Friday, 1 July 2011

पाश्चाŸय समीक्षकों की दृष्टि में महाकवि कालिदास

लेखकः विनय कुमार त्रिपाठी
शोधच्छात्र
संस्कृत विभागः
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद

 संस्कृत वाड.मय की अजस्र धारा में प्रवाहित होने वाले अनेक कवियों ने अपना अप्रतिम योगदान दिया है। किन्तु महाकवि कालिदास इनमें से ऐसे माणिक्य है जिनकी आभामयी क्रान्ति सम्पूर्ण संस्कृत वाड.मय को अलौकिक आभा से शोभायमान करती है। संस्कृत वाड.मय को वस्तुतः हमारे भारतीय चिन्तकों के अलावा अनेक पाश्चात् चिन्तकों ने भी मुक्तकण्ठ से अपने समीक्षात्मक मतों की स्थापना की है।
ावाणी के चिरवाग्विलास महाकविकुलगुरू कालिदास भी आर्ष चिन्तकों की इस महनीय परम्परा से अपने-आप को अछूता न रख सके और अपने जीवन का यत्किग्चिदपि परिचय न देते हुए भारतीय मनीषियों की इस परिपाटी का अनुपद अनुसरण करना ही अपना कर्तव्य माना। इसलिए हमें महाकवि की जीवनी, निवास-स्थान एंव काल-निर्णय आदि के लिये कोई भी तथ्य उनकी कृतियांे में प्रायः न प्राप्त होने के कारण एतदर्थ परमुखापेक्षी ही रहना पड़ता है।
वस्तुतः महाकवि के जन्म स्थान, जीवनवृत्त एवं समय-निर्धारण आदि पक्षों की निर्विवाद प्रस्तुति तो असम्भव ही है, क्योंकि किसी ठोस प्रभाव के अभाव में उक्त समस्या आज भी विद्वानों के सम्मुख प्रश्नचिन्ह के रूप में अंकित है। विश्व के महान वक्ता सुकवि के जीवन-चरित के विषय में प्रायः सभी पाश्चात्य और पौरस्त्य विद्वानों ने लेखनी उठाई है, किन्तु कालिदास के वैयक्तिक जीवन का अविकल आकलन अद्यावधि विवादग्रस्त बना हुआ है।
इस शोधपत्र में महाकवि कालिदास के जीवन वृत्त एवं कृतियों आदि का संक्षिप्त परिचय पाश्चात्य समीक्षकों की दृष्टि में प्रस्तुत करना उपादेय है। वस्तुतः यदि कवि के वैयक्तिक जीवन की संधारणा मेें सूक्ष्म अनुसन्धानात्मक दृष्टिपूर्वक गम्भीर विचार किया जाए तब तों केवल कालिदास के काल-निर्धारण जैसी एक ही समस्या पर एक पृथक् शोध- प्रबन्ध लिखा जा सकता है। किन्तु यहाॅ प्रमुख बिन्दुओं में आधार पर पाश्चात्य समीक्षकों के मत मतान्तरों का ही पुर्नमूल्यांकन करना शोध पत्र का प्रमुख ध्येय है।
1. काल निर्धारण-
क- छठी शताब्दी ईसवी का मतः- महाकवि के काल -निर्णय के सम्बन्ध में विद्वानों ने विभिन्न मत-मतान्तरों की उद्भावना की है। ’हार्न ले’ तथा फर्गुसन के मतानुसार कालिदास को विक्रम संवत् के प्रर्वतक विक्रमादित्य से सम्बद्ध करते हुए कहा है कि हर्ष विक्रमादित्य नामक राजा ने ही शंकों तथा मलेच्छों पर विजय प्राप्त करने के बाद विक्रम संवत का प्रवर्तन करते हुए उसकी गणना 57ई0पू0 में प्रचलित मालवसंवत् से प्रारम्भ की, कालिदास सम्भवतः इसी नरेश के सभा कवि थे।