Tuesday, 1 January 2013

बाल अधिकार एवं बालश्रम: एक समाज वैज्ञानिक अध्ययन


रमेश चन्द्र यादव

बच्चे मासूम विश्वसनीय और आशा से भरे होते हैं। उनका बचपन खुशहाली तथा प्रेम से भरा होना चाहिए। लेकिन बहुत से बच्चों के लिए बचपन की वास्तविकता भयावह होती है। लाखों बच्चों को आर्थिक कारणों से बाध्य होकर श्रम बल में सम्मिलित होना पड़ता है। भारत को संसार के कार्यरत बच्चों की सबसे अधिक संख्या के होने की संदिग्ध प्रतिष्ठा प्राप्त है। 1.7 करोड़ बच्चे बालश्रम को मजबूर हैं।

अधिकांश कार्यरत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में केन्द्रित हैं। उनमें से लगभग 60ः दस वर्ष की आयु से कम है। व्यवसाय में 23ः जाते हैं, जबकि 36ः घरेलू कार्यों में। शहरी क्षेत्रों में उन बच्चों की संख्या जो कैन्टीन और रेस्तरां में काम करते हैं या जो चिथड़े उठाने और माल की फेरी लगानों में लगे हुए हैं, विशाल है परन्तु अनभिलिखित है। अधिक बदकिस्मतों में वे हैं जो कि जोखिम वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में रामनाथपुरम जिले के शिवकाशी में पटाखों और माचिस की इकाईयों में 45,000 बच्चे कार्यरत हैं। उत्तर प्रदेश में फिरोजाबाद के गिलास के कारखानों में 45,000 बच्चे और गलीचे में कारखानों में एक लाख बच्चे काम करते हैं। मुम्बई में सर्वाधिक बाल श्रमिक हैं। भारत में आज भी बहुत से बच्चे भूख और आश्रयहीनता से ग्रस्त हें तथा बेहद खतरनाक परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट 2004 के अनुसार हर वर्ष करीब 45 हजार बच्चे गायब होते हैं। यद्यपि वास्तविक आॅकड़ें कहीं ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि अधिकतर मामलों में केस दर्ज नहीं किया जाता हैं गुमशुदगी की सबसे ज्यादा घटनाएँ झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, आंधप्रदेश और उड़ीसा में होती है और आमतौर पर गरीब परिवार इसके शिकार होते हैं।1
भारत में बाल अधिकार- स्वतंत्रता के पश्चात् भारत में बच्चों से सम्बन्धित संवैधानिक प्रावधान, नीति, योजना तथा विधायन की आवश्यकता महसूस की गई। संविधान के अनुच्छेद 15(3) द्वारा सरकार को बालकों के लिए अलग से कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 23 बालकों के क्रय-विक्रय एवं उनके द्वारा अनैतिक कार्य पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से आयु के बच्चों को कारखानों, खदानों तथा औद्योगिक प्रतिष्ठानों में नियोजित करने पर रोक लगाता है।
इसके लिए राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में अनुच्छेद-39 के अन्तर्गत यह आशा व्यक्त की गयी है कि ‘राज्य अपने नीतियों को इस तरह निर्देशित करेगा कि बच्चों के स्वास्थ्य और क्षमता पर विपरीत प्रभाव न पड़े, बच्चों को उनकी आर्थिक अक्षमता के कारण ऐसे कामों में न नियोजित किया जाये जो उनकी आयु और क्षमता के प्रतिकूल हो, बच्चों को ऐसी सुविधाएं और अवसर दिए जायें जो उनके स्वस्थ विकास में सहायक हों। इस प्रतिबद्धता को स्वीकार करने तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ का बच्चों के अधिकार से सम्बन्धित घोषणा-पत्र 1959’ को एक सहयोगी होने के कारण भारत ने 1974 में बच्चों से सम्बन्धित एक राष्ट्रीय नीति तय की। इस नीति में संवैधानिक प्रावधानों में विश्वास व्यक्त किया गया तथा उसके प्रावधान इस प्रकार रखे गये।2 ‘राज्य की यह नीति होगी कि बच्चों को जन्म के पहले तथा बाद में पर्याप्त सेवायें मिलें और विकास के पूरे दौर में उनका शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास सुनिश्चित हो सके। राज्य सेवाओं का क्षेत्र इस प्रकार विस्तृत करेगा जिससे एक उचित समय में देश के सभी बच्चे अपने सन्तुलित विकास की अवस्था प्राप्त कर सकें।3
