये प्रतिमाह वेतन प्राप्त करते हैं। इसी से इनके आर्थिक स्थिति का अन्दाजा लगाया जा सकता है कि इनके श्रम का दुरूपयोग किसी सीमा तक किया जाता है।
वाराणसी में नगर सीमा से सटे अनेकों ईट भट्ठा उद्योग संचालित है, जिसमें अत्यधिक संख्या में बाल श्रमिक कार्यरत है। इन उद्योगो में कार्यरत बाल श्रमिकों में अधिकांष बालक बॅधुआ मजदूरी की प्रथा पर काम करते है, जो मिट्टी ढोने, कच्चे ईंट को सिर पर लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने, साथ ही साथ जलते भट्ठे में समीप से कोयला झोकने इत्यादि जैसा कार्य करते हैं। पारिश्रमिक के रूप में कुछ मजदूर अपने पिता द्वारा लिया गया कर्ज चुकाता है, कुछ सालाना या छमाही पर 3000-5000 रूपये तक प्राप्त करके चुपचाप संतोष करते हैं। इनमें कार्यरत अधिकांष बालकों की आयु 7-13 वर्ष की बीच है।
         नगर के विभिन्न पेट्रोल पम्पों तथा मोटर गैरेजों मे भी अत्याधिक बाल श्रमिकों को कार्य करते देखा जा सकता है। ये अधिकांषतः जी0टी0 रोड पर स्थित विभिन्न गैरेजो मं प्रमुख कारीगरों के साथ उनके सहायक या घरेलू नौकर के रूप में काम करते हैं, जो गाड़ी धोने-पोछने से लेकर, गाड़ी की ग्रिसिंग, आॅयलिंग नट-बोल्ट कसना-खोलना, सुबह 8 बजे दुकान खुलने से शाम 8 बजे दुकान  बन्द हाने तक अत्यन्त ही कठिन कार्य करते हैं। वेतन के रूप में कहीं दुकान मालिक महीने पर तो कहीं प्रतिदिन 50-60 रूपये की बीच तथा 1500-2500 रूपये प्रतिमाह देते हैं। इन पेषों में कार्यरत अधिकांष बालकों की आयु 8 से 14 वर्ष के बीच है।
अगरबत्ती उद्योग अन्य उद्योगों की भाॅति नगर का प्रमुख उद्योग है, जो पिषाचमोचन, जादूमण्डी, औरंगाबाद, हड़हासराय जैसे मुहल्लों में बनाया जाता है, जिसमें बहुसंख्यक 9-11 वर्ष के बालक अत्यन्त जहरीले रासायनिक पदार्थो के बीच पैंकिग करने, सीकों को छीलने तथा बेलने पर लपेटने जैसा काम करते है, जो उनके स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्याधिक हानिकारक है। वाराणसी नगर के मुख्य चैराहों एवं स्टेषनों के समीप अनेकों होटल एवं जलपान गृह है, जिसमें असंख्य बालक मात्र दो वक्त की रोटी पर ग्राहकों जूठन साफ करने, चाय-पानी देने, मेंज पोछने इत्यादि कार्यो में सलग्न हैं। इतना ही नही कई छोटे-छोटे कार्यो में जैसे- स्टेषन पर बोझ उठाने बूट-पालिष साइकिल मरम्मत, अखबार बेचने, गृहकार्य, मेटल वर्कषाप, प्रिन्टिंग प्रेस, प्रोविजन स्टोरो, मेडिकल स्टोरों, बीड़ी, दियासलाई बनाने, मे अत्याधिक कम मजदूरी पर कार्य करने को बाध्य है।
समाजिक- आर्थिक स्थिति:-
वाराणसी नगर में बड़ी संख्या में बाल श्रमिक अनुसूचित जाति के हैं। बचपन से ही इन्हे मजदूरी विरासत में मिली होत है। माॅ-बाप पैसा प्राप्ति के उद्देष्य से इन्हें षिक्षा ग्रहण करने के बजाय काम सिखाना उचित समझते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप अल्पायु में बालक श्रम करने को विवष होते हैं। औकात से बाहर काम, खान-पान की कमी, दूषित वातावरण से इनमें अधिकांष रोगों का समावेष होता है।  उत्पादन की वर्तमान पद्धति के अन्तर्गत मालिकों द्वारा इनका अत्याधिक श्रम-षोषण किया जा रहा है। पैसे की मजबूरी इन बालकों के जबान पर ताला लगा देती है।
अध्ययन की प्रविधि:-
अन्वेषणात्मक एवं वर्णनात्मक प्रारूप पर आधारित इस अध्ययन के निर्देष में वाराणसी नगर के विभिन्न उद्योगों एवं व्यवसायों में कार्यरत अनुसूचित जाति के 450 बाल श्रमिकों को लिया गया। सम्बन्धित तथ्यों का एकत्रीकरण समाजवैज्ञानिक प्राविधियों मंे मुख्यतः साक्षात्कार अनुसूचि, साक्षात्कार, अवलोकन आदि के द्वारा किया गया। इन प्राथमिक श्रोतों के अलावा द्वैतियक श्रोतो में विभिन्न प्रकार के सर्वेक्षणों, तथ्य संलित किये गये हैं।
अध्ययन की उपलब्ध्यिाॅ:-