1 मैक्समूलर ने फर्गुसन से सिद्धान्त के आधार पर ’पुनर्जागरणवाद’ का सिद्धान्त स्वीकार किया है। उनके अनुसार शकों तथा अन्य विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण से ईसवी की प्रथम दो शताब्दियों में भारतीयों की साहित्यिक प्रगति एकदम अवरूद्ध हो गयी थी और  संस्कृत काव्यधारा जो लगभग पाॅच शताब्दियों तक निष्क्रिय सी हो गई थी, वह उज्जयिनी नरेश विक्रमादित्य के शासनकाल में पुनरूज्जीवित तथा लब्धप्रकर्ष हो उठी। कालिदास का उदय सम्भवतः इसी युग में हुआ था।2, डाॅ0 केर्न तथा भण्डारकर ने कालिदास तथा वराहमिहिर के ग्रन्थों में उपलब्ध समानता के आधार पर दोनों को समसामयिक सिद्ध करने का प्रयास किया है।3 मिराशी के अनुसार कालिदास के ग्रन्थों में ज्योतिर्विषयक उल्लेखों के आधार पर भी कालिदास का समय छठी शताब्दी ईसवी निर्धारित किया गया है।4 पी0वी0 काणें के अनुसार कामन्दकी नीतिसार में उल्लिखित संकेतों के आधार पर यह निर्धारित करने का प्रयास किया है, कि कालिदास निश्चित ही छठी शताब्दी ईसवी में हुए है।5
किन्तु ’‘दि एपिग्राफिकल रिसर्चेज आॅफ मिस्टर फ्लीट नामक पुस्तक में फुर्गसन के मत का खण्डन करते हुए डोनल महोदय ने कहा है कि फ्लीट के अनुसंधानों से यह निष्कर्ष निकलता है कि  57 ई0पू0 में प्रारम्भ विक्रमसंवत् 544 ई0 में स्थापित विक्रमसंवत् से अति प्राचीन है तथा लगभग शताब्दियों पहले से ही मालव संवत् के नाम से प्रयुक्त हो रहा था। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि छठी शताब्दी ईसवी के मध्य  पश्चिमी  भारत से किसी शक को नहीं भगाया गया, क्योंकि शताब्दियों पहले गुप्त सग्राटों द्वारा सम्पूर्ण देश विजित हो चुका था।6 इस प्रकार छठी शताब्दी ई0 के मत के निरस्त हो जाने के साथ उन विद्वानों के मत का भी खण्डन हो जाता है जो कालिदास का समय सातवी तथा ग्यारहवीं शताब्दी ई0 नियत करने का निष्फल प्रयास करते है।7
ख- तृतीय शताब्दी इसवी का मत- प्रसिद्ध ज्योतिर्विद श्री द0वे0 केतकर ने कतिपय ज्योतिष विषयक उल्लेखों के आधार पर कालिदास का समय 280 ई0 के आस-पास रखने का प्रयास किया।8 किन्तु प्रो0 मिराशी ने उक्त मत को कल्पना कहकर असंगत स्वीकार किया।9
ग- गुप्तकालीनमत- प्रो0 लेसां कालिदास को समुद्रगुप्त का सभाकवि मानते है उनका अनुभव है कि समुद्रगुप्त स्वयं महान कलाकार, साहित्यसेवी, विद्वान और कवियों का आश्रयदाता था। इसलिये उसे ’कवियों का मित्र’ की उपाधि दी गई थी। ऐसा शिलालेखों में उल्लिखित है। समुद्रगुप्त का समय तृतीय शताब्दी ईसवी माना जाता है। एम0 विलियम्स ने भी इस मत का समर्थन किया है। किन्तु कुछ लोगों ने इसे निराधार मानते हुए कहा है कि यह तर्क बहुत निर्णायक नहीं, क्योंकि ऐसी उपाधि तो मालव सम्राट शिलादित्य, कन्नौज नरेश हर्षवर्धन आदि अनेक राजाओं को दी गई है।10 प्रो0 मिराशी ने भी कालिदास का समय चतुर्थ शताब्दी ईसवी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का आरम्भ माना है।11
