Friday, 1 July 2011

गीता का रहस्यवाद एवं दार्शनिक समीक्षा

लवलेष पाण्डेय
शोध छात्र दर्षन शास्त्र
राजकीय महाविद्यालय, ज्ञानपुर, भदोही, सं0र0न0 भदोही



गीता में न केवल हिन्दू धर्म के प्राचीन पहलू कर्मकाण्ड पर विश्वास का, वरन आत्म संयम पर आधारित समस्त जीवन के भी नीतिशास्त्र का विकास दृष्टि गोचर होता है।
गीता में इस बात पर बक दिया गया है कि जगत की व्यापार अविच्छिन्न गति से चलता रहे साधु पुरूष आन्तरिक रूप से अलिप्त होते हुए भी वाह्य रूप में दूसरों के समान ही कार्यरत रहें। रहस्यवाद का निरूपण करते हुए गीता में लोक-संग्रह एवं स्थित प्रज्ञ के माध्यम से बताया गया है कि सफलता एवं असफलता सुखः-दुःख आनंद एवं अनुताप में अपने मन की समता कायम रखते हुए निस्वार्थ भाव से कार्य करना चाहिए। इस प्रकार शुद्ध होकर वह निरतंर ध्यान प्रार्थना व भक्ति के द्वारा अधिक प्रगति करने का अधिकारी होता है। और अन्ततः अपने आप को सभी वस्तुओं में और सभी वस्तुओं को ईश्वर में देखता है। सांसारिक कार्यों के बीच यही समर्पित जीवन योग कहलाता है और ऐसे ही कर्म योगी श्रेष्ठ कहलाते हैं।1 ऐसे ही योगी सृष्टि एवं ब्रह्म के रहस्य को समझने में समर्थ होते हैं।

गीता में रहस्यवाद संगत मत-
वस्तुतः जो परमकारण हमारा आधार है और जिस पर हमारे मन की प्रत्येक गतिविधि आधारित है। उसे परिव्याप्त करने अथवा उसका मापन करने के लिए हम तटस्थ नहीं हो सकते। मनुष्य के ज्ञान की यह मर्यादा वैज्ञानिक तािा दार्शनिक गवेषणाओं की सुपरिचित सीमा है। किसी भी सत्य का अवगाहन, प्रपंच की गवेषणा या किसी भी विशिष्टता का पर्याप्त गहराई तक परीक्षण के बाद अन्ततः अज्ञात का विशाल खण्ड प्राप्त हो ही जाता है। तत्पश्चात् उन्नति बाधित हो जाती है। यही मर्यादा रहित अज्ञात धर्म धर्मग्रन्थों और ऋषि मुनियों की वाणी तािा कार्यों का विषय होता है। उनकी पद्धति वही नहीं है जो वस्तु के सम्बन्ध में विज्ञान की होती है। भिन्नता होते हुए भी वही एक मात्र संभव पद्धति भी है? सामान्यतः प्रश्न उठता है कि अज्ञात की चिन्ता कयों की जाय? इसका क्या उपयोग है?
उल्लेखनीय है कि ज्ञान के अभाव मे ंरहस्य को समझना कठिन है श्री मद्भगवद् गीता में कहा गया है कि ज्ञान के अभाव में अज्ञात की वास्तविकता का निषेध नहीं किया जा सकता है। मानवीय दृष्टि के सामने आने वाली शून्यता वस्तुतः शून्यता नहीं है, अपितु वह अत्यन्त महत्वपूर्ण वास्तविकता से परिपूर्ण है। यह बात अलग है कि हम उसमें गहरे नहीं उतर सकते हैं। उसका विश्लेषण नहीं कर सकते या समझ नहीं पाते2 गीता में इसी प्रकार के रहस्यमय वर्णन प्राप्त होते हैं। इसीलिए बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि
सन्तों की उच्छिष्ट उक्ति है मेरी बानी।
जानू उसका भेद भला क्या मैं अज्ञानी3
गीता में अर्जुन का मोह भ्रम भी विकट है। यथार्थ ज्ञान को अनात्म सम्बन्धों से उत्पन्न समस्त बंधनों को छिन्न कर देता है। पर अर्जुन जिससे ज्ञान समझ रहा ािा वह उसके पाशों को और भी सुदृढ़ बना देता है तभी तो श्री कृष्ण कहते हैं कि प्रज्ञावादाश्च भाषसे अर्थात तू प्रज्ञावादों को बोल रहा है।4 प्रज्ञावाद का लक्षण है कि मुंह से तो बड़ी-बड़ी बात कहेंगे, पर हमारे कार्य उनके अनुरूप नहीं होंगे कथनी और करनी का अन्तर प्रज्ञावाद का विशिष्ट लक्षण है।
