Tuesday, 1 January 2013

छायावादी कवियो का रहस्यवादी चिन्तन


मधु श्रीवास्तव

रहस्यवाद का सम्बन्ध रहस्यानुभूति से है तथा रहस्यानुभूति का सामान्य अर्थ है, रहस्य की अनुभूति या कोई भी ऐसी अनुभूति जो मानव बुद्धि के समझ के बाहर हो, कोई ऐसा धार्मिक सत्य जिसका प्रकटीकरण केवल दैवी प्रेरणा से सम्भव है। इसका सम्बन्ध रहस्यवादी व्यक्ति के विचार, धारणायें, प्रवृत्तियाँ, आदते, अनुभूतियों आदि से होती है। उल्लासमय चिन्तन या ध्यान के द्वारा दिव्यशक्ति से तादात्म्य की सम्भावना में विश्वास और अन्तिम शक्ति और परमात्मा से एकता से तात्कालिक अनुभूति रहस्यवाद कही जा सकती है। रहस्यवाद पर अपने विचारो को व्यक्त करते हुए छायावादी युगीन कुछ महान साहित्यकारो के चिन्तन का अध्ययन प्रस्तुत है।

जिसमें सबसे पहले जयशंकर प्रसाद जी के रहस्यवादी चिन्तन को स्थान दिया गया है। प्रसाद जी का कहना है कि रहस्य भावना प्राचीन है, लेकिन रहस्यवाद आधुनिक है और हिन्दी में छायावादी काव्य आन्दोलन से सम्बद्ध है।1 प्रसाद जी का रहस्यवाद हिन्दी साहित्य में सम्भवतः इस तरह का पहला प्रयत्न है- ‘आँसू में वे लिखते है
‘‘शशि मुख पर घूँघट डाले, अंचल में दीप छिपाये, जीवन की गोधूली मे, कौतूहल से तुम आये।’’
प्रसाद जी की सभी रचनाओ में रहस्यवाद झलकता है। कामायनी की रचना भी उन्होंने रहस्यवाद के प्रभावान्तर्गत ही किया उसी के बाद वो आधुनिक मनु कहे जाने लगे,
‘विस्मृत आ अवसाद घेर ले, नीरवता बस चुप कर दे
चेतनता चल जा जड़ता से, आज शून्य मेरा भर दे।’
प्रसाद जी की अंतरनिहित रहस्यात्मक या आध्यात्मिक ध्वनि आद्यांत सुनाई पड़ती है। प्रसाद जी का रहस्यवाद आंसू के पद्यो में या कामायनी के अन्तिम सर्गो मे मानसिक सन्तुलन के रूप में प्रयुक्त हुआ है।2
इसी प्रकार महादेवी जी रहस्यवाद के सम्बन्ध में कहती है कि- ‘‘रहस्यानुभूति भावावेश की आँधी नही वरन् ज्ञान के अनन्त आकाश के नीचे अजस्त्र प्रवाहमयी त्रिवेणी है, इसी से हमारे तत्व दार्शनिक बौद्धिक तथ्य को हृदय का सत्य बना सके’’।3 उनके अनुसार- ‘‘आज गीत मेें हम जिसे रहस्यवाद के रूप में ग्रहण करते है वह इन सब की विशेषताओं से युक्त होने पर भी उन सब से भिन्न है। उसने परा विद्या की अपार्थिवता ली, वेदान्त के अद्वैत की छायामात्र ग्रहण की, लौकिक प्रेम से तीव्रता उधार ली और इन सबको कबीर के सांकेतिक भाव सूत्र में बाँधकर एक निराले स्नेह सम्बन्ध की सृष्टि कर डाली जो मनुष्य के हृदय को पूर्ण अवलम्ब दे सका, उसे पार्थिव प्रेम के उपर उठा सका तथा मस्तिक को हृदयमय और हृदय को मस्तिष्कमय बना दिया।’’4 महादेवी जी के रहस्यवादी चिन्तन को चार दृष्टिकोण से देखा जाता है5-
1. साधना मूलक रहस्यनुभूति- इस रहस्यानुभूति में योगी एवं साधक किसी ब्रह्म की जिज्ञासा, अखण्ड साधना तथा ब्रह्म-प्राप्ति का आनन्द सम्मिलित रखता है इसलिए रहस्यवाद या ऐसी रहस्यानुभूति के तीन अंग स्वीकार किये गये है; (1) जिज्ञासा, (2) साधना या प्रयत्न, (3) मिलन और आनन्द।