मैकेडोनल ने अपनी पुस्तक भ्पेजवतल व िजीम ैंदेातपज स्पजमतंजनतमं में कालिदास को गुप्तवंशीय सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) का समसामयिक माना है। डाॅ0 स्मिथ ने भी कालिदास का समय चन्द्रगुप्त द्वितीय के समसामयिक ही मानते है। 12 प्रो0 कीथ महोदय ने भी कालिदास का समय अश्वघोष और भास के अनन्तर मानते हैं।13
प्रो0 बेबर की सम्मति में कालिदास के तीनों नाटक ईसवी सन् की द्वितीय शताब्दी से चतुर्थ शताब्दी तक के समय में लिखे गये थे मोनियर विलियम और ब्ण्भ्ण् ज्ंूदमल ने इस मत को स्वीकार किया है।14
2- स्थानः-
प्रत्येक मनुष्य की यह तीव्र कामना होती है कि उसकी जन्मभूमि किसी महापुरूष की जननी होने का गौरव प्राप्त करे। यही कारण है कि भारत भूमि का प्रत्येक प्रान्तीय कवि कुलगुरू कालिदास को अपने प्रान्त का निवासी मानने को उद्यत दिखाई देता है। विद्वानों द्वारा विभिन्न उक्तियों के आधार पर प्रकल्पित ये मत-राशि आनेक हैं। जैसे बंगाल वासी इन्हे बंगाल का मानते है। क्योंकि उनके यहाॅ ‘‘कालिदासोत्सव’’ मनाया जाता है।15 कश्मीर वासी इन्हें कश्मीर का मानते है।16 डाॅ0 पीटरसन ने इन्हें विदर्भ वासी स्वीकार किया।17 आर0सी मजूमदार ने भी इन्हें विदर्भ का माना।18 कतिपय विद्वानों ने मेघदूत में विदिशा नगरी के वर्णन प्रसंग के आधार पर कालिदास का जन्म स्थान ‘विदिशा’ स्वीकार किया है।19 ‘उज्जयिनी’ पुरी के प्रति अनेक भावपूर्ण वर्णनों के आधार पर विन्टर नित्स जैसे कतिपय वरिष्ठ विद्वानों ने मालवा प्रदेश में स्थित ‘उज्जयिनी’ नगरी को ही महाकवि कालिदास की जन्मभूमि माना है।20
3- सम्भावित जीवन गाथा:-
(क). एक उपाख्यान के अनुसार कालिदास वस्तुतः जन्मना ब्राह्मण थे। किन्तु अत्यन्त बाल्यकाल में ही उनके माता-पिता दिवंगत हो गये थे, और उनका पालन-पोषण एक ग्वाले ने किया था। जीवन के प्रारम्भ काल में वे अनपढ़ और गंवार ही थे। वाराणसी के राजा ने अपनी पण्डिता पुत्री वासन्ती का विवाह राजपण्डित वररूचि से करना चाहा, किन्तु राजकन्या ने वररूचि को अपनी योग्यता के अनुरूप न मानकर विवाह करने से अस्वीकार कर दिया। परिणामतः वररूचि ने प्रतिशोध की भावना से इस मूर्ख ब्राह्मण कुमार को विद्वान ब्राह्मण के रूप में सुसज्जित एंव सम्मानित करके केवल राजा के प्रति ऊॅ स्वस्ति- रूप आशीर्वचन करने का निर्देश दिया, साथ ही अन्य किसी सदस्य के किसी भी पश्न का उत्तर न देने को कहा। राजदरबार में पहुॅचकर उस मूर्ख ब्राह्मण -कुमार ने पूर्वनिर्दिष्ट योजना के अनुसार व्यवहार किया, और राजकन्या से उसका विवाह सम्पन्न कर दिया गया। विवाह के अनन्तर दो-चार दिनों में राजकन्या ने उसे मूर्ख जान कर उसे कालीदेवी की आराधना करने को कहा। तब वह काली-मंदिर में जाकर अत्यन्त श्रद्धापूर्वक देवी की आराधना करने लगा। उसकी दृढ़भक्ति एंव विश्वास देखकर देवी ने प्रसन्न होकर उसके शीश पर वरदहस्त रखा, और वह वरदान के प्रभाव से अत्यन्त प्रतिभासम्पन्न विद्वान एंव कवि बन गए। एतदर्थ ही उनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया।21
एक अन्य आख्यान भी उपलब्ध होता है, जिसके अनुसार कालिदास ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुए थे। शैशवावस्था में ही अनाथ हो जाने से आठ वर्षों तक एक ग्वाले ने उनका पालन-पोषण किया, परन्तु परिस्थितिवश वे किसी भी प्रकार की कोई शिक्षा न प्राप्त कर सके। जिस नगरी में वे रहते थे, वहाॅ के राजा ने अपनी विदुषी पुत्री के विवाह-योग्य वर की खोज में अपने अमात्य को नियुक्त कर रखा था। जिसने राजकुमारी के प्रति प्रतिकार की भावना से उसका विवाह मूर्ख वर से कराने का विचार किया। संयोगवश गोप-बालकों के साथ इधर-उधर घूमते हुए उसकी मूर्ख ब्राह्मणपुत्र पर उसकी दृष्टि पड़ी। वह उसे सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलंकृत करके अनेक नवयुवक पण्डितों के साथ राजदरबार में ले आया, और उसे काशी से आया हुआ महापण्डित बताकर वैदुष्यपरीक्षण हेतु निवेदन किया। राजा की आज्ञा के अनुसार अनेक सभा-पण्डित शास्त्रार्थ-हेतु तैयार हुए, किन्तु वे सभी उसके शिष्यों द्वारा परास्त हो गए। तत्पश्चात् उस ब्राह्मण कुमार के बुद्धि-परीक्षण का विचार न करके राजकन्या से उसका विवाह सम्पन्न कर दिया गया। किन्तु कालान्तर में उसकी मूर्खता देखकर राजकन्या बहुत संक्षुब्ध हुई, और उसने उसे कालीदेवी की उपासना के लिये प्रेरित किया। उसने पत्नी के निर्देशानुसार बड़ी तन्मयता से देवी की आराधना की, और देवी की कृपा से दिव्य-मन्त्राक्षर प्राप्त करके समस्त विद्याओं में पारंगत हो गया। इसके बाद उन्होंने उस राजकन्या को पत्नी के रूप में न मानकर माता एवं गुरू के समान पूज्य माना। जिससे उसके क्रुद्ध होकर स्त्री के ही हाथ से मृत्यु होने का शाप दिया।23 उनका अधिकांश समय वेश्याओं की संगति में बीतने लगा। एक बार राजा भोज ने एक श्लोक का प्रारम्भिक पाद बनाकर एक वेश्या के घर की दीवार पर लिख दिया24, और उसकी पूर्ति करने वाले को पुरस्कार देने की घोषणा की। उसी वेश्या के यहाॅ कालिदास ने यह घोषणा सुनकर इस श्लोक की पादपूर्ति करके उसी दीवार पर आगे लिख दिया। किन्तु वेश्या ने पुरस्कार के लोभवश उनकी हत्या कर दी।25
