Tuesday, 1 January 2013

श्रीमद्भगवद्गीता का शिक्षा दर्शन


देवकुमार यादव

मानव मनीषा के चूडान्त निदर्शन उपनिषदों की सारभूत योगिराज श्रीकृष्ण उपदिष्ट, अखिल मानवता को दिव्य सन्देश निखिल ब्रह्माण्ड की श्रेष्ठ निधि है। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक पाठ पर एक नवीन दृष्टि तथा नवीन अर्थ का उद्भवन होता है। निखिल ब्रह्माण्ड के सकल ज्ञान-सिद्धान्त की इसमें संपरीक्षा की गयी है। सत्यं, शिवम्, सुन्दरम् की संवाहिका क्या? निर्देशिका श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ के आदर्श होने की स्थिति है। कालिक तत्त्व की प्रधानता के कारण प्रत्येक विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता की दृष्टि देश-काल निरपेक्ष है। ऐसे दिव्य संदेश के उपदेष्टा जगद्गुरू योगिराज श्रीकृष्ण की शैक्षिक दृष्टि क्या है? यह विवेचनीय है क्योंकि प्रत्येक आदर्श समाज की स्थापना में उस समाज में सन्निहित शैक्षिक तत्त्वों व उसके उदेश्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है अस्तु श्रीमद्भगवद्गीता के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा क्या है? शिक्षा पद्धति कैसी होनी चाहिए? शिक्षा दर्शन कैसा होना चाहिए? यह संपरीक्षणीय है।