गीता में कहा गया है कि सभी प्राणी अपने स्वभव परवश हुए कर्म करते हैं5 ज्ञानवान भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है, फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा? अभिप्राय यह है कि विवेकी व्यक्ति मृत या जीवित किसी के लिए शोक नहीं करता है। श्री शंकराचार्य भी पंडित शब्द भाष्य करते हैं कि -पण्डा आत्म विषया बुद्धिः येषां तेहि पंण्डिताः अर्थात आत्म विषयक बुद्धि का नाम पण्डा है6 और वह बुद्धि जिसमें हो वह पंडित है दूसरे शब्दों जो आत्म मति ज्ञानी जन हैं वे न तो शरीर के लिए शोक करते हैं न आत्मा के लिए आत्मा और शरीर की भिन्नता का वास्तविक ज्ञान प्रदान करने वाले ज्ञान की महिमा को उपेक्षित नहीं किया जा सकता।
रहस्यवाद के अनुसार भी प्रत्येक वस्तु एकरूपता से परिपूर्ण है। संसार की प्रत्येक वस्तु सामंजस्य की द्योतक है। रहस्यवाद एक ऐसी अनुभूति है जो अवर्णनीय है। जिस प्रकार मिठाई के स्वाद का वर्णन करना मानव की शक्ति के बाहर है।
डाॅ. दुर्गादत्त पांडे के अनुसार रहस्यवाद का सम्बन्ध संतों के रहस्यात्मक अनुभव से है जो सांसारिक अनुभव से नितान्त भिन्न है।7 भाषा में व्यक्त न होने के कारण यह नहीं कहा जा सकता है कि रहस्यानुभूति आत्मनिष्ठ है, अपितु रहस्यानुभव ईश्वर या ब्रह्म का साक्षातकार है, अतः प्रज्ञानात्मक है।
निर्विवाद है कि रहस्यानुभूति साधारण तर्क और सामान्य भाषा के परे है और सर्वजनीन सत्य नहीं है, क्योंकि रहस्यानुभूति में किसी को राम, किसी कृष्ण किसी को मां काली का साक्षात्कार होता है। इसी विशिष्टता के कारण रामचरित मानस में कहा गया है कि-
हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
कहहि सुनहि बहुविधि सब सन्ता।।8
प्रश्न उठता है कि गीता में इस रहस्यानुभूति की अवर्णनीय स्थिति को किस प्रकार व्याख्यायित किया गया है? सामान्यतः धार्मिक अनुभव में रहस्यात्मकता का तत्व अनिवार्यतः विद्यमान रहता है, क्योंकि उपासक को अपना अराध्य विषय समस्त सांसारिक वस्तुओं से पूर्णतः भिन्न तथा रहस्यमय प्रतीत होता है।
गीता में कहा गया है कि साधारण वस्तुओं से भिन्न रहस्यमय परमतत्व को तत्वदर्शी ही जान सकता है।9 गीता में धार्मिक अनुभव के अन्तर्गत परमतत्व ही ईश्वर तत्व है जो प्राण मात्र का ईश्वर होते हुए जीवों के हित के लिए अपनी प्रकृति को अधीन करके स्वतंत्रता पूर्वक युग-युग में अवतीर्ण होता है।10 प्रश्न यह उठता है कि जब तत्वदर्शी ही रहस्यमय परमतत्व भगवान के जन्म और कार्य को देख पाता है तो लोग इतनी बड़ी संख्या में भीड़ लगाए क्यों खड़े हैं कि कहीं रहस्यमय तत्व रूपी ईश्वर का अवतार होगा तो दर्शन करेंगे? क्या वे सभी तत्व दर्शी हैं? ऐसा नहीं है कि पांचतत्व है, पच्चीस तत्व है इनकी गणना सीघ्र ही और हो गए तत्वदर्शी। यथार्थ गीता में कहा गया है कि आत्मा ही रहस्यमय परमतत्व है, आत्मा परम से संयुक्त होकर परमात्मा हो जाता है। आत्म साक्षात्कार करने वाला ही इस रहस्यमय आविर्भाव को समझ पाता है, इस प्रकार अवतार किसी विरही अनुरागी के हृदय में होता है। आरम्भ में उसे वह नहीं समझ पाता कि हमें कौन संकेत देता है? कौन मार्गदर्शन करता है? किन्तु परमतत्व परमात्मा के दर्शन के साथ ही वह रहस्य को देख पाता है, समझ पाता है और फिर शरीर को त्याग कर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होता है। यह रहस्यमय तत्व अनिर्वचनीय बतलाया गया है।