महाकवि कालिदास के प्रारम्भिक जीवन, जन्मकुल माता-पिता, स्त्री वंशपरम्परा आदि के विषय में निश्चित प्रमाण के अभाव में पश्चात् मतों में कुछ कह पाना असम्भव है। किन्तु कालिदास की रचनाओं का सर्वेक्षण करने पर यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि ब्राह्मण-संस्कृति के उन्नायक एंव पोषक होने के कारण वे स्वयं भी जन्मना ब्राह्मण तथा शिवोपालक थे। डा0 गिराशी ने उनकी कृतियों में उपलब्ध वैदिक कल्पनाओं एंव मान्यताओं के आधार पर उन्हें ब्राह्मण जाति का बताया है।25 महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने उन्हें मन्दसौर-वासी कहते हुए मन्दसौरा ब्राह्मण कहा है, किन्तु शास्त्री जी का यह विचार अधिक समीचीन नहीं प्रतीत होता, क्योंकि मन्दसौर की अपेक्षा उज्जैन के साथ उनका अधिक सम्बन्ध प्रतीत होता है।26
कालिदास की रचनाओं मंें उल्लिखित आश्रम-व्यवस्था, गुरूकुल नियम, अध्ययन क्रम27, चैदह विधाओं के अध्ययन-अध्यापन का प्रतिपादन,28  वैदिक स्वर-विन्याय यजुर्वेदीय -अश्वमेघादि यज्ञिय कर्म तथा ब्राह्मण-ग्रन्थों के आधार पर की गई अविकल -कल्पनाएॅ उनका वेदविद्या में पारंगत होना प्रदर्शित करती है29
4- काव्यकला:-
महाकवि कालिदास की काव्यकला के सम्बन्ध में मेक्डोनेल साहब का कथन है कि ‘‘उनके भाव-सामजंस्य में कहीं भी विरोधी भावनाएॅ नहीं आने पायी। उनके प्रत्येक आवेग में कोमलता है। उनके प्रेम का आवेश कभी भी सीमाआंे का उल्लंघन नही करता। उन्होनें प्रेमी को सदा ही संयत, ईष्र्यारहित, एंव घृणा वियुक्त रूप मे ंचित्रित किया है। कालिदास की कविता में भारतीय प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप समाविष्ट है। उनके काव्य में ऐसा सामंजस्य है, जो अन्यत्र देखने को नही मिलता।30
5- रचनायें:-
आफ्रेक्ट महोदय अपनी ‘वृहत्संस्कृत ग्रन्थ सूची में कालिदास के नाम से प्रचलित लगभग तीस-पैतींस ग्रन्थों की संख्या का निर्देश करते है। जिसमें काव्यों एंव नाटकों में अतिरिक्त ज्योतिष देव स्तुति एंव रत्न पत्रिका आदि विभिन्न विषयों के ग्रन्थों का परिगणन किया गया है।31 इनमें से कुछ ग्रन्थ तो कालिदास के नाम पर गढ़े हुए है और कुछ सम्भवतः परवर्तीकालीन कालिदास नामधारी कवियों द्वारा  प्रणीत होंगें।
‘‘आर0डी0 कर्मकर‘‘ ने आधुनिक खोजों के आधार पर कालिदास की कृतियों की नामावली और उसका क्रम इस प्रकार किया है ‘‘ऋतुसंहार, कुमार संभव (आदि भाग), मालविकाग्निमित्र, कुमारसंभव (अन्तिम भाग) विक्रमोर्वर्शीय, मेघदूत, रघुवंश औरअभिज्ञान शकुन्तलम्32 किन्तु डाॅ उमारानी त्रिपाठी ने अपने शोध प्रबन्ध में कालिदास के रचनाओं का क्रम कुछ इस प्रकार सिद्ध किया है- ऋतुसंहार, कुमार सम्भव मेघदूत, रघुवंश मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय, अभिज्ञान शाकुन्तल।33
1. ऋतुसंहार-
ऋतुसंहार महाकवि कालिदास की आदि कृति मानी जाती है। इसे संस्कृत काव्य-साहित्य में ़ऋतुपरक वर्णन पर सर्वप्रथम एंव अन्तिम काव्य होने का गौरव प्राप्त है। इसे छः सर्गों में छः ऋतुओं का वर्णन है। यह काव्य प्रत्येक पंक्ति में यौवन की अभिव्यक्ति करता है। इसमें नैतिक संस्पर्श का अभाव34 युवकों के दृष्टिकोण से पूर्णतया मेल खाता है।