श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान प्राप्ति को शिक्षा कहा गया है। ज्ञान को यज्ञ से अधिक महनीय रूप में वर्णित किया गया है। गीता के अनुसार द्रव्यज्ञान से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। अन्ततोगत्वा सकल यज्ञों व यज्ञीय कर्मों का अवसान दिव्य ज्ञान में होता है।1 इस प्रकार स्पष्ट है कि श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान को द्विविध मानती है। एक द्रव्यज्ञान अर्थात् भौतिक विद्या दूसरा आध्यात्मिक ज्ञान जिसे परा विद्या के नाम से अभिहित किया जाता है परा विद्या ही श्रेष्ठ विद्या है इसमें द्रव्यमान व यज्ञ कर्मों का अवसान हो जाता है। गहन दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक विद्या उस समय भी भौतिक विद्या से श्रेष्ठ थी और आज भी श्रेष्ठ है। इसकी प्रासङ्किता कालातीत है। समकालीन परिस्थिति अनुसार यह प्रासङ्कि व जीवित रहती है।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने परा व अपरा शैक्षिक दृष्टिकोण को जन-जन तक पहुँचाया तथा उसे सकारात्मक स्वरूप दिया। महाभारत में उल्लिखित दृष्टान्त एवं गीतोपदेश इसका सकारात्मक स्वरूप है। इनके इन शैक्षिक विचारों के उद्देश्यों को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है-
1. आध्यात्मिक विकास गीता के अनुसार मानव जीवन का मूल उद्देश्य ज्ञान के द्वारा अज्ञान निवर्तन है जिससे व्यक्ति को भगवत्प्राप्ति तथा स्वरूपज्ञान हो सके। व्यक्ति स्वविवेकानुसार दैवीय एवं आसुरीप्रवृत्तियों के ग्रहण में स्वतन्त्र व उचित-अनुचित का निर्णय कर सके। इस स्थिति में पर ब्रह्म एवं आत्मा का अभेद ज्ञान तथा भौतिक संसार की निस्सारता का बोध होता है। मायिक इस जगत् को सत्य स्वीकार करना ही अज्ञान है। योगीराज श्रीकृष्ण का मत है कि जीव का परम पुरूषार्थ जन्म-मरण चक्र से मुक्ति है। यह मुक्ति आत्मज्ञान से सम्भव है। इस हेतु अधिकारी भेद से ज्ञानमार्ग, कर्ममार्ग एवं भक्तिमार्ग से सम्बन्धित मार्ग का उपदेश दिया गया है। मनुष्य को मन, बुद्धि, श्रद्धा से शुद्ध होना होगा, इन्हें भगवान में लगाना होगा तथा अन्तःकरण को आत्मा से सन्नद्ध करना होगा। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जब मनुष्य को मन, बुद्धि, श्रद्धा एवं शरण सब कुछ भगवान में स्थित हो जाते हैं तभी वह पूर्ण ज्ञान द्वारा समस्त कलुषता से शुद्ध होता है और मुक्ति के पक्ष की ओर अग्रसर होता है।2 तत्पश्चात् मनुष्य में समभाव को प्राप्त होता है तथा ब्राह्मण, गौ, हाथी व चाण्डाल सर्वत्र आत्मा को देखता है तथा सबसे समभाव रखता है।3 इस प्रकार गीता का प्रमुख शैक्षिक उद्देश्य आध्यात्मिक विकास के द्वारा समभाव को प्राप्त करके सर्वत्र समत्व का दर्शन करना है। इस हेतु जिस चारित्रिक पवित्रता एवं आध्यात्मिक दृष्टि का आवश्यकता है उसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में प्राप्त होता है। इसीलिए श्रीमद्भगवद्गीता में सात्विक वृत्ति की प्रंशसा की गयी है।4 इस सात्विक वृत्ति तक पहुंचने में सबसे अधिक बाधक चंचल मन व मनोवृत्तियाँ हैं। अस्तु गीता में मनोनिग्रह को तत्तवज्ञान हेतु अनिवार्य बतलाया गया है।5
2. वैयक्तिक स्वतन्त्रता का विकास-श्रीमद्भगवद्गीता आत्मनिर्धारणवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करती है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आदि से अन्त तक भेद बताते है तथा उन्हें संसार की सत्यता तथा असत्यता का बोध विराट स्वरूप के दर्शन द्वारा कराते हैं किन्तु अन्ततः कहते हैं कि तुम स्वतन्त्र हो जैसी तुम्हारी इच्छा वैसा करो।6 अर्जुन को लक्ष्य करके कहे गये उपदेश का मन्तव्य है कि मैंने सभी प्रकार से गोपनीय सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विषयों से सम्बन्धित ज्ञान को तुमसे कह दिया। इस ज्ञान की सम्यक विवेचना करके स्वेच्छानुसार तुम कर्म करो। यह श्रीमद्भगवद्गीता के वैयक्तिक स्वतन्त्रता तथा राजनीतिक आदर्श स्वतन्त्रता के संप्रत्यय का संपोषक है।
3. सामाजिक विकास-श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा के मूल में लोक संग्रह को भावना है। अपने व्यक्तिगत हितों को समष्टिगत हित में समाहित कर देना कर्म सिद्धान्त का प्रतिमान है। श्रीमद्भगवद्गीता समर्थित यज्ञ के रूपक के द्वारा इसी भाव को स्पष्ट एवं पुष्ट किया गया है। यज्ञ करों-यज्ञों के द्वारा प्रसन्न होकर देवता तुम्हें भी प्रसन्न करेंगे और इस तरह मनुष्य एवं देवताओं पारस्परिक सहयोग से संपन्नता प्राप्त होगी।7 इस समष्टिगत हित हेतु नेतृत्व कैसा होना चाहिए? इसका भी सम्यक विवेचना श्रीमद्भगवद्गीता में किया गया है। श्रीकृष्ण का यह मन्तव्य है कि व्यक्ति को शिक्षित करके इतना ज्ञानी बना देना चाहिए उसका अनुसरण सब करें तथा उनका नेतृत्व सब स्वीकार करें। श्रीकृष्ण के इस कथन में कि जनक जैसे राजा ने केवल नियत कर्मों को करने के लिए ही सिद्धि प्राप्त की थी। अतः सामान्य जन को शिक्षित करने हेतु तुम्हें कर्म करना चाहिए। यहां नेतृत्व का आशय पूर्णरूपेण परिलक्षित होता है।
उपर्युक्त शैक्षिक उद्देश्य जो श्रीमद्भगवद्गीता से निस्सृत है वे आज के परिवेश में पूर्णरूपेण अनुशीलनीय, ग्रहणीय एवं आचरणीय हैं तथा हमारे लिए ये बहुत ही मूल्यवान एवं प्रासंगिक हैं।
संदर्भ ग्रन्थ सूची
1. श्रीमद्भगवद्गीता 4/33
2. श्रीमद्भगवद्गीता 5/17
3. श्रीमद्भगवद्गीता 5/18
4. श्रीमद्भगवद्गीता 17/18
5. श्रीमद्भगवद्गीता 5/34
6. श्रीमद्भगवद्गीता 16/63
7. श्रीमद्भगवद्गीता 3/11

डाॅ0 देवकुमार यादव
रीडर, संस्कृत विभाग,
भवन्स मेहता स्नातकोत्तर महाविद्यालय भरवारी, कौशाम्बी, उ0प्र0