बाल अधिकार से सम्बन्धित अधिनियम:
1. फैक्ट्री अधिनियम, 1948  2. बाल रोजगार (संशोधित) अधिनियम 1951
3.बागान श्रम अधिनियम, 1951 4. खदान अधिनियम, 1952
   5.बाल रोजगार (संशोधित अधिनियम) 1978 6.बालश्रम (उन्मूलन तथा नियमन) अधिनियम 1986
7.राष्ट्रीय बाल श्रम, नीति, 1987 8.बाल न्याय (बच्चों की सुरक्षा तथा देखभाल) अधिनियम 2000
9.बाल न्याय (संशोधन) अधिनियम 2006  10.निःशुल्क चाइल्ड लाइन फोन सेवा 1998
बालकों के नियोजन और उनके काम के घण्टों को नियंत्रित करने के लिए पहला अधिनियम 1881 का फैक्ट्री एक्ट बना था। बाल नियोजन की न्यूनतम आयु को निर्धारित करने के लिए 1929 में एक आयोग नियुक्त किया गया। उसकी सिफारिश पर चाइल्ड लेबर एक्ट, 1933 पारित किया गया, जिसने 14 वर्ष की आयु से कम बच्चों की निुयक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया। 1986 में लोकसभा ने चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया, जिसके द्वारा कुछ विशेष नौकरियों में बाल नियुक्ति की योजना बनाई गई और जोखिम रोजगारों में काम की शर्तों को नियंत्रित किया गया। जुविनाइल जस्टिस एक्ट, 1986 जिसने विभिन्न राज्यों एवं केन्द्र प्रशासित क्षेत्रों में विद्यमान बालकों के अधिनियमों को स्थान लिया और जो 2 अक्टूबर 1987 से प्रभाव में आया।4
बालिकाओं की स्थिति- भारत सरकार का नारा है, सुखी लड़की देश का भविष्य है। भारत में रीति-रिवाजों, सामाजिक व्यवहार में लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है, जो इस मान्यता के कारण है कि लड़कियाँ आर्थिक दृष्टि से बोझ सिद्ध होती हैं। इसलिए सरकार तथा गैरसरकारी संगठनों द्वारा ऐसे कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए हैं जो कि इस सामाजिक मान्यता को समाप्त कर सके और बालिकाओं की स्थिति ऊँचा उठा सके। बालिकाओं के लिए एक राष्ट्रीय कार्यनीति (1991-2000) घोषित किया गया था। इस कार्यक्रम में बालिका भू्रण हत्या, लिंग-असमानता को दूर करने, बालिकाओं को शोषण से बचाने और आश्रय प्रदान करना आदि शामिल किए गए थे।5
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम 1924 में जेनेवा घोषणा पत्र के अन्तर्गत बच्चों के अधिकारों को मान्यता देते हुए पाँच सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की गई। 1989 में बाल अधिकारिता अभिसमय पर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों द्वारा हस्ताक्षर किया गया। इस अभिसमय में कुल 54 अनुच्छेद हैं जो विश्व के सभी बच्चे को कतिपय मूलभूत अधिकार प्रदान करते हैं। इस अभिसमय के अनुच्छेद 1 में दी गयी परिभाषा के अनुसार विश्व के सभी 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति इस अभिसमय के प्रयोजनार्थ बच्चे हैं, बशर्ते उन्हें उनके देश के निजी कानून द्वारा बालिग न घोषित किया गया हो।6
अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा 1992 ‘‘इन्टरनेशनल प्रोग्राम आन एलिमिनेशन आॅफ चाइल्ड लेबर’’ नामक कार्यक्रम शुरू किया गया जो दिसम्बर 2005 तक 86 देशों में संचालित होते हुए आज बाल श्रम उन्मूलन की दिशा में विश्व का सबसे बड़ा कार्यक्रम बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा बाल अधिकारिता पर एक सत्र का आयोजन 8-10 मई 2002 को किया गया। यूनिसेफ के सहयोग से संचालित इस सत्र में ‘‘ए वल्र्ड फिट फार चिल्ड्रेन’’ नामक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया जिसमें निम्नलिखित 4 क्षेत्रों हेतु 21 सूत्री समयबद्ध लक्ष्य तय किए गए -
1.स्वस्थ जीवन को प्रोत्साहन         2.एच0आई0वी0/एड्स जैसी बीमारियों से बचाने के उपाय।
3.बच्चों को शोषण एवं हिंसा से बचाना। 4. सभी बच्चों को शिक्षा प्रदान करना
समन्वित बाल विकास योजना- भारत सरकार ने 1975 में बच्चों के पोषण ओर समग्र विकास के लिए एक केन्द्र प्रायोजित योजना ‘समन्वित बाल विकास योजना’ प्रारम्भ किया था। इस योजना का उद्देश्य है-
1. बच्चों को समुचित मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और सामाजिक विकास करना।
2. 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को पौष्टिक आहार तथा स्वास्थ्य के स्तर में सुधार।
3. बाल विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न विभागों के बीच तालमेल को बढ़ावा देना।
4. बाल मृत्युदर, कुपोषण और स्कूली शिक्षा पूरी न कर पाने की दर में कमी लाना।
5. स्वास्थ्य तथा पोषाहार शिक्षा की समुचित व्यवस्था करके माताओं की, बच्चों के स्वास्थ्य व पोषाहार सम्बन्धी आवश्यकताओं की देख-रेख क्षमता बढ़ाना।
समन्वित बाल विकास योजना के अन्तर्गत 6.41 लाख आंगनबाड़ी केन्द्रों से इस समय 378.16 लाख लोगों को लाभ मिल रहा है। इनमें 315.25 लाख बच्चे शामिल हैं तथा शेष मातायें हैं।7
बालवाड़ी/बाल अनुरक्षण केन्द्र- कामकाजी और बीमार महिलाओं के बच्चों के लिए बालवाड़ी और दोपहर के समय बच्चों के देखभाल के केन्द्र चलाने की योजना 1975 में प्रारम्भ किया गया था। इसे 1974 में अंगीकृत राष्ट्रीय बाल नीति के अनुपालन में केन्द्रीय योजना के रूप में आरम्भ किया गया इस योजना के तहत उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाओं में दिन के समय देखभाल की सुविधा, पूरक पोषाहार, टीकाकरण, दवा और मनोरंजन की सुविधा उपलब्ध काराना शामिल है।
भारत-यूनीसेफ सहयोग- बच्चों से सम्बन्धित रणनीतियों और कार्यक्रमों को लागू करने में भारत यूनीसेफ का सहयोगी रहा हैं सहयोग का यह दौर दोनों के बीच 10 मई, 1949 को बुनियादी समझौते पर हस्ताक्षर और 5 अप्रैल, 1978 को संशोधित समझौते पर हस्ताक्षर के समय से चल रहा है। 2003-07 के लिए गतिविधियों का मास्टरप्लान आन्ध्रप्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखण्ड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल, केरल और उत्तरांचल में चल रहा है।8
किशोर न्याय अधिनियम 1986- इस कानून में बच्चों के हित के लिए तथा उपेक्षित तथा अपचारी बच्चों के देखभाल, विकास तथा पुनर्वास के साथ-साथ समुचित न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु प्राथमिक कानून की व्यवस्था की गई।
किशोर न्याय (बच्चों की देख-रेख एवं सुरक्षा संशोधन अधिनियम 2000): इस संशोधन में बाल या किशोर की परिभाषा दी गई है जिसमें कहा गया है कि एक बाल या किशोर वह है जो 18 वर्ष की आयु पूरी न किया हो। इसमें सभी धर्मों के बच्चों को शामिल किया गया है तथा इन बच्चों को इसके दायरे में लाया गया है जो भीख मांगते हैं, बाल श्रम से मुक्त हुए हों या सड़क पर रहने वाले हों। इस संशोधन से ऐसे किसी भी माध्यम पर जुर्माना लगाया गया है जो बच्चों को गलत चित्रण कर अपना व्यापारिक ध्येय सिद्ध करती है यह जुर्माना 1000-25000 तक हो सकता है।
राष्ट्रीय बाल आयोग: बाल बालिकाओं की रक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन होने जा रहा है। एक अध्यक्ष और छः सदस्यों वाले इस आयोग के पास अन्य अधिकारों के साथ-साथ बाल अधिकारों के उल्लंघन की जांच करने और ऐसे मामलों में कारवाई प्रारम्भ करने की सिफारिश करने के अधिकार होंगे। इसके अलावा यह आयोग शिकायतों पर गौर करेगा और बाल अधिकारों के उल्लंघन से जुड़े मामलों का स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच करेगा। आयोग के सदस्य क्षेत्र विशेष में अपनी प्रतिष्ठा के अलावा अनुभव और शिक्षा, बाल स्वास्थ्य और कल्याण, किशोरों का न्याय, बाल श्रम उन्मूलन, बाल मनोविज्ञान या समाजशास्त्र और बच्चों से जुड़े कानूनों के क्षेत्र में अपने खास कार्यों के आधार पर चुने जायेंगे। कुछेक बाल अधिकार संरक्षण मामलों से निपटने के दौरान आयोग के पास दीवानी अदालत के सभी अधिकार होंगे। वह किसी भी व्यक्ति को सम्मन भेजने और उसकी मौजूदगी सुनिश्चित कर सकेगा।9 भारत में बाल विकास: राज्यवार आॅकड़े
क्र0सं0 राज्य शिशु मृत्यु दर (प्रति एक हजार जीवित जन्म 3 वर्ष कम आयु के कम वजनी बच्चे (ःमें) टीकाकरण प्रसार (ःमें) संस्थागत प्रसव सेवाओं (ःमें) कक्षा 1-10 में पढ़ाई छोड़ने की दर
2005-06 2005-06 2005-06 2005-06 2005-06
1ण् उत्तर प्रदेश 73 47 23 27 43ण्77
2ण् उत्तीसगढ़ 71 52 49 15ण्7
3ण् मध्य प्रदेश 70 60 40 29ण्7 64ण्7
4ण् झारखण्ड 69 59 35 19ण्2
5ण् असम 66 40 32 22ण्7 74ण्96
6ण् उड़ीसा 65 44 52 38ण्7 64ण्42
7ण् राजस्थान 65 44 27 32ण्2 73ण्87
8ण् बिहार 62 58 33 22 83ण्06
9ण् अरूणांचल प्रदेश 61 37 78 30ण्08 7ण्69
10ण् त्रिपुरा 52 39 50 48ण्9 73ण्36
11ण् गुजरात 50 47 45 54ण्6 59ण्29
12ण् दिल्ली 40 33 63 60ण्7 46ण्92
13ण् प0 बंगाल 48 44 64 43ण्1 78ण्03
14ण् जम्मू-कश्मीर 45 29 67 54ण्3 53ण्75
15ण् मेघालय 45 46 33 29ण्7 79ण्15
16ण् कर्नाटक 43 41 55 66ण्9 59ण्38
17ण् उत्तरांचल 42 38 60 36
18ण् हरियाणा 42 42 6 39ण्4 32ण्48
19ण् पंजाब 42 27 60 52ण्5 44ण्06
20ण् नागालैंड 38 30 21 12ण्2 67ण्29
21ण् महाराष्ट्र 38 40 59 66ण्1 54ण्16
22ण् हिमाचलप्रदेश 36 36 74 45ण्3 32ण्42’
23ण् मिजोरम 34 22 46 64ण्6 66ण्95
24ण् सिक्किम 34 23 70 49 82ण्3
25ण् तमिलनाडु 31 33 81 90ण्4 55ण्19
26ण् मणिपुर 30 24 47 49ण्3 43ण्02
27ण् गोवा 15 29 79 92ण्6 40ण्65
28ण् केरल 15 29 75 99ण्5 7ण्15
29ण् भारत 57 46 44 40ण्7 61ण्92
बाल विकास व बाल श्रम में विपरीत सम्बन्ध होता है। तात्पर्य यह है कि जिन राज्यों में बाल विकास कार्यक्रमों का अधिक बल दिया गया वहाँ बाल श्रम में अभूतपूर्व कमी देखी गयी। केरल इसका ठोस उदाहरण प्रस्तुत करता है। जहाँ बाल विकास की उच्च दर देखी जा सकती है। वहीं यहाँ बालश्रम सहभागिता दर राष्ट्रीय स्तर की तुलना में व्यापक रूप से कम रही है।
निष्कर्ष- बालक किसी भी राष्ट्र के भविष्य की परिसम्पत्ति होते हैं। ये ऐसे मानव संसाधन हेैं जो कालांतर में राष्ट्रीय विकास का मार्ग प्रशस्त करते हैं। प्रसिद्ध विचारक मायरन वीनर ने बालकों को ‘हाथों की क्षमता’ के बजाय ‘मस्तिष्क की क्षमता के रूप में देखने की बात की है। वस्तुतः मानव विकास के लिए बालकों की स्थिति को मजबूत करने का प्रयास करना अपेक्षित है। इससे सामाजिक सन्तुलन, पारिवारिक सद्भाव व निरीक्षण व्यवस्था अपनाने पर बच्चों को शोषण व दुव्र्यवहार से बचाने में काफी सहायता प्राप्त हो सकती है तथा बच्चों को प्राप्त तथाकथित अधिकारों को वास्तविक अधिकारों में बदलकर उनका जीवन खुशहाल बनाया जा सकता है। उनके बेहतर भविष्य के लिए कानूनी व्यवस्था को सही ढंग से लागू करना होगा।
सन्दर्भ ग्रन्थ
1.आहूजा राम, भारत में सामाजिक समस्याऐं
2.गुप्त एम0एल0 एवं शर्मा डी0डी0, भारतीय सामाजिक समस्याऐं
3.बघेल डी0एस0, अपराधशास्त्र
4.बोटोमोर टी0बी0, समाजशास्त्र
5.योजना, मई 2008
6.कश्यप सुभाष, भारतीय संविधान नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली
7.ओझा एस0के0, वर्तमान भारत में सामाजिक समस्यायें, बौद्धिक पब्लिकेशन, इलाहाबाद
8.क्रानिकल, सितम्बर 2010
9.कुरूक्षेत्र, नवम्बर 2007 अंक 54
रमेश चन्द्र यादव
परामर्शदाता, समाजशास्त्र, 
यू0पी0आर0टी0ओ0यू0, इलाहाबाद।