रहस्यमय परमतत्व की अनिर्वचनीयता-रहस्यमय परमतत्व की शक्तियां अनंत हैं;उनकी दिव्य शक्तियों में एश्वर्य शक्ति और माधूर्य शक्ति दोनो हैं। ऐश्वर्य शक्ति से परमात्मा ऐसे रहस्यमय कार्य करते हैं, जिनको दूसरा कोई कर नहीं सकता। इसके कारण उनमें जो महत्ता, विलक्षणता, अलौकिकता, दृष्टिगोचर होती है। वह परमात्मा के अतिरिक्त किसी मेें नहीं है। रामचरितमानस में भी रहस्यमय परमतत्व की अवर्णनीयता बतलाते हुए कहा गया है कि रहस्यमय परमतत्व परमात्मा- बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है बिना ही हाथ के विभिन्न प्रकार के कार्य करता है। इस प्रकार उस परमतत्व की करनी अलौकिक है, जिसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है।11 रहस्यवादी इसी आध्यात्मिक सत्ता को ईश्वर, ब्रह्म, परमतत्व आदि को विभिन्न संज्ञा से अभिहित करते हैं। धर्म दर्शन के अन्तर्गत रहस्यवाद को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है12 वहिर्मुखी एवं अंतर्मुखी रहस्यवाद।
वहिर्मुखी रहस्यवाद-
 वहिर्मुखी रहस्यवाद में रहस्यवादी भौतिक जगत के माध्यम से आध्यात्मिक सत्ता का अनुभव करता है तथा वाह्य जगत के भेदो का अनुभव करता रहता है, अतः वह असाधारण अनुभव की उच्चतम अवस्था को प्राप्त नहीं कर पाता, जिसमें सामान्य चेतना के समस्त तत्वों का नितांत अभाव होता है। इसी कारण वहिर्मुखी रहस्यवाद को अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण स्वीकार किया गया है। स्टेस् के अनुसार बहिर्मुखी रहस्यवाद अन्तर्मुखी रहस्यवाद की आरम्भिक अवस्था जिसके पश्चात् रहस्यावादी रहस्यात्मक अनुभव की उच्चतम स्थिति को प्राप्त करने में समर्थ होता है।13
गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वरूप की प्राप्ति शरीर की प्राप्ति से भिन्न है। मेरा जन्म इन आंखों से नहीं देखा जा सकता, मैं अजन्मा अव्यक्त शाश्वत होते हुए भी शरीर के आधार वाला हूं।14 बहिर्मुखी रहस्यवाद के अन्तर्गत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि रहस्यमय संसार एक वृक्ष है उसको काटते हुए भी योगी जन उस परमपद या अन्तर्मुखी रहस्यवाद को खोजते हैं।15 जिसने उस रहस्यमय संसार वृक्ष को जाना है उसने वेद को जाना है न कि ग्रन्थ पढ़ने वाला। इस रहस्यमय संसार वृक्ष तीनों गुणों द्वारा बढ़ी हुई विषय और भोग रूपी अंतिम जन्म वाली शाखाएं नीचे और सर्वत्र फैली हुई हैं तथा केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बंधन तैयार करती है। परन्तु इस रहस्यमय संसार वृक्ष का रूप जैसा कहा गया है वैसा यहां नहीं पाया जाता है क्योंकि न तो इसका आदि है न अंत है और न ही अच्छी प्रकार से इसकी स्थिति ही है। क्योंकि यह परिवर्तनशील है और वाह्य रहस्य का विषय बना हुआ है। यहां सहजतः प्रश्न उठता है कि इस बहिर्मुखी रहस्य का मूल कौन है? उल्लेखनीय है कि बहिर्मुखी रहस्यवाद को वास्तविक अर्थ में रहस्यवाद कहना कठिन है। कारण यह है कि इस प्रकार के रहस्यवाद में, रहस्यवाद निरन्तर वाह्य जगत के संपर्क में बना रहता है। जिसके फलस्वरूप वह रहस्यात्मक अनुभव की  उस असाधारण स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता है16 जो रहस्य का मूल है।