मेघदूत - संस्कृत वाड्मय के गीतिकाव्यों में मेघदूत का स्थान अग्रगण्य है। इसको 121 पद्यों द्वारा पूर्वाध एंव उत्तरार्ध दो भागों में बांटा गया है। इसके द्वारा कवि ने एक वियोग विधुर यक्ष की विरहव्यथा का मार्मिक चित्रण किया है। जिसका पूर्वभाग वाह्य प्रकृति के नैसर्गिक वर्णन से परिपूर्ण है तथा उत्तरभाग अन्तःप्रकृति की सहज सम्प्रेषणीयता से युक्त दृष्टिगोचर होता है। समूचे भाव में विरही यक्ष की उत्कण्ठा, सूक्ष्मभावना प्रवेश मानव-मन के अन्तस्थल को बड़ी गहराई से छू लेता है। शिलर ;ैबीपससमतद्ध के मैरिया स्टुअर्ट ;डंतपं ेजनंतजद्ध की भाॅति विवशता अथवा निराशा से अनिवार्य मृत्यदण्ड की प्रतीक्षा करते हुए किसी निरूपाय बन्दी के द्वारा यदि मेघदूत जैसा संदेश भेजा गया होता तो उसका बिलकुल दूसरा ही प्रभाव होता। परन्तु इस कविता को उचित रूप से समझने के लिए हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि कालिदास के अनुसार जैसा कि उत्तरकालीन लेखक स्पष्ट रूप से कहते है, ‘‘कवि का कर्तव्य अर्थ की अभिव्यंजना करना है न कि उसे स्पष्ट रूप से कह देना‘‘। दो अमरों का प्रेम मानवी प्रेम का प्रतीक है, सम्भवतः इस विषय में कालिदास का कुछ निजी अनुभव था।35 संस्कृत साहित्य में श्रीमद्भगवद् गीता के पश्चात मेघदूत पर सबसे अधिक टीकाएॅ लिखी गयी।36
3. कुमारसम्भवः-
कुमारसम्भव कालिदास कृत प्रथम महाकाव्य है इसमें कवि ने पहली बार मानवी धरातल से ऊपर उठकर दैवी स्वरूप को अपनी काव्य प्रतिभा का विषय बनाया है। इसमें कुल 17 सर्ग है।  जिसमें हिमालय के यहाॅ पार्वती जन्म, शिव से विवाह तथा तत्फलक कुमार कार्तिकेय का जन्म तथा तारकासुर वध तक की कथा वर्णित है।
कुमारसम्भव विषय की अधिक विविधता, उज्जवल कल्पना और दीप्ततर भावों के कारण आधुनिक रूचि के अधिक अनुकूल है। ए0वी0 कीथ के अनुसार कुमारसम्भव के आरम्भिक आठ सर्गो की अपेक्षा आगे के नवम से लेकर सप्तदशसर्ग की रचना शैली में भी भाषा भाव की दृष्टि से शैथिल्य दृष्टिगत होता है। साथ ही इन सर्गो में पूर्व के सर्गो की अपेक्षा श्लोक संख्या भी कम मिलती है। अतएव कुछ विद्वानों का मत है कि नवम से लेकर सप्तदश सर्ग की रचना किसी परवर्ती कवि ने की होगी।37
4. रघुवंश महाकाव्य -
रघुवंश महाकाव्य कालिदास की परिपक्व प्रज्ञा एंव प्रौढ़ -प्रतिभा का प्रस्फुट स्वरूप प्रस्तुत करता है। इसकी रचना कुल उन्नीस सर्गो में निबद्ध की गयी है। यह काव्य वंशानुचरित का एक प्रकार है। जिसमें काव्यात्मक शैली में सूर्यवंशीय तीस नरेशों का जीवनवृत्त वर्णित है। प्रबन्धकाव्य के समस्त वैशिष्ट्य से युक्त भारतीय संस्कृति का विराट स्वरूप उपस्थिति करने वाला यह काव्य संस्कृत का विराट स्वरूप उपस्थित करने वाला  यह काव्य संस्कृत साहित्य का अद्वितीय महाकाव्य है।38
5- मालविकाग्निमित्र:-