अध्ययन से प्राप्त आंकड़ो से यह ज्ञात हुआ कि वाराणसी नगर के अधिकांष बाल श्रमिक भूमिहीन हैं जो 600-800 रूपया प्रतिमाह कमाते है। पारिवारिक आर्थिक स्थिति दयनीय हाने के कारण पिता-पुत्र दोनों अतिरिक्त समय में भी मजदूरी करते हैं। आॅकड़ो से या भी ज्ञात हुआ है कि बाल श्रमिकों में 36.89 प्रतिषत आर्थिक तंगी से पढ़ाई में रूचि नही रखते। जबकि 72.44 प्रतिषत मौका मिलने पर भी षिक्षा ग्रहण करना नहीं चाहते। बी0एन0 जुयाल (1983) द्वारा वाराणसी कालीन उद्योग के बाल श्रमिक, सुरेन्द्र सिंह एवं वर्मा (1987) द्वारा नैनीताल के बाल श्रमिकों, श्रीवास्तव एवं शेरिफ (1991) के द्वारा मद्रास एवं वैलूर के बाल श्रमिकों के अध्ययनों में भी ज्यादातर बाल श्रमिक आर्थिक तॅगी के चलते पढ़ाई में रूचि नही लेते पाये गये।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि बाल श्रमिक चूॅकि वयस्क श्रमिकों के साथ काम करते हैं इसलिए ये बीड़ी, सिगरेट जैसे अनेक बुरी आदतों की लत पकड़ लेते हैं, जिसमें 37 प्रतिषत सिनेमा, 47.39 प्रतिषत वीडियों, 28.8 प्रतिषत बीड़ी, सिगरेट गाॅजा, भाॅग, चरस आदि जैसी बुरी आदतों का सेवन करते है। के0 एन0 जार्ज (1975) द्वारा मद्रास नगर, मुसाफिर सिह, खान एवं कौर (1976) द्वारा मुम्बई महानगर तथा नदीम अहमद एवं एन0एन सिन्हा द्वारा पटना में गन्दी बस्ती में निवास करने वाले बाल श्रमिकों पर आधारित अध्ययन में भी ऐसा ही निष्कर्ष पाया गया।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि बाल श्रमिकों में जातिगत भेदभाव के अन्तर्गत उच्च जाति बालक निम्न जाति के बालकों के साथ छूआछूत का भाव रखते है। 24.22 प्रतिषत उच्च जाति के बालक 58.89 प्रतिषत निम्न जाति के बालकों से कोई व्यवहार या संबंध नहीं रखना चाहते जबकि 36.22 प्रतिषत बाल श्रमिकों में उॅच-नींच की भावना के चलते प्रायः लड़ाई-झगड़ा तक होता है। 67.78 प्रतिषत बालकों को अपने किये गये परिश्रम का उचित मजदूरी भी नही मिलती जबकि 54.88 प्रतिषत लोगों का किसी प्रकार से कार्य में नागा होने पर पैसा देना तो दूर प्रतिष्ठान मालिकों द्वारा उन्हे पीटा तक जाता है। अध्ययन से एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी उजागर होता है कि बाल श्रमिकों की इन दुर्दषाओं में सरकारी अधिकारियों की षिथिलता एक प्रमुख कारण है। प्राप्त आॅकड़ों से ज्ञात हुआ कि 97.33 प्रतिषत बालकों को सरकारी सुविधाओं की जानकारी नही है, जबकि 95.11 प्रतिषत लोगों को कोई सुविधा प्राप्त नही है, और 74.69 प्रतिषत श्रम अधिकारी या इनसे सम्बन्धित कार्यालय नही जानते। कहा जा सकता है कि सरकार बाल श्रमिकों की बुरी स्थिति के प्रति जागरूक है और समय-सयम पर इनके कल्याण हेतु कई योजनाओं का क्रियान्वयन करने के साथ ही बच्चों को जोखिम भरे कठोर काम कराए जाने के साथ ही तथा इन पर तरह-तरह के जुल्म कर इनके खुलेआम शोषण किया जा रहा है।
उपसंहार:-
उपर्युक्त विष्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बाल श्रमिको को शोषण एक मानवीय कलंक के रूप में आज भी समाज में व्याप्त है, यद्यपि इनके रोकथाम हेतु सरकार ने समय-समय पर प्रभावषाली कानून बनाये हैं, किन्तु मात्र कानून बनाने से या उनकी विसंगतियों के निराकरण से ही समस्या का समाधान सम्भव नही है। बाल श्रम की जड़े गरीबी में निहित है। गरीबी और पेट से त्रस्त श्रमिकों के माता-पिता इनसे रोजगार कराने को विवष है। समाज चाहे र्कोइै भी हो यदि बच्चो को पढ़ने एवं खेलने के लिए आजाद रखना चाहते है तो ऐसी परिस्थतियों का निर्माण करना होगा, जिससे आर्थिक अभाव के चलते  बच्चे कम उम्र में मजदूरी करने का बाध्य न हो, क्योंकि बच्चे राष्ट्र की अमूल्य सम्पदा है, निधि है। इन्हें सुरक्षित रखना हम सभी का नैतिक धर्म है, क्योंकि आज के बालक कल के नागरिक हैं, जिनके कन्धे पर राष्ट्र की नींव आधारित है, और जब राष्ट्र की नींव ही कमजोर होगा तो राष्ट्र कमजोर होगा। अतः समाज में यह भावना जागृत करनी होगी केवल उन्ही परिवारों का नहीं है, यहाॅ ये जन्म लेते हैं, बल्कि यह दायित्व उस समाज के लोगों का भी है जहाॅ ये पलते है, बड़े होते हैं, और रहते हैं। अतः इस विषम समस्या का समाधान न केवल सरकारी प्रयास द्वारा बल्कि हम सबके योगदान एवं  प्रयास से हीं सम्भव है।
सन्दर्भ-ग्रंथ
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2. सुरेन्द्र सिंह एवं वर्मा:‘‘सम सोषियोलाजिकल आवजर्वेषन आन चिल्ड्रेन्स इम्प्लायमेन्ट’’ लेबर बुलेटिन, 1987
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