गीता में कहा गया है कि इसके मूल में तो स्वयं परमात्मा ही बीज रूप से प्रसारित है। उस परम को करने के लिए समर्पण आवश्यक है। वही परमतत्व ही रहस्यमय संसार का मूल है।
अन्तर्मुखी रहस्यवाद-
इसके अन्तर्गत रहस्यवादी वाह्य जगत के स्थान पर अपने ही भीतर आध्यात्मिक सत्ता का साक्षात अनुभव करता है, तो उस स्थिति को अन्तर्मुखी रहस्यवाद की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसमें रहस्वादी पूर्णतः अन्तर्मुखी हो जाता है। प्रश्न उठता है कि अन्तर्मुखी रहस्यवाद के अनुभव को प्राप्त करना कैसे सम्भव है प्राचीनकाल से ही अनेक योगी विभिन्न प्रकार के योग साधनाओं से इस अनुभव की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहे हैं, योग दर्शन में वर्णित यम, नियम, आसन, प्रणायाम, ध्यान धारणा आदि उपाय इस रहस्यात्मक अनुभव को प्राप्त करने में सहायक होते हैं। गीता में कहा गया है कि योग में स्थित होकर किया हुआ कर्म न केवल उच्चतम होता है अपितु अत्यन्त विवेकपूर्ण, लौकिक व्यवहार के लिए भी अत्यन्त बल युक्त होता है। परमतत्व परमेश्वर के ज्ञान और इच्छा से अनुप्राणित रहता है17 रहस्यमय परमतत्व परमातम समस्त ज्योतियों की भी परमज्योति है18 अभिन्न भाव से प्रत्यक्ष हो जाना ही उसकी प्राप्ति है। वैराग्य को भी रहस्यात्मक अनुभव प्राप्त करने का साधन माना जाता है19
गीता में स्पष्ट किया गया है कि रहस्यमय परमतत्व परमात्मा सबके हृदय देश में अन्तर्यामी रूप से रहता है फिर भी लोग अपने में स्थित नहीं मानते एतदर्थ उनका अज्ञान जनित अन्धकार बना रहता है।20
रहस्यमय परमतत्व परमात्मा को प्राप्त करने के सम्बन्ध में गीता कर्म भक्ति और ज्ञान तीन मार्गों को प्रदान बताते हुए तीनों में समान भाव से सन्तुलन बनाए रखती हैं। कहीं ज्ञान पर बल प्रदान करती हैं, तो कहीं कर्मों पर, कहीं भक्ति पर, परन्तु उसका ऐसा करना तत्कालीन विचार प्रसंग के कारण है। इसका कारण यह नहीं है कि वह इनमें से किसी एक को दूसरे से सर्वथा श्रेष्ठ मानती है गीता का स्पष्ट मद है कि अपनी आत्मा को जानो बह्म समझो दूसरे समस्त जीवों के आत्मा के साथ एक जानो21 अन्तरात्मा को सम ईश्वर का एक अंश जानो22 सर्वप्रथम समस्त कर्म यज्ञ रूप में उस परमेश्वर को अर्पण करो23 जिससे कि वे जगत में तुम्हारे द्वारा अपनी इच्छा अपने कर्मों को सम्पन्न करें।
दार्शनिक समीक्षा-
 अन्तर्मुखी रहस्यवाद की इस असाधारण अनुभूति को भाषावद्ध करना असंभव है, क्योंकि रहस्यात्मक चेतना किसी वस्तु की चेतना नहीं है, अतः इसके समक्ष भाषा लड़खड़ाने लगती है। ईश्वर के बिना धर्म की सार्थकता सम्भव है, किन्तु रहस्वाद के बिना वह निःसार हो जाएगा। अतः रहस्यवाद धर्म का आधार स्तम्भ माना जाता है इस प्रकार धर्मविदों की मान्यता है कि रहस्यवाद धर्म का जीवन्त पक्ष है अन्यथा धर्म बाहरी आडम्बर तक ही सीमित रह जाएगा24 उपर्युक्त विवेचना को देखते हुए प्रश्न उपस्थित हो सकता है कि रहस्वाद की व्यावहारिक उपादेयता क्या है? रहस्यवादी अनुभव से जीेवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन देखा जाता है। व्यावहारिक उपादेयता ही है जो रहस्यात्मक असीम शक्ति की प्रेरणा से कर्म की कुशलता को प्राप्त कर लोक संग्रह की भावना से कर्म करता है। धर्म में निहित रहस्यात्मक शक्ति