क्रान्तदर्शी मनीषी कवि कालिदास की सर्वातिशायिनी प्रतिभा न केवल काव्य जगत् में दी प्रत्युत नाट्य जगत् में ही प्रत्युत नाट्य जगत् में भी स्वच्छन्द भाव से विहार करती हैं। कालिदास विरचित नाट्यकृतियों में मालविकाग्निमित्र प्रथम परिगणनीय है। इसके पाॅच अंको में राजा अग्निमित्र तथा मालविका की प्रणय कथा वर्णित है। नाटक में संवाद सरस एवं प्रेषकों की भाॅति ने अनुकूल बनाये गये हैं। किन्तु रोचकता होने पर भी इसमें भाव एंव चरित्र -चित्रण में गम्भीर्य नहीं पाया जाता।39
6- विक्रमोर्वशीय:-
विक्रमोर्वशीय ‘नाट्यकला की दृष्टि से कालिदास का दूसरा नाटक है पाॅच अंको में निरूपित इस नाटक में राजा पुरूरवा और उर्वशी नामक अप्सरा की प्रणय -कथा वर्णित है। नाटक का कथानक जो ऋग्वेद तथा शतपथ ब्राह्मण की कथा के आधार पर कल्पित किया गया है।40 इस वैदिक आख्यान को कवि ने भाषा, भाव, और शैलीगत मौलिकता से अत्यन्त रमणीय रूप प्रदान किया है। नाट्य-शास्त्र की दृष्टि से यह ‘‘त्रोटक‘‘ नामक उपरूपक की श्रेणी का दृष्यकाव्य है।41 इस नाटक में कवि की कल्पनाशक्ति सुन्दरतम् रूप में प्रस्फुटित हुई है।
7- अभिज्ञानशकुन्तलम -
अभिज्ञानशाकुन्तल न केवल महाकवि कालिदास का वरन् समूचे संस्कृत वाडंमय का सर्वोत्कृष्ट नाटक है। सात अंको में विभक्त इस नाटक में राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय, वियोग, पुनर्मिलन की कथा वर्णित की गई है। नाटक की कथावस्तु महाभारत के आदि पर्व में उल्लिखित ‘शकुन्तलोपाख्यान’ से संकलित है। किन्तु इस साधारण से इतिवृत को अपनी अपूर्व प्रतिभा द्वारा अनुपम नाटकीय रूप में ढाल दिया है। शब्दों के सुकुमार विन्यास, छन्दो के स्वर माधुर्य, सूक्ष्मव्यंजनावृति भाषा-सौष्ठव आदि विशिष्ट गुणों के कारण श्रृंगार प्रधान यह नाट्य कृति कालिदास की विश्वविश्रुत एवं सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है।
इस प्रकार शेक्सपीयर कहे जाने वाले महाकवि कालिदास, को इस शोधपत्र के माध्यम से प्रो0 मैक्समूलर, फर्गुसन, हार्नले, कर्नल विल्फोर्ड, जैकोबी, मेकनर बी0ए0 स्मिथ, ए0बी0 कीथ, मैक्डोनेल, विन्टरनित्स एंव पी.वी. कार्यों जैसे अनेक पाश्चात्य समीक्षकों के मतमतान्तरों के आधार पर महाकवि कालिदास के वैयक्तिक जीवन एवं उनकी रचनाओं का समाकलन किया गया।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1. हार्नले तथा फर्गुसन का मत- क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर एम0 कृष्णमाचारी पृ0 106, 107
2. ‘‘    ’’ पृ0 89, 107
3. डा0 केर्न तथा भण्डारकर का मत-क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर -एम0 कृष्णाचारी पृ0 109
4. मिराशी कृत कालिदास पृ0 24 - प्रो0 पी0सी0 सेनगुप्ता का मत- मिराशीकृत कालिदास, पृ0 27
5. पी0वी0 काणे का मत- क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर - एम0 कृष्णमाचारी  पृ0 108
6. पी0वी0 कावे का मत- क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर पृ0 89, 90
7. नावेल तथा पीटरसन का मत - सातवीं शताब्दी ई0 द्रष्टव्य कालिदास दर्शन, शिव प्रसाद भारद्वाज , भाग 1 पृ0 36
वेन्टले - ग्यारहवीं शताब्दी का मत - द्र0 - क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर एम0 कृष्णमाचारी पृ0 110
8. महाकवि कालिदास की दार्शनिकता - उमारानी त्रिपाठी पृ0 12
9. मिराशीकृत कालिदास पृ0 20
10. द्र0- प्रो0 लेसां का मत- क्लासिकल संस्कृत लिट्रेचर -एम कृष्णमाचारी पृ0 100
11. द्र0 - प्रो मिराशी कृत कालिदास पृ0 31-38
12. अभिज्ञान शाकुन्तलम् डाॅ निरूपण विद्यालंकार पृ0 17
13. प्रो0 कीथ के ष्। भ्पेजवतल व िैंदेातपज स्पजमतंजनतमष् का हिन्दी भाषान्तर  डाॅ मंगलदेव शास्त्री कृत सन् 1960
14. अभिज्ञान शाकुन्तलम् - डाॅ0- निरूपण विद्यालंकार पृ0 21
15. द्र0 गिराशीकृत कालिदास पृ0 53-57
16. प्रो0 लक्ष्मीधर कल्ला दि वर्थ प्लेस आॅफ कालिदास
17. थ्ण्ळण् च्मजमतेवद. । छवजम वद ज्ञंसपकंें . श्रवनतदंस व ित्वलंस ।ेेपंजपब ैवबपमजल . 1927   च्ण् 726
18. ।बबवतकपदह जव डंरनउकंत ष्भ्वउम जव ज्ञंसपकंेंश् प्दकपंद ।दजपुनंतल ग्स्टप्प् 264ए पज ूंे टंपकतइींण्
19. भ्ंतं  च्तंेंक ैंेजतप ज्ञंसपकंेीए ीपे ीवउम ख्श्रण्ठण् व्ैण् ;1916द्ध 15, ेंले ीपे इपतजी च्संबम ूंे क्ंेंचनतं पद डंसूंण्
20 विन्टरनित्स -भारतीय साहित्य का इतिहास भाग-3 1 पृ0 60.
21. अल्फ्रेन्ड हिलेब्राण्ट-कालिदास पृ02 तथा टिप्पणी नं-2 डण्ज्ण् डंतेपदीपमदहमत.प्दकपंद ।दजपुनंतल टवसण् 39ण् च्236
22. कमले कमलोत्पन्तिः श्रूयते न तु दृश्यते।
23. बाले तव मुखाम्भोजे कथमिन्दीवरद्वम्।।।
24. त्ण्टण् ज्नससन.ज्तंकपजपवदंतल ।बबवनदज व िज्ञंसपकंेी .प्दकपंद ।दजपुनंतल टवसण् 7ए 1879 च्ण् 115
25. डा0 मिराशी कृत कालिदास-पृ0 69
26. डा0 मिराशी कृत कालिदास पृ0 69
27. रधुवंश-1/35-95
28. रधुवंश-5/21
29. अल्फ्रेड हिलेब्राण्ट-कालिदास इन्ट्रोडक्शन, पृ0 5,6.
30. ए0ए0 मैक्डोनल - ए हिस्ट्री आॅफ संस्कृत लिटरेचर पृ0 353
31. डा0 मिराशी कृत कालिदास पृ0 087
32. आर0डी0 कर्मकर दि क्रोनोलाजिकल आर्डर आॅफ कालिदाससाज वक्र्स, प्रोसीडिंग्स आॅफ सेकेड ओरिएण्टल कान्फ्रेन्स पृ0 238
33. महाकवि कालिदास की दार्शनिकता- उमारानी त्रिपाटी पृ0 35
34. ैजमद्रसमर्त क् डळण् ग सपअण् 33 दण्3
35. ठींन क्ंरप स्पज त्मउण् च्च्ण् 50
36. संस्कृत साहित्य का अभिनव इतिहास - डा0 राघावल्लभ त्रिपाठी पृ0 190
37. ए0बी0 कीथ - संस्कृत साहित्य का इतिहास (हिन्दी अनुवाद) पृ0 110
38. डाॅ0 मिराशी कृत कालिदास पृ0 126
39. महाकवि कालिदास की दार्शनिकता प्रो0 उमारानी त्रिपाठी पृ0 63
40. ऋग्वेद 10/95 तथा श0ब्रा0 5, 1-2
41. साहित्यदर्पण - विश्वनाथ 6/273