2. भावना मूलक साधना- इस रहस्यानुभूति में जायसी जैसे सूफी कवियों की भांति उस चेतन सत्ता को अनन्य सौन्दर्यशाली प्रियतम के रूप में मानकर साधक अपने सर्वस्व का परित्याग करता हुआ उसके साथ अलौकिक रति जैसी अलौकिक दाम्पत्य रति में लीन रहना तथा उसके साथ एकाकार हो जाना अधिक अच्छा समझता है।
3. माधुर्य भाव मूलक रहस्यानुभूति- महादेवी जी ने पार्थिव प्रेम एवं भौतिक पूजा में तो अपना विश्वास प्रकट नहीं किया है किन्तु फिर भी अपनी कविताओं में अक्षत, चन्दन, अगरू, धूप, आरती की लौ, अभिषेक, जल, पुष्प आदि सभी पूजा की सामग्रियाँ उपस्थित कर दी है। महादेवी जी में माधुर्य भाव से परिपूर्ण रहस्यानुभूति मिलती है।
4. मानव मूलक रहस्यानुभूति- इसमें सम्पूर्ण मानवता के अन्तर्गत व्याप्त चेतनता की वह अनुभूति आती है, जिसके फलस्वरूप एक कवि, साधक एवं लेखक सर्वत्र व्याप्त चेतन सत्ता का अनुभव करता है, सर्वत्र एक आत्मा का दर्शन करता है, जड़ चेतन में एक ही अगोचर सत्ता का प्रभाव देखता है। जिसकी अनुभूति सर्ववाद पर आधारित होती है ऐसे रहस्यवादी को मानव मात्र से अटूट प्रेम होता है। वह सम्र्पूण मानवता का पुजारी बन जाता है और मानवता के सुख दुःख में अपने सुख-दुःख का दर्शन करता है।6
महादेवी जी के समान पंत जी का भी रहस्यवादी चिन्तन उनकी कविताओं में अभिव्यक्त हुआ है। पंत जी का रहस्यवाद प्रकृति से जुड़ा है। उनके विचार एवं जिज्ञासा, शिशु-सुलभ सरलता के साथ प्रकट हुई है। पंत की बाल-जिज्ञासा मे नवीन हृदय के प्रति जो विस्मय और कुतूहल का भाव दिखाई पड़ता है वह भी उसी रहस्य भावना का एक रूप है।12 पंत जी का ‘मौन निमंत्रण’ उसी रहस्य और जिज्ञासा की अभिव्यक्ति है जो किसी अज्ञात की ओर निश्चित संकेत अथवा प्रकृति के क्षेत्र में किसी अभिव्यक्त सौन्दर्य या माधुर्य से उठे हुए आह्लाद की अनुभूति की व्यंजना करती है। इसी को आचार्य शुक्ल ने स्वाभाविक रहस्यवाद माना है।
पंत जी की रहस्यात्मक कविताओं में प्रकृति को कहीं ‘वाह्य प्रकृति’ कहलाने का अवसर प्राप्त नही हुआ। पंत जी के ‘उच्छवास’ में भी रहस्यवाद की झलक मिलती है। पंत जी की कल्पना अपना चमत्कार उनकी रचनाओं में दिखाती रही है। पंत जी श्रृंगारी कवि भी है। उनकी प्रायः सभी रचनाओं में रहस्यवाद झलकता है, परिवर्तन में शाश्वत सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति देखने, उसका रहस्य जानने की उत्कण्ठा दिखायी पड़ती है। उनकी कल्पना की अभिव्यक्ति मधुवन, अप्सरा, अनंग, प्रथम रश्मि आदि कृतियों में प्रधान है। उन्होंने ‘एकतारा’ में गहन आत्मदर्शन की अभिव्यक्ति की चेष्टा की है।’’7