ही व्यावहारिक पक्ष में क्रान्तिकारी परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारक है इसलिए गीता में कहा गया है कि यह उच्चतम रहस्य ऐसे पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करता है जिसमें दिव्य शान्ति, दिव्य कर्म और दिव्य ज्ञान का भाव है जिसमें कर्म और आनन्द पूर्ण स्वतन्त्रता के साथ मिले हुए हैं। इस प्रकार उपर्युक्त रहस्यमय योग को व्यावहारिक उपादेयता के आधार पर इन्कार नहीं किया जा सकता25 डाकू को संत तथा व्यभिचारी को सदाचारी के रूप में परिवर्तित होना रहस्यवाद के ही व्यवहारिकता का परिचायक है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि रहस्यवाद के विरूद्ध आपत्तियों के होते हुए भी रहस्यवाद निर्थक नहीं है। क्योंकि रहस्यानुभूति की अभिव्यक्ति धार्मिक भाव में होती है जो स्वभाव से विरोधाभाषात्मक है। रहस्यवाद मानसिक विकार न होकर इस विकार की औषधि है।
इस बुद्धि का विषय न होकर बोधि का विषय है26 इस अन्तर्मुखी रहस्यवाद के भावात्मक पक्ष के अन्तर्गत सभी कार्य लोक संग्रह की भावना से होता है। इसके विपरित निषेधात्मक एकता में, साधक का ध्यान ईश्वर पर ही केन्द्रित रहता है जो जागतिक विषय एवं वस्तुओं को नीरस समझता है। इस प्रकार गीता का रहस्यवाद संगतमत किसी न किसी रूप में लोक संग्रह की अवधारणा से आबद्ध है।
संदर्भ सूची
1 श्री मद्भगवद्गीता 3ध्7ण्
2 चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, भगवद्गीता सस्ता साहित्य मण्डल नई दिल्ली    2001 पृष्ठ 12.13ण्
3 बालगंगाधर तिलक ;अनुवादक श्री माधव राव जी सप्रेद्ध श्री मद्भगवद्गीता रहस्य पूना अठारहवा संस्करण 2002 पृष्ठ15 प्रस्तावना
4 श्री मद्भगवद्गीता 2ध्11ण्
5 गीता3ध्33ण्
6 गीता शांकर भाष्य 2ध्11ण्
7 डाॅ दुर्गादत्त पाण्डेय धर्म दर्षन का स्वरूप षेखर प्रकाषन इलाहाबाद संस्करण 2002 पृष्ठ146
8 गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस 1ध्139ध्3ण्
9 श्री मद्भगवद्गीता एवं यो वेत्ति तत्वतः
10 स्वामी रामसुखदास श्री मद्भगवद्गीता साधक संजीवनी टीका गीता प्रेस गोरखपुर संवत छत्तीसवां संस्करण- पृष्ठ273
11 गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस 1ध्17ध्3.4ण्
12 वेद प्रकास वर्मा धर्मदर्षन की मूल समस्याएं हिन्दी कार्यान्वयन निदेषालय दिल्ली विष्वविद्यालय संस्करण 1991 पृष्ठ 209
13 डब्लू डी स्टेस लेख दि टीच्ंिाग आॅफ दि मिस्टेक्स ब्रोडी द्वारा ंसंपादित रीडिंग्स इन दि फिलॅासफी आॅफ रिलीजन एन एनालिटिकल अप्रोच में संकलित पृष्ठ503
14 श्री मद्भगवद्गीता 4ध्3ण्
15 वही 4ध्5ण्
16 स्वामी अड़गड़ानंद यथार्थ गीता आश्रम ट्रस्ट 29 अफ्रेन्च रोड मर्चेन्ट क्लब सामने चैपाटी मुंबई संस्करण 2006दिसंबर  पृष्ठ289
17 वेद प्रकाष वर्मा धर्म दर्षन की मूल समस्याएं पृष्ठ2009
18 श्री मद्भगवद्गीता 15ध्3ण्
19 श्री मद्भगवद्गीता 5ध्21.5ध्24ण्
20 श्री मद्भगवद्गीता
21 गीता 13ध्17ण्
22 बृहदारण्यक उपनिषद 4ध्41ध्61  ब्रह्मैव सन ब्रह्माप्यैति पृष्ठ 311ण्
23 वेद प्रकाष वर्मा धर्मदर्षन की मूल समस्याएं
24 जय दयाल गोयंदका गीता तत्व विवेचनी टीका गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण2060 ग्यारहवां संस्करण   10ध्11ण्
25 श्री मद्भगवद्गीता 5ध्7ण्
26 श्री मद्भगवद्गीता  15ध्7ण्