Tuesday, 1 January 2013

हिन्दू धर्म में अन्तिम साध्य


अमिता सिंह

विश्व के जितने भी धर्म है उनका कोई न कोई संस्थापक रहा है उसके उद्भव का कोई न कोई कारण रहा है तथा उसका उदय काल निश्चित है। पर जिसे हम हिन्दू कहते हैं, जो भारत का आदि धर्म है और वहीं सनातन धर्म है उसका कभी कोई संस्थापक नहीं रहा है व न ही इसके चलन का कोई काल रहा है बल्कि यह अजस्र धारा की तरह सृष्टि के समय से चला आ रहा है। हिन्दू धर्म की व्याख्या अपौरूषेय ग्रन्थ वेद में प्राप्त होती है जहां पर-‘वेदऽखिलो धर्ममूलम’ कहा है। इसकी मान्यता केवल धार्मिक वृत्ति पर ही नहीं है वरन् हमारे समाज, कला, साहित्य, दर्शन, संस्कृति, स्थापत्य आदि विविध क्षेत्रों में आज भी विद्यमान है।1 हिन्दू धर्म केवल चिंतन प्रधान ही नहीं वरन् व्यवहार प्रधान भी है। पुरुषार्थ को हिन्दू धर्म में जीवन का लक्ष्य माना गया है। यह चार प्रकार का है- धर्म, अर्ध, काम व मोक्ष।