निराला जी का रहस्यात्म चिन्तन एवं विश्लेषण उनकी समस्त रचनाओं में दिखाई पड़ता है, परोक्ष की रहस्यपूर्ण अनुभूति से उनके गीत सज्जित है। रहस्य की कलात्मक अभिव्यक्ति की जो चेष्टाएं हैं आधुनिक हिन्दी काव्य में की गई है, उनमें निराला जी की कृतियां विशेष उल्लेखनीय है। कुछ कवियों ने तो रहस्यपूर्ण कल्पनाएं ही की है, किन्तु ‘निराला’ जी के काव्य का मेरुदण्ड ही रहस्यवाद है। उनके अधिकांश पदो में मानवीय जीवन के ही चित्र है किन्तु वे सब के सब रहस्यानुभूति से अनुरंजित है। जैसे सूरदास जी के पद अधिकांश श्रीकृष्ण की लोक लीला से सम्बद्ध होते हुए भी आध्यात्म की ध्वनि से आपूरित है वैसे ही ‘निराला’ जी के भी पद है। इस रहस्य प्रवाह के कारण कवि के द्वारा रचित साधारण जीवन के गीत भी असाधारण आकर्षण रखते है, किन्तु उनके कुछ पद स्पष्टतः रहस्यात्मक भी है जैसे- ‘अस्तांचल रवि जल छल-छल छवि’ पद में रहस्यपूर्ण वातावरण की सृष्टि की गई है। ‘हुआ प्राप्त प्रियतम तुम जाओगे चले’ जैसे पदो में परकीया की उक्ति के द्वारा प्रेम रहस्य प्रकट किया गया है।8
उपरोक्त वर्णन से यही निष्कर्ष निकलता है कि छायावादी कवियों में सर्वश्री जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी जी और निराला जैसे महान कवियों ने रहस्यवाद के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए हैं। प्रसाद जी की कविताओं में रहस्यवाद मानसिक सन्तुलन के रूप में प्रकट हुआ है।9 महादेवी जी रहस्यानुभूति को भावावेश की आंधी नही वरन् ज्ञान के अनन्त आकाश के नीचे अजस्त्र प्रवाह मयी त्रिवेणी मानती हैं। छायावादी कवियांे में उनका रहस्यवादी चिन्तन सर्वाधिक व्यापक है। महादेवी जी को तो रहस्यवाद की साधिका ही कह दिया गया है10। निराला और पंत जी की रचनाए भी रहस्यवादी एवं प्रकृतिवादी हैै। इसी आधार पर यह कहा जा सकता है कि रहस्यवाद भी छायावादी कवियों की एक प्रमुख अंग है।
संदर्भ-ग्रन्थ
1. त्रिपाठी डाॅ0 राममूर्ति, रहस्यवाद, पृष्ठ-9
2. गुप्त डाॅ0 गणपति चन्द्र, साहित्यिक निबन्ध, लोकभारती प्रकाषन इलाहाबाद, उन्नीसवाॅ संस्करण, 2003
4 कबीर और जायसी का रहस्यवाद पृष्ठ-345।
5 महादेवी की रहस्य भावना-पृष्ठ-48।
7 गुप्त डाॅ0 गणपति चन्द्र, महादेवी, साहित्यायन प्रकाषन, कुरूक्षेत्र, 1969, पृष्ठ-163
8 सिंह नामवर, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाॅ, लोकभारती प्रकाषन इलाहाबाद, 2008, पृष्ठ-45, 47
9. गुप्त डाॅ0 गणपति चन्द्र, महादेवी नया मूल्यांकन, लोकभारती प्रकाषन इलाहाबाद, पृष्ठ- 173, 177
10.सक्सेना द्वारिका प्रसाद, आधुनिक हिन्दी के प्रतिनिधि कवि, विनोद पुस्तक मन्दिर, आगरा-2,सं0 नवम, पृ0 336
11. बाजपेयी नन्ददुलारे, हिन्दी साहित्य बीसवीं शताब्दी, लोकभारती प्रकाषन इलाहाबाद, 2007, पृष्ठ-124

मधु श्रीवास्तव
शोध छात्रा, हिन्दी विभाग
नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, उ0प्र0