धर्म का तात्पर्य नैतिक मूल्यों से है, अर्थ से तात्पर्य सांसारिक ऐश्वर्य से है, काम का तात्पर्य सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से है। परन्तु अन्तिम व परम लक्ष्य मोक्ष है। इसकी प्राप्ति में ही मानव जीवन की सार्थकता है और यही हिन्दू धर्म का अन्तिम साध्य है।2
हिन्दू धर्म में इस अन्तिम साध्य के विषय में जानने हेतु इसे तीन पहलुओं में देख सकते हैं- (1) वैदिक, (2) दार्शनिक, (3) पौराणिक (प) वैष्णव धर्म (क) कृष्ण शाखा, (ख) राम शाखा (पप) शैव धर्म, (पपप) शाक्त धर्म।
वेद व उपनिषद में मोक्ष- उपनिषद् संसार को बंधन मानते हैं और इस बंधन से मुक्त होने को मोक्ष कहते हैं। यह बंधन अविद्या के कारण होता है। मोक्ष आत्मा का साक्षात् और अपरोक्ष ज्ञान है। यह एकत्व दर्शन है। इसको प्राप्त करने पर शोक, मोह नहीं रह जाते, सारे संशय व सारे कर्म क्षीण हो जाते हैं। उसके लिए कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती। बिना ज्ञान के मोक्ष प्राप्त नहीं होता। इस उपासना में भक्ति ही सहायक है तथा कर्म भी। कर्म से चित्त शुद्धि, चित्त शुद्धि से भक्ति व भक्ति से ज्ञान उत्पन्न होते हैं। श्रवण, मनन, निदिध्यासन ज्ञान प्राप्ति के तीन सोपान है। उपनिषदों में विदेह मुक्ति के साथ जीवनमुक्ति की भी बात कही गयी है।
भारतीय दर्शन में मोक्ष- चार्वाक को छोड़कर सभी दर्शनों में मोक्ष को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। भौतिकवादी दर्शन होने के कारण चार्वाक आत्मा में अविश्वास करता है। जब आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है तो मोक्ष की प्राप्ति किसे होगी? आत्मा के खंडन के साथ ही मोक्ष का भी खंडन हो जाता है। चार्वाक दर्शन में अर्थ व काम को पुरुषार्थ माना गया है।
सांख्य के अनुसार मोक्ष का अर्थ तीन प्रकार के दुःखों से छुटकारा पाना है। बंधन का कारण अविवेक है। पुरुष, प्रकृति और उसकी विकृतियों में भिन्न है, पर अज्ञान के वशीभूत होकर पुरुष, प्रकृति व उसकी विकृतियों के साथ अपनापन का सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। मोक्ष की अनुभूति तभी होती है जब पुरुष अपने को प्रकृति से भिन्न समझने लगता है। बन्धन प्रतीतिमात्र है, क्योंकि पुरूष स्वभावतः मुक्त है। सांख्य दर्शन जीवन्मुक्ति व विदेह मुक्ति दोनों को स्वीकार करता है।
योग दर्शन में ‘चित्त की वृत्तियों का निरोध’ योग है। जब चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाता है तो वह मोक्षावस्था को प्राप्त हो जाता है। योग के अनुसार जब आत्मा अपने को अनात्म वस्तुओं से अलग समझ लेती है तभी मोक्ष की अवस्था प्राप्त होती है। मन ही बन्धन का कारण है। इसी से अहं, बन्धन व आसक्ति की उत्पत्ति होती है। इस आध्यात्मिक साधना के लिए आठ अंगों को निर्धारित किया है। यही आठ मार्ग योग की अवस्था को प्राप्त करने के साधन है इसे ‘अष्टांग मार्ग’ कहा जाता है (1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4) प्राणायाम, (5) प्रत्याहार, (6) धारणा, (7) ध्यान, (8) समाधि।
न्याय वैशेषिक- में मोक्ष को दुःख के उच्छेद की अवस्था कहा गया है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा का शरीर से वियोग होता है। चैतन्य आत्मा का स्वाभाविक गुण न होकर आगन्तुक गुण है जो शरीर से संयुक्त होने पर उदय होता है। मोक्ष में आत्मा का शरीर से पृथक्करण होता है जिसके फलस्वरूप मोक्ष को अचेतन अवस्था कहा गया है।
मीमांसा दर्शन में मोक्ष को सुख-दुःख से परे की अवस्था कहा गया है। मोक्षावस्था अचेतन अवस्था है क्योंकि आत्मा मोक्ष में अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त करती है, जो अचेतन है। इस अवस्था में आत्मा में ज्ञान का अभाव रहता है।
बौद्ध दर्शन में मोक्ष को ‘निर्वाण’ कहा गया है। निर्वाण का अर्थ है ‘बुझ जाना’। परन्तु ‘बुझ जाना’ से यह समझना कि निर्वाण पूर्ण विनाश की अवस्था है, भ्रामक होगा। निर्वाण अस्तित्व का उच्छेद नहीं है। निर्वाण को व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपना सकता है इस अवस्था की प्राप्ति के बाद भी मानव का जीवन सक्रिय रह सकता है। निर्वाण अनिर्वचनीय है। निर्वाण प्राप्त हो जाने के बाद व्यक्ति के दुखों का अन्त हो जाता है तथा पुर्नजन्म की श्रृंखला भी समाप्त हो जाती है। निर्वाण को अपनाने के लिए बुद्ध ने अपने चतुर्थ आर्य सत्य में अष्टांगिक मार्ग की चर्चा की है।
जैन दर्शन में बंधन का कारण कर्मों को माना गया है। ये कर्म दो प्रकार के है-(1) घातीय (ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अन्तराय) अघातीय कर्म भी चार प्रकार के है (वेदनीय, आयुष्य, नाम और गोत्र)। कर्मों का आत्मा से अलग होना ही ‘मोक्ष’ है। मोक्ष की प्राप्ति त्रिरत्न सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चरित्र के सहयोग से संभव है।
अद्वैत वेदान्त में मोक्ष का अर्थ ब्रह्म में विलीन हो जाना है, आत्मा वस्तुतः ब्रह्म ही है पर अज्ञान के कारण वह अपने को ब्रह्म से पृथक समझने लगता है। यही बंधन है। मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से ही संभव है। मोक्ष को शंकर ने आनन्द की अवस्था कहा है। बंधन को शंकर ने प्रतीति मात्र माना है।
विशिष्टाद्वैत वेदान्त के अनुसार कर्म बंधन का कारण है व मुक्ति का अर्थ ब्रह्म से तदाकार होना नहीं है बल्कि ब्रह्म से सादृश्य प्राप्त करना है। मोक्ष दुखाभाव की अवस्था है ईश्वर की कृपा के बिना मोक्ष असम्भव है। मोक्ष भक्ति के द्वारा संभव होता है।3
शैव धर्म में जीवात्माओं को ‘पशु’ कहा गया है क्योंकि ये पशुवतः अविद्या- रज्जु द्वारा संसार में बंधे है। जीव नित्य है तथा इच्छा-ज्ञान-क्रियायुक्त होने से वास्तव में ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है। वह जीव इच्छा, ज्ञान, क्रिया में सीमित प्रतीत होते हैं तथा मोक्षावस्था में अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं। जीवों या पशुओं के बन्धन ‘पाश’ कहलाते हैं। यह त्रिविध है- अविद्या, कर्म और माया। अविद्या अनादि है सब जीवों में एक ही है। इसी को ‘आणव मल’ भी कहते हैं। मोक्षावस्था में जीव का शिव से तादात्मय का अर्थ ऐक्य नहीं अपितु अपृथक्त्व है। मोक्ष का अर्थ शिव-सायुज्य है।
शाक्य सम्प्रदाय- शक्ति पूजा वैदिक काल से ही चली आ रही है। केनोपनिषद में ‘उमा हैमवती’ का उल्लेख है। शाक्तों के अनुसार परम तत्व परा शक्ति है तथा शिवभाव गौण है। पुराणों में शक्ति को देवी, चण्डी, चामुण्डा, दुर्गा, उमा, महामाया आदि नामों से अभिहित किया है। मुक्ति स्वरूपानुभव है। जीवनमुक्ति गीता के ‘स्थितप्रज्ञ’ के समान है। इसमें जीवनमुक्ति मान्य है।4
उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि मोक्ष एक नैतिक आदर्श है और इस नैतिक आदर्श के रूप में यह समाज के अन्य लोगों को दुखों से मुक्ति दिलाने का प्रयास है। इस अर्थ में मोक्ष की प्रासंगिकता स्वीकार की जाती है। यदि प्राचीन अर्थ में मोक्ष को स्वीकार करे जैसा कि पुरूषार्थ की श्रेणी में माना गया हैं तो भी उसकी प्रासंगिकता स्वीकार की जा सकती है। गीता में ‘स्थितप्रज्ञ’ या ‘गुणातीत’ जो लोकसंग्रह का कार्य करता है समाज के लिए उपयोगी है तथा मानव जीवन के लिए अनुकरणीय है। मोक्ष को एक आदर्श के रूप में मानने पर जीवन की सार्थकता है।
सन्दर्भ-
1.सहाय, शिव स्वरूप, नरेन्द्र प्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली।
2.मिश्र, हृदय नारायण विश्व धर्म, द्वारका प्रसाद अग्रवाल, शेखर प्रकाशन, 101 चक जीरो रोड, इलाहाबाद, पृ0 सं0 21
- 3.सिन्हा, प्रो0 हरेन्द्र प्रसाद नरेन्द्र प्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली।
5.शर्म, चन्द्रधर भारतीय दर्शन, पृ0 सं0 344-345, नरेन्द्र प्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली।

अमिता सिंह
शोधकत्र्ती, दर्शनशास्त्र विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद।